Sunday, July 12, 2020 02:55 PM

परमात्मा के हाथ में

श्रीराम शर्मा

इस सृष्टि के कण-कण का विधान परमात्मा के हाथ में है। उसे चाहे अटल नियम कहें, काल कहें, विधाता या परमेश्वर कहें, बात  एक ही है। उसे मानना अवश्य पड़ता है, उससे बुद्धि को एक स्थिति प्राप्त होती है। इसके बिना मनुष्य को न तो विश्राम मिलता है और न अहंकार ही छूटता है। बुद्धि भी भ्रमित रहती है। किंतु मनुष्य का निज का भी अपने भाग्य-विधान से कुछ संबंध अवश्य है। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि मनुष्य स्वाधीन नहीं है, उसका जीवन परमात्मा के विधान के अनुसार ही चलता है। न्याय की दृष्टि से उसका विधान भी स्वतंत्र होना चाहिए। यह बात ठीक भी है। ईश्वर ने कर्म फल का एक सुदृढ़ नियम बना दिया है, इसी के अनुसार मनुष्य का भाग्य बनता बिगड़ता है। भ्रम इस बात से पैदा हो जाता है कि कई बार प्रत्यक्ष रूप से कर्म करने पर भी विपरीत परिणाम प्राप्त हो जाते हैं, तो लोग उसे भाग्यचक्र मानकर परमात्मा को दोष देने लगते हैं। किंतु यह भाग्य तो अपने पूर्व संचित कर्मों का ही परिणाम है। यहां मनुष्य जीवन के विराट रूप की कल्पना की गई है और एक जीवन का दूसरे जीवन से संस्कारजन्य संबंध माना गया है। इस दृष्टि से भी जिसे आज भाग्य कहकर पुकारते हैं, यह भी कल के अपने ही कर्म का परिणाम है। सृष्टि के प्राणियों में चेष्टा न हो तो अब तक जो ऐतिहासिक विकास हुआ है, उसकी कल्पना नहीं की जा सकती थी। भाग्य का रोना रोने का अर्थ तो इतना ही समझ में आता है कि हम अपने कर्म के लिए सचेत नहीं हो पाए हैं। अपनी शक्तियों का दुरुपयोग अब नहीं तो तब किया था, जिसका कट आघात भोगना पड़ रहा है, पर प्राकृतिक विधान के अनुसार तो यह भाग्य अपनी ही रचना है। अपने ही किए हुए का प्रतिफल है। मनुष्य भाग्य के वश में नहीं हो सकता क्योंकि उसका निर्माता मनुष्य स्वयं है। परमात्मा के न्याय में अभेद देखें तो यही बात पुष्ट होती है कि भाग्य स्वयं हमारे द्वारा अपने को संपन्न करता है, उसका स्वतंत्र अस्तित्व कुछ भी नहीं है। वास्तव में हमें शिक्षा लेनी चाहिए कि कर्म फल किसी भी दशा में नष्ट नहीं होता। किसी न किसी समय वह अवश्य सामने आता है। विवशतावश उस समय उसे भले ही भाग्य कहकर टाल दिया जाए, पर उससे कर्म फल का सिद्धांत तो नहीं मिट सकता। हम जैसा करेंगे वैसा ही तो भरेंगे। यदि स्वच्छापूर्वक परमात्मा ही जिसे जो जी चाहे देने लगे, तो इस सृष्टि की सारी न्याय, व्यवस्था बिगड़ जाएगी। हम उस स्वतंत्रता को किस तरह काम में लगाएं, यह एक अलग बात है, किंतु अपना कल्याण करने का अधिकार हमें ही है। न इसके लिए किसी को दोषी ठहराया जा सकता है और न किसी के भरोसे ही बैठा जा सकता है। अपने सुख-दुःख, उन्नति-अवनति और स्वर्ग-नरक का कारण मनुष्य स्वयं है। फिर दुःख या आपत्ति के समय भाग्य के नाम पर संतोष कर लेना और भावी सुधार के प्रति अकर्मण्य बन जाना ठीक नहीं है। ऐसी स्थिति आने पर तो हमें यह अनुभव करना चाहिए कि हमसे जरूर कोई न कोई भूल हुई है और उस पर पश्चाताप करना चाहिए। यथा संयम न रखने के कारण आपका स्वास्थ्य गिर गया है।

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