Friday, September 20, 2019 12:56 AM

पीएम की दो सामाजिक चिंताएं

प्रधानमंत्री मोदी ने 73वें स्वतंत्रता दिवस पर, लालकिले की प्राचीर से, कुछ बुनियादी सरोकारों की बात की। उन्होंने कश्मीर में 370, 35-ए को खत्म करने, अलगाववाद और आतंकवाद से लेकर एक देश एक ग्रिड, एक देश एक चुनाव, रोजमर्रा के जीवन में सरकार के दखल, भाई-भतीजावाद, विकास, 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था और प्लास्टिक की थैलियों का इस्तेमाल बंद करने तक कई मुद्दे उठाए। उन्होंने राजनीतिक दृष्टि भी स्पष्ट की और आर्थिक स्थितियों का खुलासा करते हुए गरीबी समाप्त करने का आह्वान भी किया। प्रधानमंत्री ने किसान सम्मान निधि से 90,000 किसानों को आर्थिक मदद देने की बात भी कही। उन्होंने देश में बुनियादी ढांचे के विस्तार पर 100 लाख करोड़ रुपए खर्च करने का संकल्प सार्वजनिक किया, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में 1.5 लाख हेल्थ, वेलनेस सेंटर, 1.25 लाख किमी सड़कें बनाने, 50000 स्टार्ट अप के लक्ष्य और डिजिटल भारत संबंधी घोषणाएं कीं। करीब 92 मिनट के संबोधन में प्रधानमंत्री आश्वस्त लगे और देश को भरोसा देते रहे कि 21वीं सदी के ‘न्यू इंडिया’ का खाका तैयार है। इस कालखंड में प्रधानमंत्री देशवासियों की अपेक्षाओं और आकांक्षाओं के प्रति ज्यादा सरोकारी लगे, लेकिन दो अहं सामाजिक समस्याओं पर कुछ ज्यादा ही चिंता  जताई-जनसंख्या विस्फोट और पेयजल संकट। जब हम यह आलेख लिख रहे थे, तब देश की आबादी 137 करोड़ से अधिक थी और आंकड़े हर पल बढ़ रहे थे। प्रधानमंत्री मोदी तो फिलहाल अपने भाषणों में 130 करोड़ देशवासियों की बात करते रहे हैं, लेकिन जिस गति से यह जनसंख्या विस्फोट जारी है, उस आधार पर 2027 में हम चीन की जनसंख्या को पीछे छोड़ देंगे और 2050 तक हमारी जनसंख्या 170 करोड़ को पार कर जाएगी। 2011 की जनगणना के बाद हमारी आबादी 2 करोड़ हर साल बढ़ती रही है। यानी हर साल एक ऑस्टेलिया की पैदाइश...! ऐसी सूरत में हमारे हालात क्या होंगे? देश में संसाधनों की कितनी किल्लत होगी? संसाधन सीमित पड़ेंगे! बिजली, पानी का संकट पैदा होगा! रोजगार कहां से और कौन दे सकेगा? रोजगार नहीं होगा, तो रोटी के लाले पड़ेंगे! रोटी नसीब नहीं होगी, तो आम आदमी हिंसक होगा! प्रधानमंत्री मोदी ने जनसंख्या विस्फोट से उपजी परिस्थितियों का उल्लेख नहीं किया और न ही इस समस्या को हिंदू-मुसलमान के दरमियान बांट कर देखा, लेकिन इतना जरूर कहा कि जिनके परिवार सीमित और छोटे हैं, दरअसल वे देशभक्त हैं। गौरतलब यह है कि हमारी 65 फीसदी आबादी युवा है। वह या तो पढ़ रहा है अथवा पढ़ने के बाद रोजगार की तलाश में है। यदि उस पीढ़ी और वर्ग को उसका वांछित हासिल नहीं हो पाएगा, तो वह किस रास्ते जा सकता है? इन तमाम संभावनाओं के मद्देनजर मोदी सरकार को संसद के लिए एक विधेयक तैयार करना चाहिए और अंततः उसे कानून का रूप देना चाहिए। राज्यों के स्तर पर उत्तराखंड, महाराष्ट्र, ओडिशा और बिहार आदि में कानून हैं कि जिनके दो बच्चों से अधिक हैं, वे पंचायत और निकाय के चुनाव नहीं लड़ सकते। ऐसे ही प्रावधान राष्ट्रीय स्तर पर क्यों नहीं किए जा सकते? सिर्फ  जागृति फैलाने या अपील करने से ही औसत विवाहित भारतीय छोटे परिवार के लिए तैयार नहीं हो सकता। एक ऐसी जमात भी है, जिसके आज भी चार से सात तक बच्चे हैं, लेकिन उसके पास उनके भरण-पोषण के लिए पर्याप्त आर्थिक स्रोत नहीं हैं। कानून बनाने के बावजूद उस जमात और बच्चों का क्या होगा? बहरहाल इतनी ही संवेदनशील समस्या पेयजल की है। इस साल अति वर्षा और बाढ़ के कारण 250 से अधिक मौतें हो चुकी हैं। असंख्य घर ध्वस्त हो चुके हैं। कितने खेत-खलिहान बंजर हो चुके हैं, उनका हिसाब अभी सामने आना है। खुद प्रधानमंत्री मोदी ने लालकिले से कहा है कि देश में लगभग आधे घर ऐसे हैं, जहां पेयजल नहीं है। माताओं-बहिनों को आज भी पानी के लिए मीलों जाना पड़ता है। गली-मुहल्लों में सरकारी वाटर टैंकर आता है, तो औरतें आपस में लड़ पड़ती हैं। पानी तो हरेक घर को चाहिए! लिहाजा प्रधानमंत्री मोदी ने ‘जल-जीवन मिशन’ नाम की योजना की घोषणा की है। इस योजना पर 3.5 लाख करोड़ रुपए का बजट तय किया गया है। दरअसल बुनियादी दिक्कत यह है कि पानी को लेकर हमारे देश में संस्कृति ही नहीं है। कई अभियान छेड़े गए, लेकिन बरसात के पानी को संग्रहित करने की ठोस पहल नहीं हो पाई है। बाढ़ें हर साल आती हैं। हम चांद पर पहुंचने वाले हैं, लेकिन बाढ़ से बचाव का रास्ता नहीं निकाल पाए हैं। पुराने जोहड़, पोखर, तालाब या तो सूख गए हैं अथवा उन पर भवन खड़े कर दिए गए हैं। अब प्रधानमंत्री चाहते हैं कि पानी के महत्त्व की शिक्षा बचपन से ही दी जाए। जल संचय को जन अभियान बनाया जाए। आह्वान तो है, लेकिन योजना और अभियान कितने कारगर साबित होते हैं, यह आने वाले दिनों में ही स्पष्ट होगा और ये दोनों राष्ट्रीय और भयावह समस्याएं हैं।