Monday, April 06, 2020 06:29 PM

पर्याप्त रचनाओं से परिपूर्ण है हिमाचल का साहित्यिक परिदृश्य

डा. हेमराज कौशिक

मो.-9418010646

साहित्य के कितना करीब हिमाचल-1

अतिथि संपादक : डा. हेमराज कौशिक

हिमाचल साहित्य के कितना करीब है, इस विषय की पड़ताल हमने अपनी इस नई साहित्यिक सीरीज में की है। साहित्य से हिमाचल की नजदीकियां इस सीरीज में देखी जा सकती हैं। पेश है इस विषय पर सीरीज की

पहली किस्त...

विमर्श के बिंदु

* हिमाचल के भाषायी सरोकार और जनता के बीच लेखक समुदाय

* हिमाचल का साहित्यिक माहौल और उत्प्रेरणा, साहित्यिक संस्थाएं, संगठन और आयोजन

* साहित्यिक अवलोकन से मूल्यांकन तक, मुख्यधारा में हिमाचली साहित्यकारों की उपस्थिति

* हिमाचल में पुस्तक मेलों से लिट फेस्ट तक भाषा विभाग या निजी प्रयास के बीच रिक्तता

* क्या हिमाचल में साहित्य का उद्देश्य सिकुड़ रहा है?

* हिमाचल में हिंदी, अंग्रेजी और लोक साहित्य में अध्ययन से अध्यापन तक की विरक्तता

* हिमाचल के बौद्धिक विकास से साहित्यिक दूरियां

* साहित्यिक समाज की हिमाचल में घटती प्रासंगिकता तथा मौलिक चिंतन का अभाव

* साहित्य से किनारा करते हिमाचली युवा, कारण-समाधान

* लेखन का हिमाचली अभिप्राय व प्रासंगिकता, पाठ्यक्रम में साहित्य की मात्रा अनुचित/उचित

* साहित्यिक आयोजनों में बदलाव की गुंजाइश, सरकारी प्रकाशनों में हिमाचली साहित्य

साहित्य, समाज और संस्कृति परस्पर अविच्छिन्न रूप में संबद्ध हैं। हिमाचल प्रदेश साहित्य के कितना करीब है, इस दृष्टि से हिमाचल के साहित्य-परिदृश्य का अवलोकन करें तो हमें ज्ञात होता है कि चंद्रधर शर्मा गुलेरी हिमाचल में साहित्य के प्रस्थान बिंदु हैं जहां से एक समृद्ध शुरुआत होती है। सन् 1915 में प्रकाशित ‘उसने कहा था’ प्रथम आधुनिक कहानी मानी जाती है। वह संस्कृत के प्रकांड पंडित, भाषाविद, निबंधकार और संपादक थे। गुलेरी जी के बाद हिमाचल के परिदृश्य में दूसरा महान व्यक्तित्व क्रांतिकारी साहित्यकार यशपाल हैं जिनकी सृजन यात्रा सन् 1939 में प्रकाशित ‘पिंजरे की उड़ान’ से होती है और निरंतर चार दशकों तक सृजनरत रह कर उन्होंने उपन्यास, कहानी, संस्मरण, यात्रा वृत्तांत आदि विधाओं में पचास से अधिक कृतियों का सृजन किया। यशपाल के बाद गुलेरी जी के सुपुत्र योगेश्वर गुलेरी की सन् 1952 तक की अवधि में सम्मेलन पत्रिका, विशाल भारत, नया समाज आदि पत्रिकाओं में कहानियां प्रकाशित हुईं। सन् 1948 में कृष्ण कुमार नूतन ने ‘परिप्रभा’ शीर्षक से कहानियों की एक लघु पुस्तक प्रकाशित की थी। कहानी संग्रह के प्रकाशन की दृष्टि से सन् 1957 में सुशील अवस्थी का प्रथम कहानी संग्रह राखी शीर्षक से प्रकाशित हुआ और 1959 में सत्येन के संपादन में ‘बर्फ  के हीरे’ शीर्षक से पहला संपादित संग्रह प्रकाश में आया।

