Saturday, July 20, 2019 11:43 PM

पहाड़ पर मोदी

2014 से चली मोदी लहर 2019 आते-आते सुनामी में बदल गई और एक के बाद एक कई विरोधियों के पांव उखड़ गए। हिमाचल में तो मोदी  का के्रज ऐसा रहा कि पहाड़ के 70 फीसदी लोगों ने वोट देकर इतिहास रच दिया। पीएम मोदी और सीएम जयराम ठाकुर की लोकप्रियता के आगे कांग्रेस अपनी साख तक नहीं बचा पाई ...

सूत्रधार: मस्तराम डलैल, शकील कुरैशी  

हिमाचल में रिकार्ड 71 फीसदी वोटिंग

 महज 27 प्रतिशत मतों पर सिमटी कांग्रेस

सीएम के तूफानी प्रचार और सियासी रणनीति ने बदल दिए सारे समीकरण

भाजपा के स्टार प्रचारकों ने लुभाए मतदाता

लोकसभा चुनावों में भाजपा के पक्ष में 71 फीसदी मतदान कर हिमाचल ने अनूठा कीर्तिमान स्थापित किया है। वोट शेयरिंग के मामले में हिमाचल ने देशभर में टॉप किया है। लोकसभा या विधानसभा  के चुनावों में किसी भी राजनीतिक दल को पहली बार किसी राज्य में 70 प्रतिशत मत प्राप्त हुए हैं। इस करिश्मे के पीछे नरेंद्र मोदी की सुनामी और हिमाचल में जयराम सरकार की लोकप्रियता शुमार है। मोदी-जयराम के इस डबल इंजन से हिमाचल प्रदेश की चारों सीटों पर भाजपा ने  ऐतिहासिक जीत दर्ज की है।  प्रदेश कांग्रेस को इस चुनाव में 27 प्रतिशत के करीब वोट हासिल हुए हैं। इस जादुई आंकड़े से यह स्पष्ट हो  प्रदेश में कांग्रेस के काडर वोट को भी सेंध लगा दी है। प्रदेश भर में अन्यों को करीब तीन प्रतिशत ही वोट मिल पाए हैं। इस एकतरफा जीत के लिए मोदी मैजिक के साथ हिमाचल के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर की छवि और सरकार के ईमानदार प्रयास भी शामिल है। आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में भाजपा की सबसे बड़ी जीत कांगड़ा संसदीय क्षेत्र में दर्ज हुई है। इस संसदीय क्षेत्र से निर्वाचित हुए किशन कपूर को 74 प्रतिशत वोट प्राप्त हुए हैं। इसके मुकाबले कांग्रेस के पवन काजल 24 प्रतिशत वोट लेते हुए कांग्रेस का काडर भी अपने पक्ष में नहीं कर पाए। इस संसदीय क्षेत्र में दो फीसदी वोट अन्यों को मिले हैं। कांग्रेस को मंडी संसदीय क्षेत्र में जीत की सबसे बड़ी आस थी। ईवीएम खोलते ही बाहर आए नतीजे चौंकाने वाले रहे और भाजपा के रामस्वरूप शर्मा करीब 70 फीसदी वोट ले गए। इसके मुकाबले कांग्रेस के आश्रय शर्मा का ग्राफ 26 फीसदी मतों पर ही सिमट गया। इस संसदीय क्षेत्र में अन्य के हिस्से में चार प्रतिशत वोट आए हैं।  भाजपा ने अपने मजबूत गढ़ संसदीय क्षेत्र हमीरपुर में भी जीत का अंतर बड़ा किया है।

