Tuesday, March 31, 2020 08:12 PM

पर्यटन सीजन से पहले

वैसे तो अब हिमाचल में पर्यटन को सीजन में देखना अनुचित होगा, लेकिन कुछ तो है कि गर्मियों में प्रदेश की रिवायत में यही तहजीब बन जाता है। इस साल इन्वेस्टर मीट ने पर्यटन को अहमियत दी या ग्राउंड ब्रेकिंग में पच्चीस करोड़ निवेश की खबर ने प्रदेश को नए दौर की उपमा दी है। यह गणतंत्र दिवस की झांकियों में कुल्लू दशहरा को राजपथ पर सजाते प्रदेश की थाती हो या सूरजकुंड मेले के प्रमुख थीम में उभरते हिमाचल प्रदेश की तस्वीर हो, पर्यटन की धमनियों में संभावना से भरा कौतुक है। हर साल ग्रीष्मकालीन पर्यटन प्रदेश को इतना भर देता है कि कहीं-कहीं सैलानी ही भीड़ बन जाते हैं या भीड़ के बीच सीजन की गरिमा चोटिल हो जाती है। जाहिर है पर्यटन एक तरह से प्रगति का कारवां है, तो इस अंदाज को विस्तृत आकार व जिम्मेदारी के एहसास में स्थापित करना होगा। हर पर्यटन सीजन की शिकायत में कुछ विभागीय दिक्कतों का जिक्र तो स्थायी रूप से होने लगा है, लेकिन डेस्टिनेशन का हाल भी हाय तौबा मचाता है। ऐसे में जबकि सरकार नई राहों, नई मंजिलों को चमकाना चाहती है, यह गौर भी करना होगा कि हम कब तक एक तरह के प्रचार में पर्यटन की गाड़ी खींच सकते। कमोबेश इस सीजन में भी वही मनाली या मकलोडगंज बने रहेंगे। शिकारी देवी की राहों पर वही जोश रहेगा। मंदिरों के आसपास पर्यटन की थाली में वही सिंदूर रहेगा। क्या इस साल हिमाचल की पेशकश अलग होगी या जिसने गणतंत्र परेड की झांकी में कुछ देखा होगा उसे रुह पर उतारने के लिए पर्यटन का अवतार बदल जाएगा। जो सूरजकुंड में हिमाचली छटा से अभिभूत हुए, उन्हें इस बार का निमंत्रण नया क्या देगा। हम किस सड़क मार्ग से पर्यटन को सबसे अधिक राहत देंगे, यह प्रश्न क्या हम पीडब्ल्यूडी महकमे से पूछ पाएंगे। क्या पर्यटन स्थलों पर आईपीएच की जलापूर्ति इस काबिल रहेगी कि सैलानी भरपूर ढंग से नहा सकें या खड्डों से पानी ढोते टैंकरों के लिए ही यह सीजन होगा। कहां वन-वे या किस बाजार को ‘नो ट्रैफिक जोन’ घोषित करना होगा, शायद यह सोच अभी हमें कागजी लगता है। हम पर्यटक के बजाय होटल व्यवसायी या दुकानदारी में ही सीजन जमाना चाहते हैं, इसलिए न गंदगी और न ही यातायात व्यवस्था के स्थायी समाधानों की दृष्टि से ढांचा विकसित हो पाता है। हिमाचल की मात्र सत्तर लाख आबादी की अपनी समस्याएं हैं जो पर्यटन सीजन के दौरान कम नहीं होतीं, तो इससे तीन गुना सैलानियों का स्वागत करने की वजह व सुविधाओं के बीच सामंजस्य चाहिए। पर्यटन सीजन को व्यवस्थित करने के लिए सैलानियों से अनुशासित व्यवहार की अपेक्षा करने से पहले कुछ ढांचागत विकास की जरूरत है। मसलन पर्यटन आगमन को हम प्रबंधकीय हिसाब से देखें, तो सर्वप्रथम परिवहन व यातायात व्यवस्था को सक्षम बनाना होगा। इसी के साथ पार्किंग का आधार या ऐसी सोहबत बनानी होगी, जो स्थानीय नागरिकों के लिए आदर्श बने। पालमपुर शहर में प्रशासन, नागरिक व व्यापारिक संस्थान प्रमुख बाजार को चंद घंटों के लिए मालरोड की तर्ज पर वाहन रहित जोन बनाने को प्रयासरत हैं, तो यह हर शहर की व्यवस्था में एक अनिवार्य समाधान है। इतना ही नहीं हिमाचल के हर शहरी निकाय को अपनी तस्वीर में पर्यटन व मनोरंजन के पक्ष को मजबूत करना होगा। ताज्जुब यह है कि प्रसिद्ध पर्यटन शहरों व धार्मिक स्थलों की सफाई व्यवस्था की बेडि़यां कस रही हैं, जबकि ठोस कचरा प्रबंधन की खामियों के कारण हिमाचल का नाम बदनाम हो रहा है। क्या हम भेड़चाल पर्यटन के काबिल ही रहेंगे, क्योंकि एक बार तो भीड़ के अभिप्राय में लोग आ जाते हैं, लेकिन क्षमतावान पर्यटन तौबा कर जाता है। कोशिश करें कि पर्यटन यहां भीड़ की तरह संबोधित न हो। खासतौर पर ट्रैकिंग व अन्य साहसिक खेलों के प्रति रुचि, ईको टूरिज्म की मंजिलों को भी परेशानी में डाल रही है। पर्यटक को जो सुकून चाहिए, वह उसकी यात्रा से शुरू होकर अनुभव की पराकाष्ठा है। इसके लिए अच्छी सड़क, परिवहन सेवा, मैत्रीपूर्ण पुलिस-प्रशासन का व्यवहार, बस अड्डा, मनोरंजन सुविधाएं, स्वच्छता के साथ-साथ स्थानीय लोगों, व्यापार मंडलों तथा होटल प्रबंधकों का उच्चतम व्यवहार भी अपरिहार्य है। क्या हम गोवा, गुजरात, राजस्थान, केरल या कर्नाटक जैसे राज्यों की पर्यटन परिभाषा में इस सीजन से पहले कुछ सीख पाएंगे।