हिंदी में स्थापित कथाकार निर्मल वर्मा का भी हिमाचल से संबंध रहा है। ‘लालटीन की छत’ में हिमाचली परिवेश है। हिंदी के स्थापित इन प्रमुख रचनाकारों को तनिक किनारे रख कर देखें तो सन् 1956 तक कोई स्वतंत्र कहानी संग्रह प्रकाश में नहीं आया, जबकि नई कविता, नई कहानी को लेकर भिन्न संवेदना भूमि की रचनाएं राष्ट्रीय स्तर पर प्रकाश में आ रही थी। हिमाचल प्रदेश स्वतंत्रता से पूर्व और स्वतंत्रता प्राप्ति के अनंतर छठे दशक तक प्रकाशन की दृष्टि से पिछड़ा ही रहा है। इसका प्रमुख कारण प्रदेश में साहित्यिक पत्रिकाओं का अभाव और लेखकों के लिए किसी प्रकार के मंच का अभाव और प्रकाशन की कठिनाइयां भी ऐसे समय में थीं जब कुछ लेखक हिमाचल प्रदेश के साहित्य-संस्कृति को लेकर सजग थे और राष्ट्रीय स्तर की पत्रिकाओं में प्रकाशित होकर साहित्य सृजन कर रहे थे। सातवें दशक में किशोरी लाल वैद्य, संतोष शैलजा, रमेशचंद्र शर्मा के कहानी संग्रह प्रकाश में आए और सुंदर लोहिया इस अवधि में राष्ट्रीय स्तर की पत्रिकाओं में प्रकाशित हो सके। आठवां दशक हिमाचल में हिमाचली हिंदी कहानी की नई संभावनाओं को लेकर विकसित हुआ। किशोरी लाल वैद्य द्वारा संपादित ‘एक कथा परिवेश’, केशव का ‘फासला’, गंगा राम राजी का युगों पुराना संगीत, सुदर्शन वशिष्ठ का अंतरालों में घटता समय, सुशील कुमार फुल्ल द्वारा संपादित तीन कहानी संग्रह ‘सहज कहानी’, पहचान व पगडंडियां, मस्तराम कपूर का एक अदद औरत और साधु राम दर्शक का धारा बहती रही, शांता कुमार और संतोष शैलजा का सांझा संग्रह ज्योतिर्मयी प्रकाश में आए। ये रचनाकार आठवें दशक से लेकर अब तक सृजनरत हैं और इसके अतिरिक्त नवें दशक से लेकर इस शती के दो दशकों तक बद्रीसिंह भाटिया, राजकुमार राकेश, ओंकार राही, केशव, जगदीश शर्मा, राजकुमार, राममूर्ति, वासुदेव प्रशांत, अरुण भारती, सुशील अवस्थी, एसआर हरनोट, संसारचंद्र प्रभाकर और विजय सहगल के कहानी संग्रह प्रकाश में आए। सदी के अंतिम दशक में इन कहानीकारों के अतिरिक्त त्रिलोक मेहरा, सुंदर लोहिया, नरेश पंडित, श्रीनिवास जोशी, पीसीके प्रेम व राजेंद्र राजन के स्वतंत्र कहानी संग्रह प्रकाशित हुए। सदी के अंतिम दो दशक में हिंदी कथा साहित्य में तीव्रगति से विकास हुआ। महिला कथाकार संतोष शैलजा का ‘टाहलियां’ और सुदर्शना पटियाल का ‘किनारे की तलाश’ कहानी संग्रह प्रकाशित हुए।

