पुष्पोत्पादन पर बरपा कोरोना का कहर

प्रताप सिंह पटियाल

लेखक बिलासपुर से हैं

राज्य में कई किसान खुले खेतों में गेंदा, मोगरा, पूसा आदि फूलों की पैदावार भी कर रहे हैं। इन फूलों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल पूजा-पाठ से लेकर नवरात्र आदि पर्वों, कई धर्मस्थलों, त्योहारों, सांस्कृतिक व मांगलिक कार्यक्रमों, सामाजिक समारोहों, सेवानिवृत्ति तथा सियासी मंचों से लेकर विवाह के सीजन तक में होता है। इन्हीं तमाम कार्यक्रमों पर इन फूलों की खेती का व्यवसाय तथा इससे जुड़े किसानों की आजीविका निर्भर है, लेकिन कोविड-19 से उपजे राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन से तमाम व्यापारिक व सामाजिक सामारोहों की गतिविधियां तथा मंदिरों के कपाट बंद होने से किसान फूलों को बाजारों तक पहुंचाने में असमर्थ रहे...

वैश्विक महामारी कोरोना वायरस कोविड-19 ने ऐसे समय में दस्तक देकर राज्य के शांत माहौल को भयभीत किया है जब रबी की फसल अपने पूरे चरम पर है। फसल कटाई के समय मौसम के हर पल बदलते तेवरों ने कई स्थानों पर किसानों की कई महीनों की मेहनत पर पानी फेर दिया, वहीं फलदार पौधों की फ्लावरिंग के समय आंधी-तूफान व ओलावृष्टि के कहर ने बागबानी क्षेत्र को व्यापक नुकसान पहुंचाकर लाखों रुपए की चपत लगाकर संकट में डाल दिया है। बागबानी के बाद कोरोना के काले साए की जद में आने से किसानों का जो व्यवसाय सौ प्रतिशत तक बर्बाद हुआ है, वह है फ्लोरिकल्चर। फूलों की खेती में भी प्रदेश देश के अग्रणी राज्यों में शुमार करता है। दरअसल 2007-08 के दौरान हिमाचल के बिलासपुर सहित कुछ दूसरे जिलों में कई बागबानों ने फूलों की खेती को बढ़ावा देने के लिए ग्रीन हाउस शैड स्थापित किए थे, ताकि पुष्पोत्पादन व्यवसाय को युवाओं के लिए स्वरोजगार तथा आर्थिकी का साधन बनाया जा सके। ग्रीन हाउस जिसमें कार्नेशन, लिलियम ट्यूलिप व जिप्सोफिला जैसे फूलों की कई प्रजातियों को विशेष तकनीक से तथा नियमित वातावरण में तैयार किया जाता है।

इस व्यवसाय में सरकार ने उद्यान विभाग के जरिए अनुदान देकर बागबानों की सहायता भी की थी। हालांकि इनमें से कुछ शैडों में सब्जी की पैदावार भी होती है तथा कुछ में पुष्पोत्पादन होता है। मगर ग्रीन हाउस लगने के बाद काफी अरसे तक उस फूल उत्पादन को बिक्री के लिए हिमाचल में कोई घरेलू बाजार उपलब्ध नहीं हुआ। न ही पड़ोसी राज्यों में उचित मार्केट मिली। महंगे फूलों को मार्केट में ले जाने के लिए तथा उनकी गुणवत्ता को बरकरार रखने के लिए ‘रेफ्रिजरेटर वैन’ जैसी आधुनिक सुविधाओं की भी दरकार रही। ग्रामीण क्षेत्रों से कड़ी मशक्कत तथा कई दिक्कतों का सामना करने के बाद बागबान फूलों की पेटियों को बस अड्डों पर पहुंचाकर  अपने जोखिम पर हिमाचल पथ परिवहन निगम की बसों की छतों पर लादकर दिल्ली जैसे महानगरों में भेजते रहे हैं तथा वहां से आगे दोबारा वाहनों से फूलों को मुख्य मार्केटों में पहुंचाया जाता था। वाहनों पर लंबी दूरी के सफर में गर्मी व बारिश जैसी परिस्थितियों में कई बार फूलों की स्थिति खराब हो जाती थी। नतीजतन कड़ी मेहनत, महंगी मजदूरी व वाहनों के किराए के अनुरूप इन बाजारों में भी बागबानों को फूलों का वाजिब व वास्तविक दाम हासिल न होने से फ्लोरिकल्चर व्यवसाय प्रभावित होकर हाशिए पर चला गया। अप्रैल व मई के महीनों में तमाम तरह के फूलों की खेती अपने पूरे शबाब पर होती है। लॉकडाउन के कारण बाजार बंद होने से कीटनाशकों के अभाव से फूलों की खेती छिड़काव से महरूम रह गई। रही-सही कसर कोरोना ने पूरी कर दी। कोरोना संक्रमण से उपजे लॉकडाउन ने बागबानों के अरमानों पर पानी फेर कर फूल व्यवसाय पर न सिर्फ  गहरा असर डाला, बल्कि पूरे पुष्पजगत के आर्थिक ढांचे को ध्वस्त करके बागबानों को मुज्तरिब भी कर दिया। इस व्यवसाय के लिए कई बागबानों ने बैंकों से ऋण भी ले रखा था। राज्य के कई जिलों में किसान ग्रीन हाउस के अलावा शैड नेट लगाकर भी कई प्रकार के फूलों की खेती करते हैं जिनमें गुलाब की ‘रेड रोज’ व ग्रेंडी फ्लोरा जैसी उन्नत प्रजातियों का उत्पादन भी हो रहा है। बाजारों में गुलाब जल तीन सौ से चार सौ रुपए प्रति लीटर उपलब्ध होता है, जबकि गुलाब के तेल की कीमत सात लाख रुपए प्रति लीटर के पार है।

गुलाब की खेती के लिए हिमाचल की आबोहवा अनुकूल है, लेकिन गुलाब के पुष्पोत्पादन के लिए भी चंडीगढ़ या दिल्ली जैसे बडे़ शहरों से पीछे कोई मुफीद मार्केट नहीं है। इसके अलावा राज्य में कई किसान खुले खेतों में गेंदा, मोगरा, पूसा आदि फूलों की पैदावार भी कर रहे हैं। इन फूलों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल पूजा-पाठ से लेकर नवरात्र आदि पर्वों, कई धर्म स्थलों, त्योहारों, सांस्कृतिक व मांगलिक कार्यक्रमों, सामाजिक समारोहों, सेवानिवृत्ति तथा सियासी मंचों से लेकर विवाह के सीजन तक में होता है। इन्हीं तमाम कार्यक्रमों पर इन फूलों की खेती का व्यवसाय तथा इससे जुड़े किसानों की आजीविका निर्भर है, लेकिन कोविड-19 से उपजे राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन से तमाम व्यापारिक व सामाजिक समारोहों की गतिविधियां तथा मंदिरों के कपाट बंद होने से किसान फूलों को बाजारों तक पहुंचाने में असमर्थ रहे और फूलों की लाखों रुपए की फसल खेतों में ही बर्बादी की कगार पर चली गई। इसलिए सरकारों को कोविड-19 के कहर से फ्लोरिकल्चर की डूब रही इकॉनोमी तथा इस व्यवसाय से जुडे़ मेहनतकश बागबानों को राहत देने की योजना पर विचार करना होगा।

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