पहाड़ की सियासत

17वें लोकसभा चुनावों के लिए हिमाचल भी पूरी तरह से तैयार है।  पहाड़ी प्रदेश के चुनावी माहौल से रू-ब-रू करवा रहा है इस बार का दखल...

    सूत्रधार : शकील कुरैशी आरपी नेगी टेकचंद वर्मा

हिमाचल में चारों संसदीय क्षेत्रों में मुकाबले रोचक हैं। इनमें पहली रोचकता तो यही है कि कांग्रेस व भाजपा के पांच वर्तमान विधायक लोकसभा का चुनाव लड़ रहे हैं। इनमें से कोई भी जीते उपचुनाव तो होना ही है। शिमला में कांग्रेस व भाजपा दोनों के वर्तमान विधायक चुनाव लड़ रह हैं जबकि कांगड़ा में भी कांग्रेस व भाजपा दोनों के वर्तमान विधायक मैदान में है। इसी तरह से हमीरपुर से कांग्रेस का विधायक चुनाव लड़ रहा है, ऐसे में इन तीनों लोकसभा क्षेत्रों में यह दिलचस्प बात है। प्रदेश में सबसे रोचक और दिलचस्प मुकाबला माना जाए तो वह मंडी संसदीय क्षेत्र में है। मंडी संसदीय क्षेत्र में मुकाबला सरकार बनाम सुखराम के बीच चल रहा है। यहां देखना यह है कि मतदाता मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर को देखकर वोट करेंगे या फिर पंडित सुखराम को। हालांकि जयराम ठाकुर मंडी की सियासत में उतना रुतबा नहीं रखते, जितना पंडित सुखराम का रहा है, लेकिन भाजपा को यहां पर प्रदेश में सरकार होने का फायदा मिल सकता है, जिसे हासिल करने में पूरी सरकार डटी हुई है। यहां मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर की साख का भी सवाल है वह  मंडी से पहली दफा मुख्यमंत्री बने हैं। उधर पंडित सुखराम पर आया राम गया राम की राजनीति का ठप्पा इस चुनाव में लग चुका है, जिसे खुद वीरभद्र सिंह ने हवा दी। ऐसे में यहां पर मुकाबला दिलचस्प है। अहम बात यह भी है कि मंडी में पंडित सुखराम के परिवार की साख भी इस चुनाव में दांव पर लगी हुई है, जो उनके पुत्र अनिल शर्मा का भविष्य भी तय करेगी। दूसरा रोचक मुकाबला कांगड़ा में जातीय समीकरणों पर हो रहा है। यहां वरिष्ठ नेता किशन कपूर पहली दफा लोकसभा का चुनाव लड़ रहे हैं। एक समय था, जब विधानसभा का टिकट भी उन्हें मुश्किल से हाथ लगा था ,लेकिन बाद में वह सरकार में मंत्री भी बन गए और अब शांता कुमार के हटते उनकी विरासत को संभालने का जिम्मा उनको दिया गया है। यहां पर जातीय समीकरणों का रोचक मुकाबला है क्योंकि किशन कपूर गद्दी वोट बैंक पर नजर गड़ाए हुए हैं, तो वहीं कांगे्रस के पवन काजल ओबीसी फैक्टर को भुनाने की फिराक में हैं। कांग्रेस ने ओबीसी फैक्टर को ध्यान में रखकर ही यहां पर इस वर्ग से युवा प्रत्याशी दिया है। इतना ही नहीं, भाजपा व कांग्रेस के दोनों उम्मीदवारों का स्वभाव भी एक दूसरे से भिन्न है,जिससे भी चुनाव में रोचकता बनी हुई है।