श्रीनिवास श्रीकांत ने कथा में ‘पहाड़’ शीर्षक से पर्वतीय जीवन पर केंद्रित कहानियों का वृहद कहानी संग्रह संपादित किया। अजय पाराशर, मुरारी शर्मा, एसआर हरनोट, हंसराज भारती, जयदेव विद्रोही, केआर भारती, बद्रीसिंह भाटिया, गंगाराम राजी, सुशील गौतम, कृष्णा अवस्थी, सुमन शेखर, चंद्ररेखा ढडवाल, आशा शैली, मृदुला श्रीवास्तव, ऊषा आनंद, नीलम शर्मा, अतुल अंशुमाली, पदम गुप्त अमिताभ, पवन चौहान, विक्रम गथानिया, दिनेश धर्मपाल, नरेश पंडित, गुरमीत बेदी, योगेश्वर शर्मा, सतपाल शर्मा, संदीप शर्मा, हिमेंद्र बाली हिम, गुरुदत्त शर्मा, नेमचंद अजनबी, ज्ञान वर्मा, रजनी कांत, रत्न चंद रत्नेश, राज गोपाल शर्मा, भानु प्रताप कुठियाला, शंकरलाल शर्मा प्रभृति कहानीकारों के स्वतंत्र कहानी संग्रह प्रकाशित हुए हैं। अनेक संपादित संग्रहों का प्रकाशन भी हुआ है। कला, संस्कृति और भाषा अकादमी ने भी इस प्रकार का संपादन करवाया है। डा. सुशील कुमार फुल्ल का हिंदी कहानी के सौ वर्ष एक महत्त्वपूर्ण संपादित कहानी संग्रह है। इनके अतिरिक्त बहुत से कहानीकार पत्र-पत्रिकाओं में कहानियां लिख रहे हैं। यशपाल के बाद हिमाचल के हिंदी उपन्यास का शुभारंभ कैलाश भारद्वाज के सन् 1954 में प्रकाशित उपन्यास मीठा जहर से होता है। प्रारंभिक दौर के दो दशकों में रामकृष्ण कौशल, किशोरी लाल वैद्य, विजेंद्र दुसांज, संतराम शर्मा और मनसाराम ‘अरुण’ के उपन्यास प्रकाश में आए। इनमें प्रमुख रूप में छायावादी मानसिकता के दायरे दिखाई देते हैं। आठवें दशक के उपन्यासों में आधुनिकता बोध और आंचलिकता की प्रवृत्ति मुखर होती है। इस अवधि में ओंकार राही, रमेशचंद्र शर्मा, कृष्ण कुमार नूतन के उपन्यास आए। ये उपन्यासकार परवर्ती काल में भी सृजनरत रहे। इनके अतिरिक्त सुदर्शन वशिष्ठ, सुशील कुमार फुल्ल, उत्तम परमार, स्वदेश परमार, शांता कुमार, संतोष शैलजा आदि उपन्यासकार निरंतर औपन्यासिक सृजन में लीन रहे। उनके उपन्यासों में सामाजिक यथार्थ और जीवन के विविध संदर्भों और सामाजिक सराकारों में दायित्वनिष्ठा परिलक्षित होती है। आठवें दशक के अनंतर हिंदी उपन्यास की यात्रा तीव्र गति से अग्रसर होती है। केशव, साधुराम दर्शक, महाराज कृष्ण काव, पीसीके प्रेम, एसआर हरनोट, सुंदर लोहिया, हरिराम जस्टा, गंगाराम राजी, बद्रीसिंह भाटिया, राजकुमार राकेश, राजेंद्र राजन, नागेश भारद्वाज, चंद्ररेखा डढवाल, खेमराज शर्मा, जयनारायण कश्यप, प्रत्यूष गुलेरी, त्रिलोक मेहरा, विक्रम मुसाफिर, सूरत ठाकुर, विक्रम गथानिया, नरवीर लांबा, सतपाल घृतवंशी, पौमिला ठाकुर, अतुल अंशुमाली आदि अनेक रचनाकार हिंदी उपन्यास के परिदृश्य को महिमामंडित कर रहे हैं। इन रचनाकारों में से कुछ रचनाकार राष्ट्रीय उपन्यास धारा में चर्चित हैं और ऐसे रचनाकारों के सृजन पर अनेक शोधार्थी उपाधि सापेक्ष अनुशीलन कर रहे हैं। कुछ उपन्यासकारों पर स्वतंत्र आलोचना पुस्तकें भी आई हैं।

-क्रमशः