इस संसदीय क्षेत्र से भाजपा के अनुराग ठाकुर को करीब 70 प्रतिशत मत हासिल हुए हैं। इसके मुकाबले रामलाल ठाकुर 28 प्रतिशत वोट ही प्राप्त कर पाए। इस संसदीय क्षेत्र में दो प्रतिशत वोट अन्यों को मिले हैं। कांग्रेस को इस बार अपने पुराने किले शिमला संसदीय क्षेत्र में वापसी की पूरी संभावना थी। भाजपा प्रत्याशी को तीसरी बार निर्वाचित कर शिमला संसदीय क्षेत्र ने कांग्रेस का ग्राफ भी कम कर दिया है। भाजपा के सुरेश कश्यप को 68 फीसदी मत हासिल हुए हैं। इसके मुकाबले कांग्रेस के धनीराम शांडिल 30 फीसदी ही वोट ले पाए। अन्यों को दो प्रतिशत मत हासिल हुए हैं। सीएम ने अकेले मोर्चा संभालते हुए अपने दम पर लोकसभा चुनावों के लिए 106 रैलियां आयोजित की। पैर में गंभीर चोट के बावजूद सीएम की जनसभाएं किन्नौर से लेकर भरमौर तक प्रदेश के सभी 68 विधानसभा क्षेत्रों में की गई।   केंद्रीय राजनीति में हिमाचल के कद्दावर नेता जेपी नड्डा को अपने गृह राज्य में प्रचार के लिए समय नहीं मिला। पूर्व मुख्यमंत्री प्रो. प्रेम कुमार धूमल ने अधिकतर समय हमीरपुर संसदीय क्षेत्र में लगाया। शांता कुमार ने शिमला तथा मंडी में कुछेक चुनावी जनसभाएं जरूर की, लेकिन उनका भी अधिकतर समय कांगड़ा में बीत गया। स्टार प्रचारकों की लंबी-चौड़ी सूची में दर्ज 30 नेताओं के भी हिमाचल में दर्शन नहीं हुए। लिहाजा हिमाचल में वर्ष 2014 की जीत को दोहराने का सारा दारोमदार जयराम ठाकुर के कंधों पर आ गया। मुख्यमंत्री ने संगठन को सही दिशा-निर्देश में लगाते हुए अपनी पूरी ताकत चुनाव में झोंक दी। इसके चलते कांगड़ा में किशन कपूर चार लाख 77 हजार से अधिक मतों से विजयी हुए हैं। एंटी इन्कमबेंसी झेल रहे रामस्वरूप शर्मा को मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने चार लाख से अधिक मतों से जीत का स्वाद चखा दिया। कमजोर आंकी जा रही शिमला संसदीय क्षेत्र की सीट को भी मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर बड़े अंतर के साथ जिताने में सफल रहे। जीत की हैट्रिक लगा चुके सांसद अनुराग ठाकुर ने भी हमीरपुर संसदीय क्षेत्र में मैसिव विक्ट्री हासिल की है। इस जीत में मुख्यमंत्री की भूमिका जगजाहिर है।  बता दें कि इस लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लहर के कारण एनडीए को प्रचंड बहुमत मिला है। इसका भागीदार बने हिमाचल ने भाजपा को 70 फीसदी मतदान किया है। लिहाजा भाजपा की इस एक तरफा जीत ने मोदी मैजिक के साथ जयराम ठाकुर की सुनामी भी शामिल है।

मोदी की सुनामी में जयराम के मंत्रियों की परफॉर्मेंस बेहतर

मोदी की इस सुनामी में जयराम सरकार के मंत्रिमंडल की भी बेहतर परफॉर्मेंस दिखी है। जहां मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर के सराज ने नालागढ़ के बाद प्रदेश में सबसे अधिक लीड दी है वहीं उनके मंत्रिमंडल के सहयोगियों के विधानसभा क्षेत्रों से भी बड़ी लीड पार्टी प्रत्याशियों को मिली है। एक से बढ़कर एक मंत्रियों के क्षेत्रों में बढ़त देखते ही बनती है। मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर के सराज से 37147 मतों की लीड भाजपा के नाम दर्ज हुई है। यहां से रामस्वरूप की जो लीड शुरू हुई वो फिर कांग्रेस से कहीं भी नहीं टूटी। रामस्वरूप ने भी जोगिंद्रनगर से बेहतर लीड ली। मंत्रिमंडल के सहयोगियों की बात करें तो कांगड़ा से शहरी निकाय मंत्री सरवीण चौधरी के शाहपुर से 36120 मतों की लीड किशन कपूर को मिली है। कांगड़ा में सबसे अधिक लीड यहीं से रही है। अन्य मंत्रियों में मनाली से परिवहन मंत्री गोविंद ठाकुर के विधानसभा क्षेत्र से 16863 मतों की लीड बताई जा रही है। इसी तरह से शिमला शहरी विधानसभा क्षेत्र से शिक्षा मंत्री सुरेश भारद्वाज हैं। यहां पर शहरी वोटर हैं और यहां से भाजपा को 10084 मतों की जीत हासिल हो सकी है। हमीरपुर संसदीय क्षेत्र में पड़ने वाले धर्मपुर हलके से महेंद्र सिंह ठाकुर सिंचाई मंत्री हैं। इस विधानसभा क्षेत्र से भाजपा के अनुराग ठाकुर को 27623 मतों की लीड दर्ज की गई है। धर्मपुर वैसे मंडी जिला का हिस्सा है मगर संसदीय क्षेत्र हमीरपुर में पड़ता है। कुटलैहड़ से पंचायतीराज मंत्री वीरेंद्र कंवर हैं, जहां से भाजपा के प्रत्याशी अनुराग ठाकुर को 27227 मतों की लीड मिली। जसवां परागपुर भी इसी संसदीय क्षेत्र में पड़ता है, जहां से उद्योग मंत्री विक्रम सिंह हैं। उनके यहां से 29174 मतों की लीड भाजपा के खाते में आई।  सुलाह से स्वास्थ्य मंत्री विपिन परमार के विधानसभा क्षेत्र से किशन कपूर को 31460 मतों की लीड हासिल हुई है, वहीं लाहुल-स्पीति से डा. राम लाल मार्कंडेय के क्षेत्र से भाजपा को 3962 मतों की लीड मिल सकी। मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर अपने मंत्रियों की परफॉर्मेंस से खुश नजर आ रहे हैं। हालांकि यह असर मोदी की सुनामी है, लेकिन मंत्रियों को भी इस लीड के बहाने अपना काम दिखाने का मौका मिल गया है।

