Wednesday, April 24, 2019 05:22 AM

पापा का प्यार

लघु कथा

संदीप एक गरीब परिवार का लड़का था। उसके पापा का नाम प्रवीण था। प्रवीण घरों को बनाने व उनकी मरम्मत करने का काम करता था। प्रवीण को उन दिनों बड़ी मुश्किल से दो सौ दस रुपए दिन की दिहाड़ी मिलती थी। घर में प्रवीण, उसकी पत्नी, संदीप (बेटा) और एक बेटी रहते थे। संदीप अभी ग्यारहवीं कक्षा में पढ़ता था। एक दिन उसने अपने पापा से कहा कि मुझे एक साइकिल लेनी है। प्रवीण कुछ सोचने के बाद बोला- संदीप बेटा, आज मेरी तबीयत थोड़ी खराब है। मैं आज काम पर नहीं जा सकता हूं। तुम एक काम करो, आज रविवार है, तुम्हें स्कूल की छुट्टी है तो आज तुम मजदूरी करने चले जाओ।

संदीप ने अपना सिर हिला कर हां कर दी। संदीप ने एक रोटी खाई और दो रोटी दोपहर के खाने के लिए एक लिफाफे में डालने के बाद काम के लिए चल पड़ा। तभी उसकी मां ने उसके हाथ में एक कागज दिया और बोली, संदीप जब दिहाड़ी के पैसे मिल जाएंगे तो इस कागज में जो सामान लिखा है, वो ले कर आना। वो कागज प्रवीण ने ही देने को बोला था। संदीप ने छोटी-सी स्माइल देकर बोला, जो आज्ञा माता जी। इतना कहते संदीप मुस्कुराता हुआ मजदूरी पर चला गया। संदीप तेज धूप में काम कर रहा था। उसने दो रोटी एक पेड़ के ऊपर रखी थी जो वह घर से दोपहर के खाने के लिए लाया था।

उस पेड़ पर एक कौआ रहता था जिस बात का संदीप को पता नहीं था। कौए ने उन रोटियों को खा लिया। जब संदीप को इस बात का पता चला कि घर से लाया खाना कौआ खा गया है तो उसे बड़ा गुस्सा आया, लेकिन संदीप ने थोड़ा सा पानी पिया और फिर से अपने काम पर लग गया। शाम को 5 बजे संदीप ने अपना काम खत्म किया और दिहाड़ी के 210 रुपए लेकर वहां से चल पड़ा। तभी संदीप ने वो कागज जेब से निकाला जो सुबह उसकी मां ने उसे दिया था। उसमें घर का राशन लिखा था जैसे दाल, चावल, आटा इत्यादि। संदीप ने सारा राशन ले लिया। सारे राशन का बिल 200 रुपए बन गया।

संदीप ने 200 रुपए दुकानदार को दिए और घर की तरफ  चल पड़ा। घर पहुंचने के बाद संदीप ने राशन मां को दिया और कहा कि खाना जल्दी बना देना, बहुत जोर की भूख लगी है। रात को करीब 8 बजे संदीप की मां ने परिवार के सदस्यों को आवाज दी, खाना बन गया है, आ जाओ। सभी आवाज सुन कर रसोईघर में आ गए और पालथी मार कर बैठ गए। हर दिन की तरह उस दिन भी खाना उतना ही बना था जितना बाकी दिनों बनता था। लेकिन संदीप को उस दिन ज्यादा भूख लगी थी जो कोई नहीं जानता था। जैसे ही संदीप के आगे खाना परोसा गया, संदीप उस पर ऐसे टूट पड़ा जैसे कोई भूखा शेर किसी हिरण का शिकार करता है। प्रवीण यह सब देख रहा था, वो समझ गया कि उसे ज्यादा भूख लगी है। प्रवीण ने एक खाली डकार लेते हुए कहा, आज दोपहर को मैंने ज्यादा खाना खा लिया था। इतना कह कर अपनी थाली से आधा खाना संदीप की थाली में डाल कर बोला, संदीप बेटा साइकिल कब लेनी है तुमने? संदीप ने कहा कि पापा मैं समझ गया, आपने मुझे दिहाड़ी पर क्यों भेजा था। मुझे अब साइकिल नहीं लेनी है। मैं अब खूब मन लगा कर पढ़ूंगा और एक अच्छी नौकरी करूंगा। फिर अपनी मोटर साइकिल लूंगा। उसके बाद संदीप ने खूब मेहनत की। आज संदीप के पास सरकारी नौकरी है, मोटर साइकिल है, एक कार है और सबसे बड़ी बात, उसने अपने पापा को एक स्कूटी भी लेकर दी है। अब प्रवीण दिहाड़ी के लिए स्कूटी पर शान के साथ जाते हैं।

                        -विशाल डोगरा