पत्रकारों के खिलाफ बढ़ती हिंसा

योगेश कुमार गोयल

वरिष्ठ पत्रकार

प्रेस को लोकतंत्र में सदैव चौथे स्तंभ की संज्ञा दी जाती रही है, क्योंकि इसकी लोकतंत्र की मजबूती में बेहद महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। यही कारण है कि स्वस्थ और मजबूत लोकतंत्र के लिए प्रेस की स्वतंत्रता को बहुत अहम माना गया है, लेकिन पेरिस स्थित ‘रिपोर्टर्स सैन्स फं्रटियर्स’ (आरएसएफ) अथवा रिपोर्टर्स विदआउट बॉर्डर्स नामक संस्था ने 18 अप्रैल को जारी अपनी वार्षिक रिपोर्ट में भारत में प्रेस की स्वतंत्रता को लेकर जो तथ्य पेश किए हैं, उससे हर किसी को असहनीय झटका लगा है। एक तरफ जहां देश में लोकसभा चुनाव का दौर चल रहा है और इस चुनावी माहौल में प्रेस की भूमिका अत्यधिक महत्त्वपूर्ण मानी जाती है, ऐसे में यह तथ्य सामने आना कि भारत प्रेस की स्वतंत्रता के मामले में दो पायदान नीचे खिसक गया है, बेहद चिंता का विषय है। कुल 180 देशों पर आधारित इस रिपोर्ट के मुताबिक भारत अब 140वें स्थान पर पहुंच गया है, जो 2017 में 136वें और 2018 में 138वें पायदान पर था। ‘रिपोर्टर्स विदआउट बॉर्डर्स’ एक ऐसा गैर लाभकारी संगठन है, जो दुनियाभर के पत्रकारों पर हमलों का दस्तावेजीकरण करने और मुकाबला करने के लिए कार्यरत है और प्रतिवर्ष ‘वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स’ अर्थात ‘विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक’ नामक रिपोर्ट पेश करता है। विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक-2019  में उसने भारत में प्रेस की स्वतंत्रता की स्थिति की विवेचना करते हुए यह भी स्पष्ट किया है कि किस प्रकार विश्वभर में पत्रकारों के खिलाफ घृणा हिंसा में बदल गई है, जिससे दुनियाभर में पत्रकारों में डर बढ़ा है। सऊदी अरब के जमाल खगोशी की षड्यंत्रपूर्ण हत्या पत्रकारों के प्रति ऐसी ही घृणा व दुश्मनी का जीता-जागता उदाहरण है। भारत को लेकर चिंता जताते हुए कहा गया है कि कट्टरवादी राष्ट्रवादियों के ऑनलाइन अभियानों का पत्रकार तेजी से निशाना बन रहे हैं, साथ ही ऐसे कथित राष्ट्रवादी शारीरिक हिंसा की धमकी भी देते हैं। रिपोर्ट में भारत में चुनाव प्रचार के वर्तमान दौर को पत्रकारों के लिए सबसे खतरनाक वक्त के तौर पर चिन्हित किया गया है। हालांकि इस तथ्य को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि चुनावी दौर ऐसा वक्त होता है, जहां मीडिया की नैतिकता भी दांव पर लगी होती है। इससे भी बड़ी हकीकत यह है कि चुनावों के इस दौर में पत्रकारों की जान सबसे ज्यादा जोखिम में रहती है। रिपोर्टर्स विदआउट बॉर्डर्स की रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय पत्रकारों को कई तरह के खतरों का सामना करना पड़ता है। वर्ष 2018 में भारत में अपने कार्य के चलते कम से कम छह पत्रकारों की हत्या कर दी गई, जबकि सातवें मामले में भी संदेह व्यक्त किया गया है। कई पत्रकारों पर जानलेवा हमले किए गए, कई पत्रकारों के साथ मारपीट या धमकी की घटनाएं घटित हुईं, तो कई पत्रकारों को अपने खिलाफ ‘हेट कैंपेन’ का भी सामना करना पड़ा, जिसमें सोशल मीडिया पर जान से मारने की धमकी देना आम बात रही। कहा गया है कि ये