पशुओं से मित्रता समय की मांग

अनुज कुमार आचार्य

लेखक, बैजनाथ से हैं

 

आज खाद्य पदार्थों, सब्जियों, फल, चिकन-अंडे, दूध-दही इत्यादि की आपूर्ति के लिए हम पूर्णतया पड़ोसी राज्यों से आने वाली रसद पर निर्भर हैं। ऐसे में इन क्षेत्रों में परिश्रम, ट्रेनिंग और रुचि लेकर बेहतर परिणाम हासिल किए जा सकते हैं। युवाओं को चाहिए कि वे कृषि एवं पशुपालन विभाग के कार्यालय में जाकर स्वरोजगार संबंधित जरूरी जानकारी जुटाएं तथा हिम्मत, लगन और मेहनत से अपनी आर्थिकी को संवारें...

हिमाचल प्रदेश जैसे पहाड़ी राज्य में जहां आज से 30-35 वर्ष पूर्व, जो पशु किसी कार्य के लिए उपयुक्त नहीं होता था, उसकी भी पुत्रवत देखभाल, सेवा एवं सुरक्षा की जाती थी, लेकिन आज परिस्थितियां बिलकुल विपरीत और दुर्भाग्यपूर्ण रूप ले चुकी हैं। जगह-जगह आवारा घूमते निरीह, असहाय, लाचार, बेजुबान पशुओं के झुंड बाजारों में गंदगी, प्लास्टिक व अन्य चीजों पर जीवित तथा निर्भर रहकर हमारे समाज में व्याप्त मनुष्य की स्वेच्छाचारिता और स्वार्थीपन को सरेआम प्रदर्शित करते घूम रहे हैं। जिन खेत-खलिहानों पर कभी बाड़ नहीं होती थी, वहां आज आवारा घूमते पशुओं के चलते लहलहाती फसलें गायब हो चुकी हैं। कमोबेश सारा दोष हमारा ही है। जो पशुधन कभी ग्रामीण आर्थिकी की रीढ़ हुआ करता था, वही पशुधन आज दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हिंदू धर्म के लगभग ज्यादातर देवी-देवताओं के वाहन पशु-पक्षी ही हैं, जो उनके प्रकृति व पशु प्रेमी होने का सुंदर व सजीव उदाहरण हैं। सभी वस्तुएं रुपए खर्चकर रेडीमेड मिल जाएं वाली प्रवृत्ति व सोच लिए मनुष्य ने आज पशुधन के महत्त्व को लगभग भुला ही दिया है। खेतीबाड़ी, बाग-बागीचों, घरेलू सब्जियां तैयार करना तथा घर-परिवार को पहुंचने वाले लाभ से यदि आज हम वंचित हुए जा रहे हैं, तो दोषी भी हम स्वयं ही हैं।