भाजपा को नालागढ़ से सबसे अधिक लीड

प्रदेश में भाजपा की सुनामी का सबसे बड़ा असर शिमला संसदीय क्षेत्र के नालागढ़ पर दिखा है। नालागढ़ मौसम के मिजाज से भी गर्म है और लोकसभा चुनाव में यहां के लोगों ने भाजपा को सबसे अधिक लीड देकर राजनीतिक पारे को भी गर्मा दिया है। इस चुनाव में लीड के लिए टॉप पर रहने वाले नालागढ़ ने भाजपा को 39970 की ऐसी बढ़त दी जो विरोधी दल कांग्रेस से टूटनी मुश्किल थी। चुनाव नतीजों के अंत में ऐसा ही सामने आया कि यहां की लीड शिमला संसदीय सीट पर फिर नहीं टूटी।  लीड के मामले में टॉप पर मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर का विधानसभा क्षेत्र सिराज रहा जिसने टॉप टेन की सूची में दूसरा नंबर झटका है। यहां मुख्यमंत्री के चेहरे को देखकर जनता ने जमकर भाजपा को समर्थन दिया। भाजपा ने जयराम ठाकुर को मुख्यमंत्री बनाकर मंडी की जनता को तोहफा दिया और सिराज ने लोकसभा चुनाव में इसका कर्ज भी चुकता कर दिया। यहां के लोगों ने भाजपा को 37147 मतों की लीड दी है। अलग-अलग संसदीय क्षेत्रों की बात करें तो मंडी संसदीय क्षेत्र में सिराज के बाद  जोगिन्द्रनगर ने 36, 292 मतों की लीड दी है वहीं बल्ह से भाजपा के प्रत्याशी राम स्वरूप शर्मा को 33168 मतों की लीड मिली। जोगिन्द्रनगर उनका गृह क्षेत्र है जो लीड के मामले में दूसरे स्थान पर रहा है। कांगड़ा संसदीय क्षेत्र में लीड में टॉप की सूची में नूरपुर 35170 से पहले नंबर पर रहा है वहीं फतेहपुर 31506 और सुलह विधानसभा क्षेत्र 31460 मतों की लीड देकर तीसरे स्थान पर रहा है। इसी तरह से हमीरपुर संसदीय क्षेत्र में जसवां परागपुर की लीड 29 हजार 174 की रही है जो यहां पर प्रमुख रही। इसके बाद धर्मपुर विधानसभा से 27623  की लीड मिली वहीं भोरंज ने 27 हजार 517 मतों की लीड भाजपा के पक्ष में दी है। इसमें कुटलेहड़ 27227 मतों से चौथे स्थान पर रहा। शिमला संसदीय क्षेत्र की बात करें तो नालागढ़ ने प्रदेश भर में सबसे अव्वल रहते हुए भाजपा को 39970 की लीड दी वहीं अर्की विधानसभा क्षेत्र जोकि पूव मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह का क्षेत्र है से भाजपा को 29454 मतों की जीत हासिल हुई है। यहां पर वीरभद्र सिंह का जलवा भी काम नहीं कर सका जोकि विधानसभा चुनाव में दिखा था। इसी तरह से यहां पांवटा विधानसभा क्षेत्र लीड के मामले में 27517 मतों की लीड देकर तीसरे स्थान पर रहा है। चौपाल ने भी यहां कसर नहीं छोड़ी और चौथे स्थान पर रहते हुए उसने भाजपा प्रत्याशी को 26860 की लीड दी है।