शिमला में पूर्व सैनिकों के बीच में जंग है। हालांकि शिमला संसदीय क्षेत्र में पूर्व सैनिकों की संख्या हमीरपुर व कांगड़ा के मुकाबला काफी ज्यादा कम है, लेकिन फिर भी राजनीतिक दलों ने यहां पर फौजियों को मैदान में उतारा है। कांग्रेस के धनी राम शांडिल पहले भी लोकसभा के सांसद रह चुके हैं और उन्होंने हिविकां-भाजपा का दामन थामकर राजनीति की शुरुआतकी थी, अब इससे अलग कांग्रेस में हैं। उधर सुरेश कश्यप  युवा चेहरा हैं और अपने विधानसभा क्षेत्र में पैठ रखते हैं। सिरमौर पर भाजपा अपना पूरा दांव खेल रही है, जिसे लगता है कि सिरमौर अब उसके साथ चलता है, पुराने नतीजे भी यही कहते हैं, लेकिन अब दो फौजियों में से किसे जनता पसंद करेगी यह देखना होगा। हमीरपुर में ठाकुर बनाम ठाकुर का मुकाबला हो रहा है। अनुराग ठाकुर जहां युवा होने के साथ अपने पिता प्रेम कुमार धूमल के कारण अच्छी पैठ वोटरों में रखते हैं वहीं, कांग्रेस के रामलाल ठाकुर भी सियासत के मंझे हुए खिलाड़़ी हैं। हमीरपुर में पूरा दम विधायकों के बूते लगाया जा रहा है। यहां दोनों एक दूसरे से कम नहीं है। कांग्रेस के पास भी यहां पर बिलासपुर, हमीरपुर व ऊना बैलेट में विधायक हैं, जो अपने क्षेत्रों में कितनी पैठ रखते हैं, यह चुनाव में होने वाला मतदान बताएगा। अनुराग ठाकुर क्योंकि यहां से दो दफा लोकसभा सदस्य रह चुके हैं, लिहाजा उनके खिलाफ भी मुद्दे हैं जिन्हें भुनाने में कांग्रेस लगी है। अब अपनी सीट को बरकरार रखना अनुराग के लिए चुनौती है, वहीं राम लाल ठाकुर के लिए भी क्योंकि कई चेहरों पर चर्चा के बाद उन्हें टिकट मिला है। हमीरपुर संसदीय क्षेत्र में सुरेश चंदेल भी एक फैक्टर बने हैं,जिसका फायदा किस दल को होगा यह समय बताएगा।

45 प्रत्याशी चुनाव मैदान में

लोकसभा चुनाव के रण में कुल 45 प्रत्याशी चुनाव मैदान में हैं। कांगड़ा संसदीय क्षेत्र में 11 प्रत्याशी, मंडी संसदीय क्षेत्र में 17, हमीरपुर में 11 व शिमला अनुसूचित जाति सीट पर 6 प्रत्याशी चुनाव मैदान में हैं।  कुल 55 लोगों ने नामांकन भरा था ,जिसमें से 9 के पर्चे रद्द हुए थे। एक के चुनाव मैदान से हटने के बाद 45  लोग मैदान में रहे हैं।

चारों सीटों पर है रोचक मुकाबला

— मंडी में सरकार बनाम पं. सुखराम

— शिमला में हो रही दो फौजियों की जंग

— हमीरपुर में ठाकुरों में वर्चस्व की होड़

— कांगड़़ा में जातीय आंकड़ों पर दांव

पूर्व सांसद का रिपोर्ट कार्ड

न सड़कें सुधरी, न सिंचाई सुविधा मिली

पुराने सांसद योजनाओं को धरातल पर उतारने में असफल रहे हैं। सांसद द्वारा गांव गोद लिए गए थे। मगर उन गावों में विकास ही नहीं हुआ है। अभी कई गांव सड़क सुविधा से नही जुड़ पाए हैं। गांवों में सिंचाई सुविधाओं के लिए भी कोई सकारात्मक प्रयास नही किए गए हैं। ऐसे में आज का ग्रामीण युवा शहरों की ओर पलायन कर रहा है।

