Friday, September 20, 2019 12:56 AM

पर्यटन का आपराधिक कचरा

जिन परिस्थितियों में चिंतपूर्णी की एक बेटी से दुराचार हुआ है, उनमें पर्यटन के रास्ते आते अपराध पर खबरदार होना पड़ेगा। मंदिर आस्था के नाम पर घूमते अपराध के सायों ने जो कालिख पोती है, उसके बावजूद हम इसे केवल पुलिस कार्रवाई के तहत देखेंगे जबकि भीड़ में छिपा तंत्र अब केवल श्रद्धा भाव का जागरण नहीं कर रहा। अगर इसे सामान्य मंदिर व्यवस्था के तहत देखेंगे, तो इस दर्द की समीक्षा नहीं होगी। पर्यटन को माकूल बनाने के लिए यह भी जरूरी है कि इसके आकार-प्रकार को चिन्हित किया जाए। विभागीय गिनती में दो करोड़ के करीब पर्यटकों का प्रदेश आगमन इसी तरह के लोगों को इंगित कर रहा है, जिससेपहाड़ अपराध की चरागाह है या गिद्ध की नजर से पर्यटन अभिशप्त हो रहा है। विडंबना यह है कि भीड़ में पर्यटक समुदाय तो रहता नहीं, अलबत्ता अनावश्यक रूप से हिमाचल के दबाव बढ़ जाते हैं। बरसात के मौसम में पर्यटन को परास्त करती भीड़ साल की सबसे बड़ी चुनौती बन जाती है, जो न मंदिर की आय बढ़ा रही है और न ही पर्यटक सरोकार दिखा रही है। चिंतपूर्णी इसी तरह के कचरे में दबा, तो हर धार्मिक स्थल का यही हाल है। ऐसे में मंदिर व्यवस्था के साथ शहरी व कानून व्यवस्था भी अलर्ट पर होनी चाहिए। भीड़ से धार्मिक पर्यटक को अलहदा करने के लिए यह जरूरी है कि बरसाती मेलों के दिशा निर्देश तय किए जाएं। इसके लिए बाकायदा प्रवेश द्वारों पर पूर्ण जांच तथा पंजीकरण इस लिहाज से हो कि श्रद्धालु अपनी सेहत व निवास के दस्तावेज दें। हिमाचल की धार्मिक यात्राओं या मेलों के लिए बाहरी राज्यों से आ रहे श्रद्धालुओं की जांच की पूर्ण व्यवस्था के अलावा मुख्य मंदिर परिसरों को पवित्र धार्मिक नगरियों के हिसाब से चाक चौबंद किया जाए। इसके लिए मंदिर परिसरों से करीब बीस किलोमीटर दूर ही सभी प्रकार के पर्यटक वाहन रोकते हुए आगे का सफर मंदिर ट्रांसपोर्ट सिस्टम के तहत सुनिश्चित किया जाए। यह एलिवेटिड ट्रांसपोर्ट नेटवर्क या मंदिर प्रशासन के अपने इलेक्ट्रिक वाहनों द्वारा संभव हो सकता है। ऐसे मेलों में ट्रैफिक नियमों की अवहेलना को त्वरित प्रभाव से रोकते हुए, माल वाहनों में यात्रियों की ढुलाई प्रतिबंधित करनी होगी जबकि दोपहिया वाहन चालकों को हेल्मेट के बिना चलने से रोकना होगा। बढ़ते पर्यटक सैलाब ने व्यावसायिक उद्दंडता कायम की है और एक तंत्र के मानिंद राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय खतरे हमारे आसपास मंडराने लगे हैं। पूरा पर्यटन उद्योग हिमाचल का प्रतिनिधित्व करे, इसके लिए नियम व कानून बनाने पड़ेंगे। वर्तमान में विदेशी पर्यटकों के आसपास मंडराते योग, पंचकर्म या प्राकृतिक चिकित्सा केंद्रों के मार्फत एक ऐसा माफिया भी तैयार हो चुका है, जिसका ताल्लुक न भारतीय परंपराओं से है और न ही इनका काई सीधा परिचय हिमाचल से जुड़ता है। इस तरह एक अड्डे की तरह हिमाचल का पर्यटन इस्तेमाल करने वाले तंत्र के खिलाफ सचेत होने की आवश्यकता है। पर्यटन का जो हिस्सा नजरअंदाज हो रहा है, उसके कारण प्रदेश की बदनामी नागरिक समाज को भी कलंकित कर रही है। धीरे-धीरे नशे के धुएं में बदनाम हुई बस्तियां अब पर्यटन संभावनाओं के अक्स में अपमानित हैं। ऐसा पर्यटन कबूल नहीं किया जा सकता और न ही हिमाचल को अपनी आबादी से तीन गुना अधिक पर्यटक आंकड़े जुटा कर कोई लाभ हासिल हो रहा है। ऐसे में भीड़ और वास्तविक पर्यटक में अंतर समझते हुए क्वालिटी टूरिज्म के परिदृश्य को और मजबूत करना होगा। अगर सड़कों पर बिना हेल्मेट चार-चार सवारियां ढोते बाइक न रोके या धार्मिक यात्रा के नाम पर आपराधिक तत्त्व नजरअंदाज करते रहे, तो यह प्रदेश अपनी खूबियों और संभावनाओं को अभिशप्त कर लेगा। हाई एंड टूरिस्ट के लिए हिमाचल को अपनी पवित्रता व सहजता के साथ-साथ सतर्कता बरतते हुए छवि को परिमार्जित करना होगा, वरना भीड़ की कोई मंजिल नहीं होती।