Sunday, November 17, 2019 04:21 PM

पर्वतीय आर्थिकी अध्ययन संस्थान

सरकारों की उत्तम सोच का राजनीतिक नुकसान या राजनीतिक लाभ के लिए सरकारी आयाम बदल जाते हैं। इसी के परिप्रेक्ष्य में हिमाचल की सरकारों का विजन अपनी उपलब्धियों का मूल्यांकन कर सकता है। वर्तमान सरकार की इच्छाशक्ति, विजन और कर्मठता के दो पैमाने आपस में रू-ब-रू हैं। एक ओर सियासी संबोधन में पच्छाद और धर्मशाला के उपचुनाव और दूसरी ओर इन्वेस्टर मीट के तराने उस हकीकत से मुकाबिल जो पर्वतीय प्रदेश की आर्थिकी पीड़ा है। हिमाचल को कमोबेश हर सरकार ने आवाज दी और प्रयास किया कि आर्थिक विकास और आत्मनिर्भरता का आगाज किया जाए। सफलता के आदर्श बेशक सामाजिक सुरक्षा के क्षेत्र में सुदृढ़ हुए, लेकिन आत्मनिर्भरता का कौशल और आर्थिकी की निरंतरता में हिमाचल की असफल कहानियों में राजनीति की प्राथमिकताएं हावी रहीं। सरकारों ने समाज को भी अपने केंद्र में निर्भर बनाया, लिहाजा सामाजिक उत्थान कहीं न कहीं सियासी पिंजरों  की कवायद में बंद है। यानी निजी क्षेत्र केवल सीमित व सत्ता पक्ष की खुशामद भर रहा। ऐसे में इन्वेस्टर मीट को अटल विहारी वाजपेयी सरकार के औद्योगिक पैकेज से अलग करके देखने की जरूरत है। यह  सरकार का निजी प्रयास और पूर्व के अंदाज को बदलने की नीयत और नीति का विश्लेषण करेगा। निवेशक के लिए हिमाचल ने अभी तक खुद को कुछ अपनी और कुछ केंद्रीय रियायतों में पेश किया, तो हर बार ‘जमीन’ का इस्तेमाल हुआ। अब तक औद्योगिक राहों में निवेश पुरस्कृत हुआ या शिक्षा के निजीकरण में इसको जगह मिली। निजी निवेश में हिमाचली विकास का एक वांछित स्थान है और इसकी क्षमता में लाभकारी संतुलन बनाया जा सकता है। उम्मीद है इन्वेस्टर मीट के धरातल पर हिमाचल की पेशकश महज जमीन का हस्तांतरण न होकर सहज विकास में निजी निवेश की हिस्सेदारी को तय करे। यानी कल के हिमाचली विकास में आर्थिकी और आत्म निर्भरता के दायरे विकसित हों, तो समाज की सहमति से जरूरतों  का हल निजी निवेश बन जाए। यह हो रहा है और हिमाचल की आबादी का खासा हिस्सा निजी क्षेत्र व निजी क्षेत्र में प्रगति को प्रोत्साहित कर रहा है, बल्कि इन्वेस्टर मीट यह अभिलाषा करेगा कि प्रदेश के आर्थिक अध्ययन के लिए एक राज्य स्तरीय संस्थान बने जिसे बाद में राष्ट्रीय दर्जा मिले। अगर प्रधानमंत्री व केंद्रीय मंत्रियों का इन्वेस्टर मीट में आना तय है, तो पर्वतीय आर्थिकी के संदर्भों में हिमाचल आर्थिकी अध्ययन के संस्थान की नींव पत्थर रख सकता है। राष्ट्रीय सोच में निवेश की समझ का पैमाना व्यापक हो सकता है या शेयर बाजार की सूचीबद्ध कंपनियां अपनी मौजूदगी का सूचकांक देख सकती हैं, लेकिन हिमाचल जैसे पहाड़ी राज्यों की तरक्की के अवरोधक इसकी भौतिक, भौगोलिक, पर्यावरणीय व मौसम की सीमा में निरंतर संघर्ष का तय होना भी है। पहाड़ को बचाने के मायने बहुत बार इसे धकियाने के रहे यानी किसी ने यह अध्ययन नहीं किया कि पौंग-भाखड़ा या अन्य बड़े बांधों के कारण कितना खोना पड़ा। हिमाचल के बांध परियोजनाओं की भरपाई के लिए वन-नीति में सुधार की गुंजाइश देखी जानी चाहिए यानी इनके डूब क्षेत्र के क्षेत्रफल के बराबर का हिस्सा जंगल से मिले तो आर्थिकी का उत्थान होगा। दरअसल निवेश  की संभावनाएं एक विस्तृत लैंड बैंक पर खड़ी होंगी और यहीं से अब तक जाया हुई भूमि को फिर से हासिल करने की जरूरत है। सरकार को अपने ढर्रे व ढांचे में भी सुधार करके जमीन का सही इस्तेमाल करते हुए अतिरिक्त भूमि भविष्य के लिए सुनिश्चित करनी होगी। कमोबेश हिमाचल के प्रमुख शहरों की नई संरचना तथा पुनर्गठन करते हुए यह सुनिश्चित तथा निर्धारित किया जाए कि मानवीय जरूरतों  व सुविधाओं के लिए जमीन कहां से हासिल होगी। पर्वतीय राज्यों की जिला अर्बन प्लानिंग एक साथ करते हुए भविष्य का निवेश निर्धारित किया जा सकता है। यह जिला मुख्यालयों से अंतिम छोर के कस्बे तक  की समग्रता में तय होगा कि किस हिस्से में कितने निवेश की गुंजाइश है। इसी तर्ज पर हर शहर, जिला के लैंड बैंक स्थापित करके औद्योगिक, ट्रांसपोर्ट, शहरी, रियल एस्टेट, मनोरंजन, शिक्षा-चिकित्सा व पर्यटन जैसे क्षेत्रों में भविष्य सुनिश्चित होगा।