सुभाष शर्मा, बुद्धिजीवी

सांसद निधि का सदुपयोग हुआ

सांसद ने जनता के उत्थान के लिए कार्य किए हैं। सांसद जनता के लिए विभिन्न योजनाएं लेकर आए हैं। सांसद निधि से गांवों में सड़कों का निर्माण हुआ है। वहीं, सांसदों ने गांव भी गोद लिए थे, इन गांवों में भी पाचं वर्षों में काफी विकास हुआ है। बलराम पुरी , पेंशनर

नए सांसद से उम्मीदें

हर मुददा हल करवाने वाला हो

महिलाओं के साथ आए दिन बलात्कार व छेड़खानी की घटनाएं सामने आ रही है। महिलाओं की सुरक्षा एक बढ़ा मुद्दा बन गया है। वहीं बेरोजगारी भी बढ़ती जा रही है। पढ़े-लिखे युवा रोजगार की तलाश में यहां-वहां घूम रहे हैं। कि सानों के विभिन्न मुद्दों पर आज तक कोई कारवाई नहीं हो पाई है। नए सांसद को केंद्र सरकार व स्थानीय निकायों के साथ मिल कर इन पर काम करना चाहिए । जनता को नए सांसद से यहीं उम्मीदें हैं।

सत्यावान पुंडीर किसान नेता

जनहित योजनाओं को दे तरजीह

पूर्व में सांसदों द्वारा विकास के लिए कई योजनाएं आरंभ की गई है। मगर अधिकतर योजनाएं फाइलों में दफन हैं। नया सांसद ऐसा होना चाहिए,जो जनता के  हर मुद्दों को प्राथमिकता पर उठाए व जनहित के लिए योजनाओं को धरातल पर लेकर आए। राज्य में आज भी कई गांव सड़क सुविधा से वंचित हैं। यही कारण है कि युवा वर्ग गांव को छोड़कर शहरों की तरफ पलायन कर रहा है।  

देशराज ठाकुर आम आदमी

बेरोजगारों के लिए करें काम

प्रदेश में बेरोजगारोें का आंकड़ा लगातार बढ़ता जा रहा है। नए सांसद ऐसा होना चाहिए, जो बेरोजगारों के लिए काम करे। वहीं, राज्य में कृषि व बागबानी के उत्थान के लिए कार्य करे, ताकि राज्य में कृषि को बढ़ावा मिल सके।

अक्षय शर्मा,छात्र

53 लाख 30 हजार मतदाता चुनेंगे सरकार

हिमाचल प्रदेश में अब कुल मतदाताओं की संख्या 53 लाख 30 हजार 154 तक पहुंच गई है। इसमें 27 लाख 24 हजार 111 पुरुष मतदाता, 26 लाख पांच हजार 996 महिला मतदाताओं के अलावा 47 तृतीय लिंग मतदाता दर्ज हैं।

डेढ़ लाख वोटर पहली बार करेंगे मतदान

पहली बार प्रदेश में एक लाख 52 हजार 390 मतदाता मतदान करेंगे और 30 वर्ष से कम आयु सीमा के मतदाताओं की संख्या 13 लाख 34 हजार 823 तक पहुंची है। बता दें कि चुनाव प्रक्रिया शुरू होने के एक महीने से ज्यादा समय में नए मतदाता बनाने के लिए चली मुहिम के तहत करीब डेढ़ लाख नए मतदाताओं को जोड़ा गया है।

कांगड़ा में 14.27 लाख वोटर

कांगड़ा में कुल 14 लाख 27 हजार 338 मतदाता हैं, जिसमें सात लाख 27 हजार पुरुष, 6 लाख 99 हजार 934 महिला मतदाता हैं। 20 तृतीय लिंग मतदाता हैं।

हमीरपुर में 13.62 लाख चुनेंगे सांसद

इसी तरह से हमीरपुर में 13 लाख 62 हजार 269 मतदाताओं में छह लाख 91 हजार 683 पुरुष और छह लाख 70 हजार 579 महिलाओं के साथ सात तृतीय लिंग मतदाता हैं।

