Thursday, June 20, 2019 03:29 PM

पुस्तक मेले ने तोड़ी लेखकीय-पाठकीय खामोशी

पुस्तक मेले के यादगार लम्हे

27 अपै्रल से शुरू हुआ धर्मशाला पुस्तक मेला 5 मई को संपन्न हो जाएगा। इस पुस्तक मेले के यादगार लम्हे हम पाठकों के लिए लेकर आए हैं। इसमें पुस्तक मेले की सफलता की समीक्षा की गई है। पुस्तक मेले ने कितनी लेखकीय व पाठकीय खामोशी तोड़ी, जो चाहा, क्या वह इस पुस्तक मेले में मिल गया, या जो नहीं मिला और जिससे साहित्यकार प्रभावित हुए? एक परिक्रमा, एक अवलोकन और किताबों के बीच पुस्तक मेले के सारथी के रूप में विभिन्न साहित्यकारों की क्या अनुभूति रही, इन्हीं प्रश्नों को सुलझाता इस बार का प्रतिबिंब पेश है ः

मेले ने हर वर्ग की रुचि को तुष्ट किया

डा. प्रत्यूष गुलेरी धर्मशाला

धर्मशाला पुस्तक मेले में जिन लेखकों, मित्रों से मिले अरसा हो गया था, उनसे अचानक मुलाकात खुशियां लेकर आई। यह मुलाकातें उस तरह की खुशियां दे रही थीं जैसे  सामाजिक-धार्मिक उत्सव मेलों में अपने-बेगाने लोगों से मिलकर होती है। राष्ट्रीय पुस्तक न्यास भारत के सौजन्य से आयोजित पुस्तक मेले ने लेखकीय व पाठकीय चुप्पी को तोड़ा है, यह कहा जाए तो अत्युक्ति नहीं। जितने दिन और जिस समय मैं जाता रहा, उस दौरान पुस्तकों के विभिन्न स्टालों पर विभिन्न आयु वर्ग के पाठक निजी रुचि  अनुरूप पुस्तकें छांटते-खरीदते मिले।  स्थानीय लेखकों में भी  रोजाना लेखकों की आपसी  गुफ्तगू होती रही और कुछ  लेखक  पुस्तकें प्रकाशित कराने को लेकर  प्रकाशकों  से बतियाते-परामर्श करते मिले। कई प्रकाशक हिमाचल के लेखकों को छापने  में  रुचि  लेते दिखाई दिए। इसी तरह चाहा हुआ सब किसी को कब मिलता है? जो मिला, जितना मिला, उससे  संतोष  होना चाहिए। नया कुछ  और मिलने की, रचने की संभावनाएं बनी रहनी चाहिए, मैं ऐसा  निजी तौर पर मानता हूं। किताबों का उमड़ा समुद्र आश्चर्यजनक  रहा। हर किस्म, हर वर्ग, हर भाषा व हर विधा में आप मनपसंद की पुस्तकों पर निगाह मार सकते थे, खरीद भी सकते थे। स्कूल के बच्चों को लुप्त हो रही लोक-खेलों की ओर आकर्षित किया  जा रहा था। उन्हें उनकी अंतर्निहित कला को प्रकट करने के अवसर जुटाए जाना भी खरा अनुभव था। पत्रकारिता और  साहित्य पर रखे  कार्यक्रमों से भी प्रभावित होना स्वाभाविक था। साहित्य और पत्रकारिता का  सदैव से चोली-दामन का साथ रहा है, वह पुस्तक  मेले में भी सुकून देने वाला था। कुछ पुस्तक विक्रेता  खुश थे सेल  से, कुछ खरीददारी से नाखुश भी थे। ई-बुक्स, इंटरनेट की किताबों  से जुड़े प्रकाशकों ने लिख कर लगा रखा था-आप लिखो, हम छापेंगे। सच पूछा जाए तो हर लेखक रोजाना पुस्तक मेले में खुश  रह सकता है। पुस्तकें सब की जीवन साथी हैं। पुस्तकों की परिक्रमा अपने इष्ट की, देवता की परिक्रमा है, पूजा है।                                  

