पंच तत्त्वों का अनुभूति केंद्र है मन

मानव शरीर पंच तत्त्वों से निर्मित है। उन पंच तत्त्वों का अनुभूति केंद्र मनुष्य का मन अर्थात चित्त है। समस्त शरीर की गतिविधियों का अनुभव, इच्छा, लालसा की उत्पत्ति, मान और अपमान का बोध, दया, क्रोध तथा क्षमा आदि की अनुभूति इसी मन (चित्त) को प्रभावित करती है। मनुष्य अर्थात उसकी आत्मा को सांसारिक मायाजाल में आबद्ध करने वाले यह पंच तत्त्व और उनका अनुभूति केंद्र मन है। मोक्षकामी और आत्मज्ञान के साधक योगी एवं ऋषि-मुनि पंच तत्त्व तथा चलायमान मन के प्रभाव से स्वयं को मुक्त करने का प्रयास करते रहते हैं...

-गतांक से आगे...

साधक चैतन्य आनंद में तल्लीन आकाशगामिनी सिद्धि को भी प्राप्त कर लेता है। यह अमृत एवं आनंद रूप से मनुष्यों का पालन करती है और श्वास तथा उच्छवास कला के द्वारा शरीरस्थ पंच महाभूतों से आवृत्त होकर पंचप्राण रूपा हो जाती है। कुंडलिनी परदेवता है। मूलाधार में विराजमान यह कुंडलिनी कोटि सूर्य प्रतीकाशा, प्रज्ञारूपा, ध्यान-ज्ञान प्रकाशिनी, चंचला, तेजोव्याप्तकिरणा, कुंडाकृति, योगिज्ञेया एवं ऊर्ध्वगामिनी आदि महनीय स्वरूप वाली है। इसकी चर्मोत्कर्ष अवस्था को पहुंचकर साधक कुंडलीपुत्र ही बन जाता है अर्थात माता कुंडलिनी उसको अपना लेती है।

षट्चक्र भेदन

मानव शरीर पंच तत्त्वों से निर्मित है। उन पंच तत्त्वों का अनुभूति केंद्र मनुष्य का मन अर्थात चित्त है। समस्त शरीर की गतिविधियों का अनुभव, इच्छा, लालसा की उत्पत्ति, मान और अपमान का बोध, दया, क्रोध तथा क्षमा आदि की अनुभूति इसी मन (चित्त) को प्रभावित करती है। मनुष्य अर्थात उसकी आत्मा को सांसारिक मायाजाल में आबद्ध करने वाले यह पंच तत्त्व और उनका अनुभूति केंद्र मन है। मोक्षकामी और आत्मज्ञान के साधक योगी एवं ऋषि-मुनि पंच तत्त्व तथा चलायमान मन के प्रभाव से स्वयं को मुक्त करने का प्रयास करते रहते हैं। वह मुक्ति ही ब्रह्मानंद की स्थिति होती है। रुद्रयामल तंत्र साधना में इसी मुक्ति प्रयास को षट्चक्र भेदन कहा जाता है। अब षट्चक्र भेदन की व्याख्या प्रस्तुत है :

मूलाधार चक्र : इसका स्थान गुदा के पास है। शरीर का सारा स्नायुमंडल इसी पर आधारित है। इस चक्र में चेतना उत्पन्न होने से वीर्य-स्थिरता होती है जिससे संपूर्ण शरीर सुदृढ़ हो जाता है अर्थात मनुष्य ऊर्ध्वरेता हो सकता है।

स्वाधिष्ठान चक्र : इसका स्थान मूलाधार से चार अंगुल ऊपर है। शरीर में जल तत्त्व का अंश स्वाधिष्ठान कहलाता है। यही शरीर की आर्द्रता का कारक है। रक्त, मांस, मज्जा और शरीर की कोमलता का निर्माण इसी जल तत्त्व से होता है। इसमें चेतनता आते ही शरीर को आरोग्य प्राप्त हो जाता है। ऐसी स्थिति में वह कभी भी थकावट का अनुभव नहीं करता।

मणिपूर चक्र : इसका स्थान नाभि में है। हमारे शरीर में जो भी ताप और तेजस्विता है, वह अग्नि तत्त्व के द्वारा उत्पन्न है। इसकी चेतनता से मन की स्थिरता नहीं हटती तथा दिव्य दृष्टि प्राप्त होकर मनुष्य अपने को शरीर से भिन्न अनुभव करने लगता है। यह सभी चक्रों का मध्य स्थान है।  

                                 -क्रमशः     

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