Monday, October 21, 2019 08:48 AM

पर्यटन छूने की तमन्ना

नई राहों पर पर्यटन की मंजिलें तय करते हिमाचल के सपने अब हकीकत  की पलकों पर सवार हो रहे हैं। पहली प्रस्तुति का चुनिंदा प्रयास पर्यटन नक्शा बदलने और विस्तारित करने की मुहिम सरीखा है, तो इसी के आलोक में जंजैहली, बीड़-बिलिंग, पौंग जलाशय और चांशल घाटी में उभरती अधोसंरचना का खाका स्पष्ट हो रहा है। जाहिर तौर पर यह पर्यटन का नया मॉडल है और नई परिभाषा को जोड़ने का संकल्प भी। अछूते पर्यटन को छूने की तमन्ना अगर ध्येय बन जाए, तो आगामी वर्षों में जंजैहली का अपना एक अलग कारवां होगा, लेकिन इससे पहले उस क्षमता को निर्धारित व स्वीकार करने की जरूरत भी है, जो सैलानियों की बढ़ती तादाद में पूरे क्षेत्र को जकड़ने की कोशिश करेगी। यानी जंजैहली घाटी एक डेस्टीनेशन के शृंगार में जो भी ऊर्जा या आकर्षण अर्जित करती है, उसके साथ यह भी नत्थी करना पड़ेगा कि हम किस तरह के पर्यटन को यहां आजमाएंगे। केरल की तर्ज पर आगे बढ़ें, तो पहले से ही यह तय करना होगा कि पर्यटन की कैरिंग कैपेसिटी बूते के भीतर रहे। इसके लिए पूरे क्षेत्र और उस प्रवेश द्वार को सशक्त करना होगा जहां से कोई राह जंजैहली तक का सफर बन जाती है। यह इसलिए भी क्योंकि पर्यटक सीजन में आती अनियंत्रित भीड़ ने प्रमुख स्थलों को ट्रैफिक जाम, अवैध निर्माण, गंदगी की भरमार व अव्यवस्था से रू-ब-रू कराना शुरू कर दिया है। कल जंजैहली, बीड़-बिलिंग या चांशल घाटी भी भीड़ का मुकाम न बन जाए, इस पर कई तरह से तवज्जो देने की जरूरत है। पहली कोशिश नए पर्यटक स्थलों को रोड नेटवर्क से परिपूर्ण करने तथा यातायात के वैकल्पिक साधनों से जोड़ने की रहेगी। ऐसी मंजिलों को एक बिंदु के बजाय इनकी परिधि में अनेक केंद्रों की श्रृंखला बनाकर विकसित करना होगा, ताकि पर्यटक को भीड़ बनने का मौका न मिले। यह भी देखना होगा कि नई मंजिलों की अवधारणा में अविकसित रह गए धरोहर-ऐतिहासिक स्थल, जल संसाधन तथा अति चर्चित पर्यटक स्थल खुद में नई मंजिलों से महरूम न हो जाएं। नए पर्यटक स्थलों को शहरी विकास के खाके में पहले दिन से ही निर्धारित करना होगा। बीड़-बिलिंग में भले ही विशेष क्षेत्र विकास का बाड़ लगा दिया हो, लेकिन इसकी भावना व संभावना का सरेआम उल्लंघन हो रहा है। ऐसे में पर्यटन की नई मंजिलें स्थापित करते हुए एक विस्तृत टूरिस्ट  सर्किट की परिकल्पना को साकार करना होगा, जिसके तहत शहरी नियोजन के साथ-साथ वहां की भौगोलिक परिस्थितियों से निर्धारित आकर्षण को एक पैकेज के रूप में प्रस्तुत करना होगा। प्रदेश सरकार को ग्रामीण पर्यटन या पर्यटक गांव के रूप में हर विधानसभा क्षेत्र में कम से कम एक स्थान चिन्हित करते हुए विभिन्न विभागों के कौशल, बजट व संभावना से पुष्ट करना होगा। प्रदेश सरकार ने पर्यटन संबंधी अपने विजन की जो इमारत खड़ी करनी शुरू की है उसमें कई रोशनदान दिखाई दे रहे हैं। ऐसे ही एक दरवाजा पौंग बांध की तरफ खुल रहा है और अगर रैंसर टापू पर निवेश की रौनक पैदा होती है, तो इसके आगे चलकर कई आयाम स्थापित हो सकते हैं। पौंग बांध की क्षमता में इक्का-दुक्का प्रयास नाकाफी होंगे, बल्कि इसे इसकी क्षमता में परिभाषित करते हुए भविष्य का मॉडल बनाया जा सकता है। पौंग के साथ ही हरिपुर-गुलेर व गरली-परागपुर के धरोहर महत्त्व में सिने पर्यटन की खिड़की खुलती है, अतः फिल्म सिटी के लिए यहां पहल होनी चाहिए।