अपने विधानसभा क्षेत्रों में ही ढेर हो गए कांग्रेस के दिग्गज

लोकसभा के इस चुनाव ने दिखा दिया है कि हिमाचल प्रदेश में कांगे्रस का एक भी नेता दिग्गज नहीं है। चुनावी अभियान में बड़ी-बड़ी बातें करने वाले कांग्रेस के हरेक नेता को मुंह की खानी पड़ी है क्योंकि जनता ने सीधे मोदी को चुना और इतिहास बना दिया। कांगे्रस के किसी भी नेता के अपने विधानसभा क्षेत्र या फिर गृह क्षेत्र से कांग्रेस को लीड आना तो दूर आसपास का आंकड़ा भी नहीं छू सके।  हिमाचल में कांगे्रस का दूसरा नाम वीरभद्र सिंह माना जाता है। यहां पर वीरभद्र सिंह उसके सबसे बड़े दिग्गज हैं जो कि 6 बार मुख्यमंत्री रह चुके हैं। कांगे्रस ने चुनाव प्रचार भी उन्हीं के कंधों पर चलाया, राहुल गांधी का तो सिर्फ नाम ही था। खुद राहुल गांधी ने पहली बार उन्हें अच्छा खासा अधिमान दिया मगर चुनाव नतीजों ने सब समीकरण ही बिगाड़ दिए हैं। वीरभद्र सिंह के अपने गृह क्षेत्र रामपुर जिसका इतिहास रहा है कि वह कांग्रेस के साथ चलता है। हर बार यहां से कांग्रेस को लीड मिलती है और मंडी संसदीय क्षेत्र में रामपुर की लीड को तोड़ने के लिए भाजपा कड़ी मेहनत करती है। परंतु इस बार जिस तरह का नतीजा आया है उससे रामपुर का किला भी भाजपा ने ध्वस्त कर दिया। रामपुर में भाजपा को 11500 से अधिक की लीड मिली है। इतना ही नहीं वीरभद्र सिंह के विधानसभा क्षेत्र अर्की में भी भाजपा को 29500 से अधिक की लीड दर्ज की गई है। इससे साफ है कि इस चुनाव में वीरभद्र का जादू अपने ही घर में नहीं चला। इसी तरह से कांग्रेस ने ऊपरी शिमला से पार्टी का अध्यक्ष कुलदीप सिंह राठौर को बनाया लेकिन राठौर अपने गृह क्षेत्र से ही कांग्रेस को कुछ नहीं दिला पाए। कॉडर वोट को छोड़ दें तो ठियोग-कुमारसैन विधानसभा क्षेत्र से भाजपा को  17300 से अधिक की लीड मिली। इससे भी साफ है कि राठौर को अध्यक्ष की कुर्सी तो मिली लेकिन ऊपरी शिमला में भी कांग्रेस के हाथ कुछ नहीं लग पाया। इसे मोदी की सुनामी का नतीजा कहें या फिर कांग्रेस की कमजोरी। कांग्रेस में विपक्ष के नेता मुकेश अग्निहोत्री भी अपने हरोली से कांग्रेस को लीड नहीं दिला पाए बल्कि यहां से भाजपा को 14900 से अधिक की लीड दर्ज की गई है। मुकेश को यहां कांग्रेस का उभरता हुआ नेता कहा जाता है और अपने क्षेत्र में उनका अच्छा खासा प्रभाव है। वह खुद तीन दफा विधायक चुने जा चुके हैं। इसी तरह से कांग्रेस के दूसरे नेताओं की बात करें तो जी.एस.बाली के यहां से भाजपा को 23 हजार से ज्यादा की लीड मिली है वहीं आशा कुमारी के विस क्षेत्र से 28 हजार 400 से ज्यादा की लीड, सुधीर शर्मा के यहां से 18600 से ज्यादा की लीड, सुखविंद्र सिंह सुक्खू के यहां से 27300 व कौल सिंह के द्रंग से 25500 से अधिक की लीड भाजपा को मिली है।