मन व मेधा के परिष्कार का सुलभ अवसर

प्रो. चंद्ररेखा ढडवाल धर्मशाला

अपने में खोया-सा शांत शहर है धर्मशाला, परंतु इसके अनमनेपन और शांति में वैचारिक हलचल अकसर दस्तक देती है। इसके भीतर से तो ये सतत सिलसिला, इस जगह की मानसिक बनावट है ही, परंतु बाहरी आहट को, हल्की पदचाप तक को, ग्रहण करने की उदारता और क्षमता भी यहां के लोगों में है। यहां आयोजित किताबों का मेला, विभिन्न विषयों पर लेखकीय मंतव्यों का मेला है। मन व मेधा के परिष्कार का सुलभ अवसर है। वैचारिक आदान-प्रदान के इस अवसर का सदुपयोग हो रहा है। अपने दरवाजे पर पहुंचे पुस्तक भंडार ने लोगों को आकर्षित किया है। लेखकीय व पाठकीय संवेदना का यह पुस्तक मेला बाकायदा हिस्सा बन रहा है। कहां कितना प्रभाव है, यह व्यक्ति सापेक्ष है। घर की शेल्फ पर रखी किताबों में इजाफा हुआ है। किताब जिसने नहीं भी खरीदी, किताब को लेकर सोचा जरूर है। ‘दिव्य हिमाचल’ द्वारा आयोजित लेखक के साथ पुस्तक यात्रा के दौरान पुस्तकों के अनंत भंडार ने मन को कृतज्ञता से भर दिया रचनाकारों के प्रति। यद्यपि यहां बहुत किताबें उपलब्ध हैं, परंतु ये तो अनंत समुद्र है, कुछ लहरें तो छूटी ही हैं। मेले के अंतर्गत आयोजित कार्यक्रमों के आकर्षण ने भी लोगों को बांधा, लेकिन इन आयोजनों में वस्तुनिष्ठता की कमी थोड़ा खली। खैर, यह तो होता ही है:

बुतखाने जो अपनी जमीनों पर बनाते हैं ये उनकी तबीयत है खुदा किसको बनाते हैं।

 बच्चों के लिए विभिन्न कार्यशालाएं महत्त्वपूर्ण रहीं। आज के समय में किताबों और रचनात्मकता से दूर हो रहे बच्चों को पढ़ने-लिखने की ओर उन्मुख करना जरूरी है। लेखकों, प्रकाशकों और पत्र-पत्रिकाओं की जिम्मेदारी है यह, जिसे निष्ठापूर्वक निभाया जाता देखना बहुत सुखद लगा।   

इंटरनेट से चिपके रहने वाले भी आए

सत्येंद्र गौतम धर्मशाला

किसी शांत झील में पत्थर मारा जाए तो उस जल राशि में लहरें उठने लगती हैं। धर्मशाला में चल रहे पुस्तक मेले ने भी कदाचित लेखक और पाठक के मानस-पटल पर ऐसी ही हलचल उत्पन्न कर दी है। व्यापक स्तर के इस आयोजन ने जहां सुप्त लेखक को लेखन के लिए और सुस्त पाठक को पठन के लिए जागृत किया है, वहीं कर्मरत लेखकों को संभावनाओं के द्वार भी दिखाए हैं। नेशनल बुक ट्रस्ट के सौजन्य से 27 अप्रैल से पांच मई तक की लंबी अवधि और प्रचार-प्रसार ने दूरदराज के लोगों को मेले में पहुंचने के लिए पर्याप्त समय उपलव्ध करवाया है। स्थानीय मीडिया ने चुनावों की आपाधापी के बावजूद साहित्यिक सरोकारों को बखूबी निभाया है। निस्संदेह दिव्य हिमाचल समाचार पत्र इस प्रयास में शिखर पर है। परिणामस्वरूप लेखक और पाठक ही मेले में नहीं पहुंचे, अपितु वे बच्चे और युवा भी यहां पहुंचे जिनके कंधों पर भविष्य का पठन और लेखन कर्म जुड़ा हुआ है।