मंडी में 12.81 लाख तय करेंगे जीत-हार

मंडी संसदीय क्षेत्रों में 12 लाख 81 हजार  462 कुल मतदाता हैं, जिनमें 6 लाख 50 हजार 796 पुरुष व 6 लाख 30 हजार 661 महिला व 5 तृतीय लिंग मतदाता हैं। 

शिमला में 12. 59 लाख बनेंगे भाग्यविधाता

शिमला संसदीय क्षेत्र में 12 लाख 59 हजार 085 कुल मतदाताओं में से 6 लाख 54 हजार 248 पुरुष, 6 लाख 4 हजार 822 महिला व 15 तृतीय लिंग मतदाता दर्ज हैं।

हिमाचल में 7723 केंद्रों पर डाले जाएंगे वोट

हिमाचल में कुल 7723 मतदान केंद्र हैं, जिनके साथ 7 सहायक मतदान केंद्र भी बनाए गए हैं। लाहुल-स्पीति विधानसभा क्षेत्र के तहत 72-टाशीगांग मतदान केंद्र विश्व का सबसे ऊंचाई वाला मतदान केंद्र स्थापित किया गया है,जहां पर मतदाताओं की संख्या 49 है। यह 15256 फुट की ऊंचाई पर है।

महिलाएं 136, तो दिव्यांग संभालेंगे 10 बूथ

प्रदेश में इस बार 136 मतदान केंद्र केवल महिला कर्मियों द्वारा संचालित किए जाएंगे तथा 10 मतदान केंद्र केवल दिव्यांग मतदान कर्मियों के लिए बनाए गए हैं। 

तीन जिलों में महिला मतदाता ज्यादा

प्रदेश के तीन जिला मंडी, हमीरपुर व लाहुल-स्पीति ऐसे हैं, जहां महिला मतदाताओं की संख्या पुरुष मतदाताओं से अधिक है। हमीरपुर में यह संख्या 1,042 प्रति 1,000 पुरुष मतदाता हैं, जबकि लाहुल-स्पीति तथा मंडी में यह संख्या 1,009 प्रति 1,000 मतदाता हैं। वृद्ध व अस्वस्थ मतदाताओं की सुविधा के लिए प्रदेश में कुल सात सहायक मतदान केंद्र स्थापित किए गए हैं।

373 अति संवेदनशील मतदान केंद्र

7723 मतदान केन्द्रों में से 373 अति संवेदनशील हैं जबकि 946 संवेदनशील हैं। मतदान केंद्रों में केंद्रीय सुरक्षा बलों की हॉफ सेक्शन, एक मुख्य आरक्षी, तथा एक गृहरक्षक व सामान्य मतदान केंद्रों में एक आरक्षी व एक गृह रक्षक तैनात किए जाएंगे।

207 फ्लाइंग स्क्वायड रखेंगे नजर

स्वतंत्र एवं निष्पक्ष मतदान के  लिए प्रदेश में कुल 207 फ्लाइंग स्कवायड बनाए गए हैं, 207 स्टेटिक सर्विलांस टीमें, 77 सहायक एक्सपेंडिचर ऑब्जर्वर, 134 वीडियो सर्विलांस टीमें, 70 वीडियो व्यूइंग टीमें, 72 अकाउंटिंग टीमें गठित की गई हैं। इनके अलावा आयोग ने 9 सामान्य पर्यवेक्षक, 5 व्यय पर्यवेक्षक, तथा दो पुलिस पर्यवेक्षक लगाए हैं। केंद्रीय सुरक्षा बलों की 47 टुकडि़यां केंद्रीय गृह मंत्रालय भेज रहा है।  

