पुराना लतीफा नई तासीर

सुरेश सेठ

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जनाब, लोग परेशान हैं कि हम उनका दिल पुराने लतीफे सुना-सुना कर बहलाने का प्रयास करते हैं। जैसे एक शक्तिवान भरे पूरे मालिक के पास एक नौकर को काम करते हुए कई बरस हो गए। मालिक वेतन बढ़ाने में ही न आए। एक दिन आजिज आकर नौकर भृकुटि तान मालिक के पास गया, बोला-‘जनाब, बहुत हो गया। इस महीने या तो आप मेरी तनख्वाह बढ़ा दीजिए, वरना... वरना क्या? मालिक ने रौब दिखाया।...नहीं तो..... क्या? मालिक रौबीली आवाज़ में फिर बोला कि जैसे उसे अभी कार्य-स्थल से उठवा कर बाहर फेंकवा देगा।...नहीं तो....नहीं तो....‘मैं इसी वेतन पर काम करता रहूंगा।’ नौकर ने कहा था। यह तो पुराना लतीफा था। यहां पर खत्म हो गया। पंजाबी की कहावत चाहे अपना सिर पीट लें, कि ‘माशा अल्लाह! बेगम साहिबा, रो अपने यार की विरह में रही हैं, लेकिन दुख अपने भाइयों का नाम ले लेकर, उनके गायब हो जाने का कहके आठ-आठ आंसू रो देती है।’ इसी तरह हमारे क्रांतिवीर नेताओं के अपराधों के फैसले न्यायपालिका की तारीख दर तारीख के कुएं में लटके हुए हैं, और वे जनता के लिए मौसम बदलने से पहले ही किसी नई क्रांति की घोषणा कर देना चाहते हैं। लीजिए साहब हम आज के जमाने में पुराने लतीफों के रंग बदलने की कह रहे थे और बात क्रांतियों के रंग बदलने की होने लगी। हुजूर हम तो उसी वेतन पर काम करना मान गए थे, फिर आप अपनी ताकत पर भाषण क्यों दिए जा रहे हैं। लतीफा सुनाने की हिम्मत करने वाला कर्मचारी गिड़गिड़ाने लगा। क्योंकि उसे लग रहा था कि मालिक की इन बातों के भंवर में वह खुद लतीफा बनने जा रहा है। उसका शक सही निकला, मालिक मूड में आ गए। बोले, ‘बंधु कितने बरसों से हमारे पास हमारी छत्र छाया में अस्थायी नौकरी कर रहे हो’ ‘हुजूर दस पंद्रह वर्ष हो गए। आपने कहा भी था एक दिन हम तुडो पक्का कर देंगे।’ हांए वह एक दिन ही तो आ गया है। हमने तुम्हारी नौकरी पक्की करने का मन बना लिया है। मालिक ने कृपापूर्वक अट्टहास किया। नौकर ने गदगद होकर चरण वंदना की। ऐसे अच्छे और उदार मालिक को वह लतीफा सुनाने की जुर्रत कर रहा था वह, कंबख्त मालिक ने आदेश दिया, जा तुडो हमने पक्का किया। हमारे पक्के  कर्मचारियों के नियमानुसार अब तू तीन बरस के लिए आधी तनख्वाह पर काम करेगा। इसे मूल वेतन कहते हैं। हमें जंचा तो बाद में पूरा पक्का वेतन दे देंगे, नहीं तो एक साल फिर वही वेतन।‘ कर्मचारी को लगा, ‘बंधु कह कर मालिक ने उसकी तनख्वाह बढ़ाने के स्थान पर आधी कर दी। अब पक्का होना है तो इस पर काम करो, नहीं तो राम धुन गाओ।’ साहिब कर्मचारी तो कर्मचारी है। कुछ एक दिन विरोध में हाथ पांव पटकेगा, फिर अपने आप सीधे रास्ते पर आ जाएगा। तभी क्या हुआ साहब, ऊपर पीपल पर बैठा बैताल राजा विक्रमादित्य से पूछने लगा ‘बता राजा, लतीफा कौन बना?’ राजा जिसने उसे पक्का किया, या कि वह कर्मचारी जो तनख्वाह बढ़वाने के नाम पर वेतन आधा करवा बैठा।’ बैताल कंधे पर चढ़ा था, लेकिन विक्रमादित्य के पास ऐसे सवाल का कोई जवाब नहीं। जवाब तो उन दो लाख नौजवानों के पास भी नहीं, जिन्होंने दर्जा चार की पंद्रह सौ आसामियों के लिए आवेदन पत्र दे दिए। जानते हो इन आवेदकों में से कई डाक्टरेट थे और कई बी-टैक, एम-टैक। जवाब नहीं मिला तो पीपल का बैताल नहीं, सड़क पर पकौड़े तलने वाला एक डिग्रीधारी बोला। ‘प्यारे स्वरोजगार सिद्धांत का पालन करो। अपना हाथ जगन्नाथ होता है। अगर तुम्हारे पास कोई दलाल है तो आओ बिना गारंटी कर्ज मिलते हैं। इनसे अपना हाथ जगननाथ करो, और देश के विकास को नौकरीशुदा बनाओ। क्या आधी पूरी तनख्वाह के फेर में पड़े हो? बोलो जय-जय।’ 

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