मोबाइल और लैपटॉप से चिपके रहने वाली इस पीढ़ी को भी पुस्तक पढ़ना अधिक सुविधाजनक और रुचिकर लगता है, यह जानना लेखकों और प्रकाशकों के लिए सुखद संकेत है। मेले में जहां विभिन्न भाषाओं और कालखंड के महान लेखकों की पुस्तकें उपलब्ध हैं, वहीं आदिवासी साहित्य की पुस्तकें भी हैं। इससे न मात्र तत्कालीन साहित्य और संस्कृति से साक्षात्कार होता है, अपितु रहस्यमयी आदिवासी जीवन को जानने-समझने का भी अवसर मिलता है। मेले में कमोबेश वह सब कुछ मिल रहा है जो वांछित है। बाल साहित्य, खेल का सामान, पठन में सहायक आधुनिक उपकरण भी उपलब्ध हैं जो बच्चों और युवाओं को मेले में आकर्षित करके पुस्तकों के समीप ला रहे हैं। उनमें लेखन और पठन के प्रति रुचि जगा रहे हैं। मेले में हर आयु वर्ग और रुचि के पाठकों के लिए देशी-विदेशी साहित्य और ज्ञान की इतनी मात्रा है कि शायद ही इतनी क्रय की जा सके। जहां सर्वकालिक महान लेखक मुंशी प्रेम चंद का साहित्य है तो वहीं डा. अब्दुल कलाम की प्रेरक पुस्तकें भी हैं। धर्मशाला के इतिहास का दर्पण दिखाने वाली पुस्तक ‘टाउन सर्वे रिपोर्ट ऑन धर्मशाला’ भी यहां मिल सकती है। आधुनिक कम्प्यूटर साफ्टवेयर से लेकर वैदिक गणित से संबंधित पुस्तकें भी यहां हैं। मूल्य के मामले में 1971 की पुस्तकें 1971 के मूल्य पर ही उपलब्ध हैं। सभी के लिए कुछ न कुछ उपलब्ध है। मेले में ही बच्चों के लिए कार्यशाला से लेकर साहित्यिक गोष्ठियों का आयोजन लेखकों और पाठकों में सीधा संवाद स्थापित करने का बेहतर प्रयास है। निस्संदेह मेले के आयोजन की परिकल्पना ऐसी है जिससे प्रभावित हुए बिना नहीं रहा जा सकता। मेले के दौरान अगर स्थानीय लेखकों की पुस्तकों का विमोचन, दिवंगत लेखकों की स्मृति में और नवागंतुक लेखकों के प्रोत्साहन की दिशा में भी कार्यक्रम होते तो निश्चय ही मेला अधिक पाठकों और लेखकों को प्रेरित करता। जहां लेखन को किसी घटना या परिवेश के कारण संवेदनशील होना आंतरिक विचारों की अभिव्यक्ति या जीविकोपार्जन का परिणाम माना जा सकता है, वहीं स्तरीय पठन से व्यक्ति में बेहतर सोच उत्पन्न होती है जिससे आंतरिक, पारिवारिक और सामाजिक विकास होता है। इससे देश-समाज को अधिक श्रेष्ठ बनाने में सहायता मिलती है। पुस्तकें मनुष्य को जीवन को जानने और समझने के व्यापक अवसर उपलव्ध करवाती हैं और पुस्तक मेले ऐसे ही आयोजन हैं जहां इस ज्ञान भंडार को संग्रहित किया जा सकता है। ऐसे स्तरीय मेले में मेरे जैसे किसी भी लेखक का न केवल भ्रमण व अपने पुस्तकालय में कुछ और पुस्तकों के संचयन का अवसर मिलना, अपितु हिमाचल के प्रतिष्ठित समाचार पत्र के वेब पोर्टल के लिए साक्षात्कार देना व कवि के रूप में गोष्ठी में सम्मिलित रहना निश्चय ही वे यादगार पल रहेंगे जो इस मेले में मिले।