999 शतकवीर चुनेंगे सरकार

प्रदेश का मतदाता मौन

लंबी आचार संहिता के चलते हिमाचल में चुनाव का उतना अधिक जोश नहीं दिखाई दे रहा जैसा पूर्व में होता था। राजधानी शिमला की बात करें तो यहां राजनीतिक दल अपने कार्यालयों में बैठकर  रणीनीति बना रहे हैं और सड़कों पर किसी भी तरह का कोई हल्ला नहीं है।  प्रदेश का मतदाता पूरी तरह से शांत है।  चर्चा में यह कहा जाता है कि अभी कुछ पता नहीं चल रहा। हिमाचल में किसी भी तरह की कोई लहर नहीं चल रही, ऐसे में चुनावी माहौल शांत है। यह पता नहीं चल रहा कि मतदाता किस ओर जा रहे हैं। पिछले लोकसभा चुनाव की बात करें  तो यहां एक बड़ी लहर थी। मोदी नाम पर भाजपा ने खूब धमाल मचाई जिसका नतीजा भी अच्छा रहा। इस दफा कहीं भी चुनावी शोर नहीं सुनाई दे रहा। चुनाव केवल प्रदेश के बड़े नेताओं की रैलियों तक ही सीमित है। जहां पर भी रैलियां हो रही है वहां पर लगता है कि चुनाव है ,लेकिन इससे बाहर चुनाव का शोर कहीं भी सुनाई नहीं दे रहा।   हिमाचल में 100 साल से ऊपर 999 मतदाता हैं। इनमें पुरुष शतकवीरों की संख्या 377 तो महिलाएं 622 हैं। चंबा में 36 पुरुष व 36 ही महिला शतकवीर हैं। कांगड़ा में 111 पुरुष व 182 महिलाएं उम्र की 100 साल का आंकड़ा पार कर चुकी हैं। लाहुल एवं स्पीति में  दो पुरुष और तीन  महिलाएं हैं। कुल्लू  पुरुष मतदाताओं की संख्या 12 हैऔर 12 ही महिलाएं हैं, जबकि मंडी  में 41 पुरुष व 81 महिला मतदाता 100 साल से ऊपर के हैं। हमीरपुर में 31 पुरुष व 94 महिला मतदाता शतकवीर हैं। ऊना  में 33 पुरुष 70 महिलाएं ऐसी हैं,जबकि  बिलासपुर में 23 पुरुष व 60 महिला मतदाता सूचियों में दर्ज हैं। सोलन  में 26 पुरुष 100 साल से ऊपर के हैं वहीं 14 महिलाएं यहां पर आंकड़ा पार कर चुकी हैं। सिरमौर  में 24 पुरुष इस आंकड़े से ऊपर हैं , वहीं 28 महिलाएं भी इसमें शामिल हैं। शिमला में 34 पुरुष शतकवीर हैं वहीं 40 महिलाएं इस आंकडे़ से ऊपर हैं । किन्नौर  में चार पुरुष तथा दो महिला मतदाता 100 साल की उम्र का आंकड़ा पार कर चुके हैं। इनकी कुल संख्या 999 की बनती है।

 थर्ड फ्रंट का वजूद नहीं

हिमाचल में तीसरा मोर्चा कभी भी असरदार नहीं रहा है। राज्य में दो बड़े राजनीतिक दल भाजपा व कांग्रेस में ही मुकाबला होता है। पूर्व में हुए विधानसभा व लोकसभा चुनाव में तीसरा मोर्चा नाममात्र ही दिखता है। राज्य में लोकसभा चुनाव की बात करें तो तीसरा मोर्चा चुनाव में एक या दो ही उम्मीदवार मैदान में उतारता आया है। वर्तमान में हो रहे लोकसभा चुनाव में भी तीसरा मोर्चा एक दो सीटों पर ही चुनाव लड़ रहा है। यही नहीं वर्ष 2017 में हुए विधानसभा चुनावों में माकपा ने चार-पांच सीटों पर ही इलेक्शन लड़ा था। माकपा की झोली में मात्र एक ही सीट आ पाई थी। हिमाचल में अभी तक तीसरा सशक्त मोर्चा नहीं बन पाया है, जो इन दोनों बड़े दलों को टक्कर दे सकें।  अभी तक वर्ष 1998 में हुए विधानसभा चुनावों को यदि छोड़ दें तो उससे पहले व उसके बाद थर्ड फ्रंट का कोई भी वजूद नहीं रहा है। 