संगठन की कमजोरियां कांग्रेस पर हावी

देरी से घोषित किए प्रत्याशी

चुनाव लड़ने से कई नेताओं का इनकार

हार की पांच बड़े कारण

* नरेंद्र मोदी की प्रचंड लहर और जयराम की लोकप्रियता

* क्षेत्रवाद, अदला-बदली और टोपी की सियासत खत्म

*15 माह की बेदाग जयराम सरकार के ईमानदार प्रयास

*भाजपा का मजबूत संगठन और जमीनी पैठ

* कांग्रेस की गुटबाजी तथा दमदार नेता का अभाव

हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस की हार का सबसे अहम कारण उसका बिखरा हुआ कुनबा रहा है। इस बिखरे हुए कुनबे को संभालने में उसका शीर्ष नेतृत्व फेल रहा। भले ही कांग्रेस ने चुनाव से पहले संगठन में बदलाव किया मगर यह बदलाव चुनाव में उसके काम नहीं आ सका। कांग्रेस हाइकमान ने प्रदेश में प्रदेशाध्यक्ष की कुर्सी में बदलाव करके यह संकेत देने की कोशिश की कि संगठन में आम कार्यकर्ता भी अध्यक्ष बन सकता है। उसका यह संकेत कार्यकर्ताओं के लिए तो था मगर नेताओं को यह पसंद नहीं आया। इससे संगठन में गुटबाजी बढ़ी और एक नया गुट खड़ा हो गया। गुटबाजी के भंवर में फंसी कांग्रेस इसी में उलझकर रह गई। चुनाव के प्रचार अभियान में यह गुटबाजी समय-समय पर सामने आती रही। सार्वजनिक मंचों से खुद वीरभद्र सिंह बोलते रहे। पंडित सुखराम के खिलाफ आया राम गया राम की संज्ञा देने का मुद्दा ऐसा चमका की सुखराम की राजनीति खतरे में पड़े गई है। इसके साथ प्रत्याशियों के चयन में भी कांग्रेस आलाकमान ने लगातार देरी की, जिससे कांगे्रस के वर्करों का ही मनोबल टूट गया। इस वजह से शुरुआत में ही कांग्रेस चुनाव में पिछड़ती हुई नजर आई।  पहले एक प्रत्याशी फिर दो प्रत्याशी और फिर चौथा प्रत्याशी किश्तों में दिए गए, जिससे यह संकेत जनता में गया कि कांग्रेस के पास तो लड़ने के लिए लड़ाके की नहीं है। इसके अलावा पार्टी के नेताओं का चुनाव लड़ने से बार-बार इनकार करना भी संगठन पर भारी पड़ गया। कभी किसी का नाम आगे किया जाता रहा तो कभी किसी का। एक दूसरे का नाम आगे कर नेताओं ने बता दिया कि वह संगठन के लिए कुछ नहीं कर सकते, ऐसे में जनता में प्रचारित हुआ कि जो प्रत्याशी अब घोषित हुए हैं उन्हें बलि का बकरा बनाया गया है। पार्टी ने भाजपा के नेताओं को साथ मिलाने की भी कोशिश की जिसमें सफलता भी मिली लेकिन उसका कोई असर नहीं हो पाया। मंडी में पंडित सुखराम के पोते आश्रय शर्मा को सीधे दिल्ली से टिकट दे दिया गया, जिसने मंडी के साथ-साथ दूसरे क्षेत्रों में भी कांग्रेस के समीकरणों को बिगाड़ दिया। इस पर वीरभद्र सिंह के बयान भारी पड़ गए। 

हवाई प्रचार, धरातल पर कुछ नहीं

कांग्रेस संगठन में हुए बदलाव ने भी पार्टी को हवा में रखा और इनका हवाई प्रचार ही प्रदेश में चलता रहा। जमीनी स्तर पर नेता यह नहीं बता पा रहे थे कि आखिर उनके अभियान का होगा क्या। पार्टी हाइकमान ने बाकायदा नेताओं को  हेलिकॉप्टर भी दिया, लेकिन हेलिकॉप्टर से हवाई प्रचार ही होता रहा।

कांग्रेस को स्टार प्रचारकों की कमी खली

कांग्रेस को स्टार प्रचारकों की कमी भी खली। प्रियंका गांधी के कार्यक्रम यहां पर नहीं हो सके और संगठन यह तक कार्यकर्ताओं को बता नहीं पाया कि  आखिर यहां कौन सा नेता आ रहा है और कहां पर जनसभा करेंगे। राहुल गांधी की प्रदेश में दो रैलियां भी कांग्रेस के काम नहीं आ सकीं। संगठन की कई तरह की खामियां इस चुनाव में कांग्रेस की बड़ी हार की गवाह बनी है।