हत्याएं बताती हैं कि भारतीय पत्रकार कई तरह के खतरों का सामना करते हैं, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में गैर-अंग्रेजी भाषी मीडिया के लिए कार्यरत पत्रकार। भारत में हिंदुत्व वाले विषयों पर बोलने या लिखने वाले पत्रकारों के खिलाफ सोशल मीडिया पर घृणित अभियानों पर चिंता जताने के साथ रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि प्रशासन जिन क्षेत्रों को संवेदनशील मानता है, वहां रिपोर्टिंग करना बहुत मुश्किल है। संगठन की रिपोर्ट में एक हिंदी अखबार के दो पत्रकारों नवीन निश्चल तथा विजय सिंह की हत्या का जिक्र करते हुए पहले ही यह खुलासा किया जा चुका है कि भारत में पत्रकारों की हत्या के लिए बर्बर तरीकों का इस्तेमाल किया गया है। उल्लेख किया गया है कि बिहार के एक ग्राम प्रधान ने अपने खिलाफ रिपोर्टिंग को लेकर गत वर्ष 25 मार्च को किस प्रकार इन दो पत्रकारों के ऊपर एसयूवी कार चढ़ाकर इनकी हत्या कर दी थी। इसी प्रकार मध्य प्रदेश में स्थानीय खनन माफिया को लेकर रिपोर्टिंग कर रहे पत्रकार पर ट्रक चढ़ाकर उसे मार दिया गया था। रिपोर्टर्स विदआउट बॉर्डर्स के अनुसार पत्रकारों के लिहाज से दुनिया के पांच सबसे खतरनाक देशों में भारत के अलावा अमरीका, मैक्सिको, यमन, सीरिया और अफगानिस्तान भी शामिल हैं, जहां कई पत्रकारों को जान से हाथ धोना पड़ा। इन देशों में पत्रकार तब मारे गए, जब वहां पर न किसी तरह का कोई युद्ध चल रहा था और न ही कोई विवाद। गत वर्ष अफगानिस्तान में सर्वाधिक 15 पत्रकारों की हत्या की गई और पत्रकारों पर हमलों की इस सूची में वह शीर्ष पर है। प्रेस की आजादी के मामले में सबसे बेहतर स्थिति नार्वे की है। जहां तक भारत में प्रेस की आजादी की बात है, तो कुछ लोगों का कहना है कि इस समय हम दूसरे आपातकाल के दौर से गुजर रहे हैं, लेकिन वास्तविकता यही है कि सरकारी तौर पर प्रेस पर न कोई प्रतिबंध है और न ही सेंसरशिप। आपातकाल के दौरान कानूनी तौर से अवश्य मीडिया पर सेंसरशिप लागू हुई थी, लेकिन उसके बाद मीडिया पर सरकारी तौर पर ऐसी पाबंदी कभी देखने को नहीं मिली। रिपोर्टर्स विदआउट बॉर्डर्स की रिपोर्ट में स्पष्ट कहा गया है कि भारत में प्रेस स्वतंत्रता की वर्तमान स्थिति में से एक पत्रकारों के खिलाफ हिंसा है, जिसमें पुलिस की हिंसा, माओवादियों के हमले, अपराधी समूहों या भ्रष्ट राजनीतिज्ञों का प्रतिशोध शामिल है। इसका सीधा और स्पष्ट अर्थ यही है कि अगर कहीं भी कुछ गलत या अनैतिक हो रहा है, जिसे दबाने या छिपाने की कोशिश की जा रही हो तथा कोई पत्रकार उसे उजागर करने का प्रयास करता है, तो वह अपनी जान जोखिम में डाल रहा होता है। ऐसे में उस पत्रकार की जुबान पर ताला लगाने के लिए साम, दाम, दंड, भेद हर प्रकार के अनैतिक तरीकों का इस्तेमाल किया जाता है और न मानने पर कई बार ऐसे पत्रकार की सांसें बंद करने के भी पुख्ता इंतजाम कर दिए जाते हैं। पत्रकारों की हत्या करना मीडिया पर दबाव बनाने का सबसे आखिरी और क्रूरतम तरीका है। ऐसे में देश में प्रेस की स्वतंत्रता बरकरार रहे, इसके लिए पत्रकार सुरक्षा को लेकर कड़े कानून बनाने होंगे, ताकि बिना किसी दबाव या भय के पत्रकार अपना कर्त्तव्य बखूबी निभाते रहें।