आज हम आर्गेनिक सब्जियों, दालों की मांग कर रहे हैं, स्वास्थ्यवर्धक एवं पौष्टिक दूध की इच्छा रखते हैं, लेकिन इन चीजों को उपलब्ध करवाने की क्षमता रखने वाले पशुधन को समुचित ठौर-ठिकाना दे पाने में हम नितांत अक्षम हो चुके हैं। हिमाचल प्रदेश के अस्तित्व में आने के बाद से ही कृषि एवं पशुपालन के महत्त्व को देखते हुए और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करने के लिए कई परियोजनाएं चलाई जाती रही हैं। 1948 में  हिमाचल प्रदेश में जहां मात्र 9 पशु चिकित्सालय थे, तो वहीं 31 मार्च, 2017 की स्थिति के अनुसार आज प्रदेश में एक राज्य स्तरीय पशु चिकित्सालय के अलावा वेटरनरी पोलीक्लिनिक के 9, उपमंडलीय पशु चिकित्सालय 48, पशु चिकित्सालय 322, केंद्रीय पशु औषधालय 30, पशु औषधालय 1722 के अलावा मुख्यमंत्री आरोग्य पशुधन योजना के अंतर्गत 1251 पशु औषधालय भी सेवारत हैं। समय-समय पर पशुपालन विभाग के कार्यों को सुचारू रूप से चलाने तथा विभागीय क्रियाकलापों की जानकारी पशुपालकों तक पहुंचाने के लिए कई कार्य योजनाओं को विभाग अमलीजामा पहनाने में जुटा हुआ है, लेकिन इस राह में कुछ मुश्किलें भी हैं। 31 मार्च, 2017 के अनुसार पशुपालन विभाग में 40 श्रेणियों के लिए कुल 6288 पद स्वीकृत थे, जिनमें से 5196 भरे हुए थे, तो 1092 पद रिक्त चल रहे हैं। आवश्यकता है कि प्रदेश सरकार चुनावों के बाद प्राथमिकता के आधार पर इन पदों को भरे। इससे जहां पढ़े-लिखे युवाओं को रोजगार मिलेगा, वहीं विभागीय कामकाज की रफ्तार को भी गति मिलेगी। हिमाचल प्रदेश एक पहाड़ी राज्य होने के कारण यहां के 90 फीसदी लोग कृषि एवं पशुपालन पर निर्भर हैं। 19वीं पशुधन गणना के आंकड़े बताते हैं कि प्रदेश में 48,44,431 के करीब पशुओं की कुल संख्या है। पशुपालन में दूध, ऊन और मांस-अंडों के अलावा डेयरी फार्मिंग, भेड़ पालन, कुक्कुट पालन,  खरगोश पालन जैसी गतिविधियों से भी आय प्राप्त की जा सकती है। ऐसे समय में जब दिन-प्रतिदिन पढ़े-लिखे युवाओं में बेरोजगारी बढ़ती जा रही हो, तो सरकारी योजनाओं का भरपूर लाभ उठाते हुए स्वरोजगार के लिए नकदी फायदा देने वाले व्यवसायों को अपनाकर हमारी युवा पीढ़ी घर में रहकर ही अपनी आर्थिक स्थिति को मजबूत बना सकती है।

आज खाद्य पदार्थों, सब्जियों, फल, चिकन-अंडे, दूध-दही इत्यादि की आपूर्ति के लिए हम पूर्णतया पड़ोसी राज्यों से आने वाली रसद पर निर्भर हैं। ऐसे में इन क्षेत्रों में परिश्रम, ट्रेनिंग और रुचि लेकर बेहतर परिणाम हासिल किए जा सकते हैं। युवाओं को चाहिए कि वे कृषि एवं पशुपालन विभाग के कार्यालय में जाकर स्वरोजगार संबंधित जरूरी जानकारी जुटाएं तथा हिम्मत, लगन और मेहनत से अपनी आर्थिकी को संवारें व अपनी बेरोजगारी को दूर करें। निराश्रित पशुओं को लेकर कुछ गैर सरकारी संस्थाएं एवं न्यास इस दिशा में कार्यरत तो हैं, परंतु बहुतायत में समस्या बरकरार है। प्रकृति व पर्यावरण में संतुलन साधने वाले ऐसे पशुओं से मित्रता व प्रेमभाव प्रदर्शित करना आज समय की जरूरत बन चुका है। सरकारी स्तर पर अब कई योजनाएं सामने आई हैं, जिनके व्यापक प्रचार-प्रसार की आवश्यकता है।

सरकार ने गैर सरकारी संस्थाओं या पशुमित्रों, जो गोशालाएं, गोसदन स्थापित करना चाहते हैं, को  गोशालाओं के निर्माण और चारा खरीद के लिए आर्थिक सहायता की व्यवस्था भी की है। आज पंचायतों को जुर्माना लगाने की शक्तियां देने के अलावा जिलाभर से आवारा पशु मुक्त पंचायत को पांच लाख रुपए की प्रोत्साहन राशि का प्रावधान करना भी एक सराहनीय कदम है। गोसदनों, गोशालाओं और पशुधन की देखभाल का जिम्मा उठाने वाले लोगों को भी सरकारी स्तर पर सम्मानित करना, प्रोत्साहन देना और पुरस्कृत किया जाना भी जरूरी है। इससे कुछ हद तक निराश्रित पशुओं की समस्या से निजात पाई जा सकती है। वास्तव में आज पशुओं से मित्रता व उनकी देखभाल को जन आंदोलन बनाना समय की प्रमुख मांग बन चुका है।

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