Monday, June 01, 2020 02:32 AM

पलायन का ‘लॉकडाउन’ कब

पलायन की भीड़ लॉकडाउन का मकसद ध्वस्त कर सकती है। यह भीड़ कोरोना वायरस को और हवा दे सकती है। यदि यह वायरस पूरी तरह हमारे गांवों तक फैल गया, तो उसके बाद के भयावह प्रलय की कल्पना भी नहीं की जा सकती। ऐसी चेतावनी प्रधानमंत्री, कई मुख्यमंत्रियों और प्रख्यात चिकित्सकों ने कई बार दोहराई है। उसके बावजूद देश की कई प्रमुख सड़कों और राजमार्गों पर भीड़ पैदल चल रही है। गठरी उठाए, छोटे-छोटे बच्चों को पीठ या कंधों पर बिठाए, युवा और बूढ़े लाचार, बेबस चेहरे टीवी चैनलों पर लगातार दिखाए जा रहे हैं। अचानक देश का एक तबका बेरोजगार हो गया है, उसकी जेबें खाली हो गई हैं और वह भुखमरी के कगार पर है। आश्चर्य है कि देश में भुखमरी के कोई भी आसार नहीं हैं। इस बार अनुमान है कि 847 लाख टन के करीब खाद्यान्न की पैदावार होगी। दालें भी करीब 25 लाख टन पैदा हो सकती हैं और चीनी का उत्पादन भी करीब 40 लाख टन संभावित माना जा रहा है। भुखमरी के आसार नहीं हैं, तो राजमार्गों पर पैदल चल रही भीड़ भूखी क्यों है? अकेले दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल 568 स्कूलों और रैन बसेरों में 4 लाख से ज्यादा लोगों को खाना खिलाने का दावा कर रहे हैं। कई मुख्यमंत्रियों ने ऐसी ही घोषणाएं की हैं, फंड तैयार किए हैं और राहत राशि भी दे रहे हैं। फिर इस भीड़ के भीतर बेचैनी और अभाव के बोध क्यों हैं? यदि यही असल भारत की तस्वीर है, तो हम किस भारत में जी रहे हैं? कौन विश्व की आर्थिक महाशक्ति बनने के सपने देख रहा है? किसने बनाया है ऐसा हिंदोस्तान...? चमकते-दमकते भारत के नीचे घनघोर अंधेरा है! दरअसल ये तस्वीरें सामाजिक-आर्थिक विभाजन का आभास कराती हैं। इस भीड़ ने न तो प्रधानमंत्री मोदी के आह्वान को समझा या आत्मसात् किया है, न ही मुख्यमंत्रियों की अपील पर यकीन किया है और न ही कोरोना सरीखी महामारी को गंभीरता से लिया है। यह भीड़ भी हिंदोस्तान है। प्रधानमंत्री और सरकारें जरूर जानती होंगी कि आज भी करीब 27 करोड़ भारतीय ‘गरीबी रेखा के नीचे’ हैं। करीब 19 करोड़ तो भूखे ही सोने को अभिशप्त हैं। ऐसा संभव नहीं था कि सामने कोरोना और गरीब, खाली हाथ भारत दोनों ही मौजूद हों और वायरस से बचने के बंदोबस्त और उपाय न किए जाएं। दिल्ली के आनंद विहार बस अड्डे समेत कई जगहों पर जन-समुद्र दिखाई दिया। भीड़ को बसों में ठूंसकर भरा गया था और कई लोग बसों की छतों पर भी बैठे थे। सड़कों पर भीड़ मौजूद थी, तो एक-दूसरे से चिपक कर लोग खड़े थे। इन स्थितियों में कोरोना वायरस से कैसे लड़ा जा सकता है? लिहाजा प्रधानमंत्री मोदी को ‘मन की बात’ के जरिए कहना पड़ा है कि अब भी लोग बीमारी की गंभीरता को नहीं समझ रहे हैं। हालांकि उन्होंने लॉकडाउन जैसे कड़े फैसलों के लिए देश से क्षमा मांगी है। उन्होंने कोरोना के खिलाफ  लड़ाई को जीवन और मौत की लड़ाई करार दिया है। कमोबेश प्रधानमंत्री की चिंता के भावार्थ को समझिए। फिलहाल भारत में संक्रमितों की संख्या 1040 से अधिक हो गई है। मौतें 26 हो चुकी हैं। सुखद खबर यह है कि 85 से ज्यादा बीमार कोरोना संक्रमण से ठीक भी हुए हैं, लेकिन दुनिया की तस्वीर बेहद डरावनी है। दुनिया में 6.50 लाख से ज्यादा लोग कोरोना से संक्रमित हो चुके हैं और मौतें भी 30 हजार का आंकड़ा पार कर चुकी हैं। इटली में ही मरने वाले 10,000 से ज्यादा हो चुके हैं। ये आंकड़े लगातार बढ़ रहे हैं। साबित हो चुका है कि कोरोना ने किसी देश, सीमा, वर्ग, गांव-कस्बे, नस्ल को नहीं छोड़ा है। यदि अब भी यह भीड़ और देश की जनता यथार्थ को स्वीकार नहीं करती है, तो पूछना पड़ेगा कि आखिर वाकई लॉकडाउन कब तक लागू होगा?