काला धन-जीएसटी पर घिर रहे प्रत्याशी

2014 के लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने देश की हर रैलियों में काला धन वापस लाकर देश के हर व्यक्ति के खाते में 15-15 लाख रूपये जमा करने का वादा किया था, लेकिन आज पांच साल बीते चुका है और न तो काला धन वापस आया और न ही हरेक व्यक्तियों के खाते में 15-15 लाख रूपये आए। प्रदेश के मतदाताओं के मन में पहला नकारात्मकता सामने आया। हालांकि जीएसटी लागू कर केंद्र सरकार ने पूरे देश के लोगों को राहत दी है, लेकिन इसे सकारात्मक नहीं मान रहे हैं। जिला सिरमौर के गिरीपार लोगों को ट्राइबल का दर्जा देने, सेब पर आयात शुल्क और नोटबंदी सहित कई ऐसे मुद्दे हैं जिस पर भाजपा प्रत्याशी घिर रहे हैं। आज वोटर्स भले ही शांत बैठा हो,  मगर 19 मई को होने वाले मतदान और 13 मई को आने वाले परिणाम में यह तय होगा कि प्रदेश की जनता ने जीएसटी और नोटबंदी जैसे मुद्दों को ठुकरा दिया या फिर सविकार कर दिया। पिछली बार के चुनाव में भाजपा ने चारों सीटें जीती और संसद में हिमाचल के कई मुद्दों पर चर्चा भी। जिसमें मुख्य रूप से हाटी समुदाय को जनजातीय का दर्जा दिलाने के लिए सांसद वीरेंद्र कश्यप में कई बार आवाज उठाई। सेब उत्पादक क्षेत्र शिमला, किन्नौ, कुल्लू, करसोग सहित अन्य क्षेत्रों के बागवान आज यह पूछ रहे हैं कि सेब पर आयात शुल्क क्यों नहीं बढ़ाया गया? जब भाजपा प्रत्याशियों से इन सवालों का जवाब मांगते हैं तो कहते हैं कि पूर्व में दस साल यूपीए की सरकार थी तो क्या हुआ? आपदा प्रबंधन के लिए हिमाचल को केंद्र से बजट की दरकार मसले पर भी भाजपा प्रत्याशी घिर रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस प्रत्याशी मोदी सरकार की जनविरोधी नीतियों पर ही वोट मांग रहे हैं। सेब पर आयात शुल्क बढ़ाने और रेलवे विस्तार सहित एनएच मसले पर वोटर्स पूछ रहे हैं कि पूर्व में यूपीए सरकार में हिमाचल से दो-दो केंद्रीय मंत्री रहे यानी आनंद शर्मा और वीरभद्र सिंह ने ऐसे काम क्यों नहीं करवाए? प्रदेश के कुछ ऐसे मुद्दे हैं जिस पर कांग्रेस और भाजपा के प्रत्याशी घिरते नजर आ रहे हैं।

हिमाचल में नहीं अपना कोई घोषणा पत्र

केंद्रीय मुद्दों के कंधों पर कांग्रेस-भाजपा की चुनावी बंदूक बीजेपी मोदी की उपलब्धियां, तो विपक्ष भुना रही केंद्र की खामियां

