पहाड़ी गांधी को याद रखेगा हिमाचल

राजेंद्र पालमपुरी

स्वतंत्र लेखक

 

अरसा बीत जाने के बाद भी बाबा का वह गिरता हुआ कच्चा मकान आज सरकारी ढकोसलों का भी कच्चा चिट्ठा खोलता नजर आता है, जो बेहद अचरज भरा तो है ही, बल्कि शर्मसार भी करता है। मैं समझता हूं कि इस विषय पर गहन चिंतन और कोई तत्काल निर्णय लिए जाने की आवश्यकता है, जिससे पहाड़ी गांधी के नाम को बट्टा लगने से बचाया जा सके...

बुलबुल-ए-पहाड़ के नाम से विश्व विख्यात श्याह पोश पहाड़ी गांधी- बाबा कांशी राम की जयंती प्रदेशभर में 11 जुलाई को मनाई जाती है, जिससे हर प्रदेशवासी परिचित है। भारतीय स्वतंत्रता की जंग-ए-आजादी में जिन महान विभूतियों का सहयोग रहा, योगदान रहा, उनमें कांगड़ा जिला के डाडासीबा के साथ लगते पद्धयाली गुरनवाड़ गांव के बाबा कांशी राम का नाम उनकी 500 से अधिक लिखी कविताओं और गीतों व लगभग आठ ओजस्वी क्रांतिकारी कहानियों के लिए हमेशा याद किया जाता रहेगा। हमारे हिमाचल प्रदेश के ही जिला कांगड़ा के डाडासीबा में पंडित लखणू राम और माता रेवती के घर आज ही के दिन 11 जुलाई, सन् 1882 को जन्मे कांशी राम यानी बुलबुल-ए-पहाड़ के खिताब से स्वर कोकिला सरोजिनी नायडू द्वारा नवाजे भी गए थे। अपने देश भारत की स्वतंत्रता के लिए लड़ाई जारी रखते हुए ही और जब तक लड़ाई खत्म नहीं हो जाती व हिंदोस्तान आजाद नहीं हो जाता, तब तक काले कपड़े ही पहनने का निर्णय लेने वाले इस शख्स  को स्याहपोश के नाम से भी जाना जाता है।

देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने इन्हें पहाड़ी गांधी का संबोधन करके एक अतुलनीय गरिमा भी प्रदान की थी, जिससे हमारे प्रदेश का नाम सुशोभित तो हुआ, साथ ही गौरवान्वित भी हुआ। बाबा कांशी राम ने अपने कविता साहित्य से सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक आर्थिक एवं सांस्कृतिक शोषण के खिलाफ आवाज उठाकर अपनी स्वतंत्रता के प्रति रुझान और लगाव का पूर्ण परिचय दिया था। वतन की मिट्टी और देश के साथ उनका प्रेम उनकी कविताओं में देखते ही बनता है। इसी तरह बाबा कांशी राम की रचनाओं में जनजागरण की महकती खुशबू के साथ ही छुआछूत को दूर करने, मानव प्रेम, धर्म के प्रति आस्था और विश्व बंधुत्व के भी दर्शन होते हैं। इस पहाड़ी गांधी ने अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध विद्रोह के नगमों के साथ-साथ आम जनता के दुख-दर्द को भी अपने साहित्य में समेटा है। केवल सात वर्ष की ही आयु में पहाड़ी गांधी बाबा कांशी राम का विवाह सरस्वती देवी से हो गया था, लेकिन पढ़ाई न छोड़ते हुए इन्होंने अपने गांव में ही अपनी शिक्षा पूरी की। कुछ ही समय में माता-पिता के देहांत हो जाने के बाद कामकाज और रहगुजर की  तलाश में लाहौर आकर बह लाला लाजपत राय, सरदार अजीत सिंह और मौलवी बर्कतुल्ला  सरीखे क्रांतिकारी लोगों से मिले। उस समय देश के अंदरुनी हालात अस्पृष्यता के प्रति बहुत ही संवेदनशील थे, जिससे समाज में फैली छुआछूत की कुरीति या कहा जा सकता है कि इस भयानक बीमारी पर बाबा कांशी राम ने समाज को चेताया था। इससे महसूस होता है कि वह हिंदुत्व के प्रति कितने संवेदनशील थे। यहां यह कहा जाना कि बाबा कांशी राम वास्तव में राष्ट्रीय पुरुष थे, गलत नहीं होगा। देश में चल रही आजादी की लहर के वक्त उन्होंने ऐसी रचनाएं देकर हमें अपनी मातृभूमि के लिए सचेत करते हुए भी लिखा- भारत मां जो अजाद कराणें तांईं मावां दे पुत्त चढ़े फांसियां। हसदे-हसदे अजादी दे नारे लाई और कुछ ऐसे भी कि मैं कुण, कुण घरान्नां मेरा, सारा हिंदोस्तान मेरा। भारत मां ऐ मेरी माता ओ जंजीरां पकड़ी ऐ, उस्स नूं अजाद कराणां ऐ। इन कविताओं में साहित्य की कौन सी विधा का सहारा बाबा कांशी राम ने लिया, कहना मुश्किल ही नहीं, बल्कि नामुमकिन भी है, लेकिन इन कविताओं का जो प्रभाव आम समाज पर पड़ा, देखने की बात है और जिसे  नकारा भी नहीं जा सकता। स्वतंत्रता आंदोलन में इस पहाड़ी गांधी के असंख्य लोकगीतों और कविताओं ने राष्ट्र प्रेम की लौ को जलाए रखने में घी का काम किया, क्योंकि उस समय लोग इन्हीं के देश प्रेम की भावना से ओतप्रोत गीतों को गाकर सत्याग्रह करते और प्रभात फेरियां निकालते थे। मगर अफसोस बावजूद इस सबके इस महान हिमाचली क्रांतिकारी देशभक्त के लिए सिवाय साहित्यिक दिखावों के कुछ भी नहीं कर पाए, न तो हम और न ही प्रदेश सरकारें, जिसके वह हकदार हैं। साहित्यिक संस्थाओं के पैरोकार समय-असमय बाबा कांशीराम के पैतृक स्थान को संग्रहालय में परिवर्तित और सुरक्षित करने के लिए दबाव बनाते देखे जाते रहे हैं, जिस पर हिमाचल सरकार ने एक बड़ी पहल करके बाबा कांशी राम की अंतिम निशानी इनके पैतृक घर को राष्ट्रीय धरोहर के रूप में संग्रहित और संजोए रखने का निर्णय लिया था। यह हम सबके लिए बड़े ही हर्ष का बात साबित हो सकती थी, जबकि 10 जुलाई, 2017 को ही प्रदेश सरकार ने बाबा कांशी राम के पैतृक गांव में स्थित संपत्ति को राष्ट्रीय धरोहर के रूप में स्वीकार करने की घोषणा कर साहित्य संसार और आम जनमानस की भावनाओं को सम्मान दिया।

इसके लिए हम साहित्यकार संस्थाओं से जुड़े लोग और साहित्य में रुचि रखता साहित्यिक समुदाय हिमाचल प्रदेश सरकार के आभारी हैं, लेकिन अरसा बीत जाने के बाद भी बाबा का वह गिरता हुआ कच्चा मकान आज भी सरकारी ढकोसलों का भी कच्चा चिट्ठा खोलता नजर आता है, जो बेहद अचरज भरा तो है ही, बल्कि शर्मसार भी करता है। मैं समझता हूं इस विषय पर गहन चिंतन और किसी तत्काल निर्णय लिए जाने की आवश्यकता है, जिससे पहाड़ी गांधी बाबा के नाम को बट्टा लगने से बचाया जा सके। 23 अप्रैल, 1984 को जिला कांगड़ा के ज्वालामुखी में बाबा कांशी राम पर डाक टिकट के विमोचन कर बाबा कांशी राम की स्मृति में चार चांद लगाने का प्रयास किया गया था, जो साहित्य जगत को सम्मानित करती बात है।

अफसोस यह कि अपने वक्त का यह पहाड़ी गांधी स्याहपोश 15 अक्तूबर, 1943 को हमेशा के लिए आकाश में विलीन हो गया, अपने देश की आजादी से पहले ही स्वतंत्रता का सपना लिए हुए एक आलौकिक ख्वाब लिए हुए। नमन श्रद्धांजलि तुम्हें मेरे प्रदेश के स्याहपोश, जो हमेशा याद किए जाते रहेंगे पहाड़ी गांधी के रूप में।