पंडित जी का सत्याग्रह

अजय पाराशर

लेखक, धर्मशाला से हैं

पंडित जॉन अली को उस समय से ही सत्य के लिए आग्रह करने का चस्का लग गया था, जब उन्होंने राजनीति में सक्रिय भाग लेना आरंभ किया था। यह बात दीगर है कि उनका सत्य केवल अपने हितों तक ही सीमित रहता। जहां भी उन्हें अपने या पार्टी के हितों के ़िखला़फ कुछ विपरीत जाता दिखता, वहीं सत्याग्रह शुरू कर देते। आरंभ में उन्होंने कई बार घर में अपनी बीवी के खिलाफ भी मोर्चा खोलने की जुरअत की, लेकिन हर बार बेलन मसाज के बाद बीवी के सत्य को ही अपना सत्य मानने लगे। लिहाजा घर में तो शांति हो गई, लेकिन घर की खुन्नस बाहर निकालने लगे। नतीजा, वह जल्द ही आदरणीय भाई जी और बहन जी की तरह फायर बै्रंड नेता के रूप में स्थापित हो गए,  लेकिन वह नेता ही क्या, जो राजनीति में आए और कुर्सी पर न बैठे। अतः उनका आग्रह केवल सत्ता तक ही सीमित होकर रह गया। वजह स्पष्ट थी। सत्ता में रहते हुए ही हित सर्वदा सुरक्षित रह सकते हैं। परिणामस्वरूप, सरकार चाहे किसी भी दल की हो, वह हर सरकार की कैबिनेट में अहम विभाग के मंत्री के रूप में नजर आते।  वह कभी ‘आया राम, गया राम’ बनने में झिझक महसूस नहीं करते। उनका तो बस एक ही सपना था कि जब दुनिया से विदा हों, उनका नश्वर शरीर तिरंगे में लिपटा नजर आए ताकि लोगों को उनकी राष्ट्रभक्ति के बारे में जरा भी संदेह न रहे। पंडित यह बात भली-भांति जानते थे कि राजनीति में नैतिकता का दिखना उतना ही मुश्किल है जितना कि चील के घोंसले में मांस ढूंढना। इसीलिए औरों की देखा-देखी उन्होंने नैतिकता को वैसे ही त्याग दिया जैसे धोबी के बोलने पर श्रीराम ने सीता को वन भेज दिया था। उनके लिए सत्य और विकास एक ही सिक्के के दो पहलू थे। इसी कारण उन्होंने विकास के लिए अपना सत्याग्रह सदा जीवंत रखा। विकास की इस दौड़ में उन्होंने अपनी सात पीढि़यों के लिए कई जखीरे जमा कर लिए। सत्य की रक्षा में उन्होंने कभी इस बात पर शर्म महसूस नहीं की कि आज जिस व्यक्ति या पार्टी को गाली दे रहे हैं, कल उसी के गले में बाहें डालकर संयुक्त बयान जारी करने पड़ सकते हैं। चुनावों में जिस पार्टी की लानत-मलानत कर वोट मांगते, उस पार्टी के साथ सरकार बनाने से भी नहीं कतराते। सत्य की रक्षा ही उनके जीवन का परम लक्ष्य था। आखिरकार, बापू ने भी सत्य की रक्षा के लिए ही अपने प्राणों का उत्सर्ग किया था। जब सत्य की रक्षा हो जाती तो वह सार्वजनिक रूप से घोषणा करने में गर्व महसूस करते कि उन्हें सत्य और विकास की चिंता है, इसीलिए सत्ता में आए हैं। फिर महाभारत को उद्धृत करते हुए कहते कि राजनीति में कोई किसी का स्थायी मित्र या शत्रु नहीं होता। केवल विकास सर्वोपरि होता है। कृष्ण ने भी तो कई बार धर्म की रक्षा के लिए अधर्म का सहारा लिया था। फिर जगत में सत्य या असत्य जैसा कुछ भी नहीं होता। अपने हितों की रक्षा के लिए जिस बात का बार-बार जाप किया जाए, बस वही सत्य होता है। जब जगत ही मिथ्या है तो फिर जगत में सत्य-असत्य कहां रह सकते हैं। केवल अपने हित ही सत्य होते हैं।