17वीं लोकसभा चुनाव में पहाड़ों पर कांग्रेस और भाजपा ने केंद्रीय मुद्दों को चुनावी हथियार बना दिया है। हालांकि विधानसभा चुनावों के दौरान राज्य में हर राजनीतिक दल अपना-अपना घोषणा पत्र जारी करता है, लेकिन लोकसभा चुनाव में ऐसा नहीं हैं। इस चुनाव में केंद्रीय योजनाओं और उसमें खामियों को ही आधार बनाया गया है। यही वजह है कि इस बार के चुनाव में सत्तासीन पार्टी भाजपा मोदी सरकार की उपलब्धियों को जनता के बीच पहुंचा रही है तो विपक्ष यानी कांग्रेस मोदी सरकार की जन विरोधी नीतियों को ही ठोस मुद्दा बना चुकी है। हालांकि प्रदेश के कई ठोस मुद्दे हैं, जिसे भाजपा बुनाने में अभी तक असफल दिखाई दे रही है, जबकि पूर्व में मोदी सरकार द्वारा हिमाचल के लिए की गई घोषणाएं सिरे न चढ़ने वाली योजनाओं को कांग्रेस ने ठोस मुद्दा बना दिया है। भले ही हिमाचल जैसे छोटे राज्य में लोकसभा की चार सीटें ही हों, मगर इस चुनाव में प्रदेश का अपना मुद्दा ही नहीं हैं। मोदी सरकार के पांच वर्ष के कार्यकाल के दौरान पूरे देश के लिए शुरू की योजनाओं को भाजपा के चारों प्रत्याशी मतदाताओं के बीच रख रहे हैं। इसके साथ-साथ हिमाचल को मिल चुके कई प्रोजेक्ट्स को भी जनता का ध्यान केंद्रित करने में कोई कसर नहीं छोड़ रही है।  दूसरी तरफ कांग्रेस ने मोदी सरकार द्वारा किए गए वादों को पूरा न करने की बिंदुओं को ठोस मुद्दा बना दिया है। इसमें बिलासपुर में एम्स का काम समय पर शुरू न हो पाना, रेल विस्तार में नाकामियां, हिमाचल को आर्थिक मदद की दरकार, सेब पर आयात शुल्क बढ़ाने में मोदी सरकार नाकाम, जीएसटी, नोटबंदी, सर्जिकल स्ट्राइक सहित कई ऐसे एजेंडे हैं जिसके विरोध में कांग्रेस इस बार चुनावी मैदान में खड़ी है। उल्लेखनीय है कि सेना भर्ती में हिमाचल का कोटा बढ़ाने, राज्य को विशेष आर्थिक पैकेज, सेब पर आयात श्ुल्क बढ़ाने सहित कई ऐसे मुद्दे हैं,जिसका जिक्र इस चुनाव में भाजपा नहीं कर रही है।

देश में सबसे अधिक राज कांग्रेस ने किया, जिसमें मात्र भ्रष्टाचार को ही बढ़ावा दिया गया। जो विकास कार्य कांग्रेस ने पिछले 50 साल में नहीं किया, उसे प्रधानमंत्री मोदी ने पांच साल में कर दिखाया। आयुष्मान भारत योजना, उज्ज्वला योजना,  किसानों को   छह हजार, सौर ऊर्जा में सबसिडी, एक देश एक टैक्स, हिमाचल को 69 एनएच, एम्स, तीन नए मेडिकल कालेज सहित कई ऐसी योजनाएं हैं, जिसे देख आज कांग्रेस पूरी तरह से बौखला चुकी है।  इस बार के चुनाव में कांग्रेस फिर हारेगी।’’

 सतपाल सिंह सत्ती

मोदी सरकार ने पांच साल पहले जो वादे किए थे, उसे निभाने में पूरी तरह नाकाम साबित हुई है।  मोदी ने सेब पर आयात शुल्क बढ़ाने की घोषणा की थी, जो  नहीं हुआ।  69 एनएच अभी तक मात्र कागजों में ही प्रस्तावित है,  एम्स निर्माण कार्य जल्द समय पर करने में नाकाम रही, जीएसटी, नोटबंदी, किसानों के साथ धोखा, काला धन वापस लाने में सिर्फ मोदी सरकार ने जुमले दिखाए।  मोदी-शाह का  गुरूर इस बार   में टूटेगा

मुकेश अग्निहोत्री