पुस्तकें हमारी अनमोल धरोहर हैं

रोशन लाल शर्मा प्रोफेसर, सीयू

इस बार ‘दिव्य हिमाचल’ के संयोजन में लेखक के साथ पुस्तक यात्रा में धर्मशाला पुस्तक मेले में शिरकत करने का अवसर प्राप्त हुआ। इसमें कोई संदेह नहीं कि इस पुस्तक मेले ने विभिन्न स्तरों पर लेखकीय एवं पाठकीय तोष के भाव को सेंध लगाई है। पत्रकार पवन शर्मा केधारदार प्रश्नों की लड़ी ने मुझे यह सोचने पर बाधित किया कि पुस्तक आखिर है क्या? क्या उसका कोई जीवन काल होता है? क्या पुस्तकें मात्र कलात्मक अवबोध का जरिया मात्र हैं? बदलते युगीन विमर्शों के साथ क्या पुस्तकीय अवधारणाएं बदली हैं? आज के नव जनसंचार माध्यमों से पुस्तकों का मुद्रित माध्यम क्या सार्थक तौर पर जुड़ पा रहा है या इस प्रतिस्पर्धा में हम अपनी पठन-पाठन की वृत्ति से जाने-अनजाने समझौता कर रहे हैं? इस तरह के रोचक प्रश्नों एवं विचार बिंदुओं के साथ पुस्तक मेले की परिक्रमा का जो अवसर दिव्य हिमाचल ने प्रदान किया, उसकी अनुभूति शब्द से परे है। विश्वविद्यालय के प्रोफेसर के नाते इस यात्रा के दौरान अपनी वास्तविक भूमिका पर पुनर्विचार करने का अवसर भी मिला जिसके केंद्र में पुस्तकें और केवल पुस्तकें मिलीं। आज का दौर निस्संदेह कठिन है, चाहे आप इसे विद्यार्थी की दृष्टि से देखें या प्राध्यापकीय। इस विषय में मेरी गहनतम अनुभूति यही रही कि पुस्तकें किसी भी सभ्यता, समाज या संस्कृति का परिष्कृत संस्कार होती हैं। इनसे औपचारिक या अनौपचारिक रूप में जुड़ना हमारे मानवमात्र होने को सार्थक परिणति प्रदान करता है। हम सब जानते हैं कि आज के दौर में पढ़ने की संस्कृति का लगभग हृस हो चुका है। मेरी यह धारणा है कि विद्यार्थियों या गैर विद्यार्थियों, लेखकों  या पाठकों, बुद्धिजीवियों या गैर बुद्धिजीवियों तथा व्यावसायिकों  अथवा गैर व्यावसायिकों को पढ़ने की संस्कृति से जुड़ना चाहिए। इस सद्प्रयास में पुस्तकें हमारी अंतरंग मित्र बन सकती हैं।

पुस्तक मेला सकारात्मक पहल

चंद्रकांत सिंह सहायक प्रोफेसर, सीयू

राष्ट्रीय पुस्तक न्यास के तत्त्वावधान में धर्मशाला के पुलिस मैदान में पुस्तक मेले का भव्य आयोजन हुआ। इस आयोजन ने लेखकों एवं साहित्यकारों को एकीकृत मंच पर न खड़ा कर पाने के कारण आलोचनाओं का भी सामना किया है। पहले बात सकारात्मक पहलुओं की, राष्ट्रीय पुस्तक न्यास का यह कदम उल्लेखनीय है क्योंकि इसके जरिए विद्यालयों, महाविद्यालयों एवं केंद्रीय विश्वविद्यालय के छात्रों का इससे जुड़ना पुस्तकों के प्रमुख हितधारकों से जुड़ना ही कहा जाएगा। न्यास ने विद्यालयों एवं महाविद्यालयों-विश्वविद्यालय आदि के हुनरमंद विद्यार्थियों की छिपी प्रतिभाओं को पुष्पित-पल्लवित होने का यथासंभव अवकाश दिया। निस्संदेह इससे सृजन एवं उसकी समूची प्रक्रिया को समझने और प्रेरित होने का सुयोग्य अवसर भी प्राप्त होता है। विभिन्न साहित्यिक गतिविधियों के आयोजन से इस कार्यक्रम को बड़ी सफलता मिल रही है क्योंकि लेखकों की किताबों से आपसदारी भिन्न किस्म की होती है।  इस पुस्तक मेले की जो बड़ी कमी देखने योग्य है कि कई नामचीन लेखकों से पाठकों का परिचय नहीं हो सका जिससे कि वाद-विवाद-संवाद की सार्थक धारा का विकसित रूप नहीं उभर सका।