Saturday, January 25, 2020 11:24 PM

पूजा का आरंभ करने से पहले संकल्प लें

 इस पूजा का आरंभ करने से पहले संकल्प लिया जाता है। संकल्प का अभिप्राय यह है कि मैं अमुक नाम का व्यक्ति अमुक गोत्र एवं जाति में उत्पन्न हुआ। आज इस दिन, तिथि और समय पर, अमुक स्थान पर, अमुक कार्य या सिद्धि हेतु अमुक अनुष्ठान करने का संकल्प लेता हूं। संकल्प लेने के बाद सर्वप्रथम श्री गणेश जी का पूजन करें। यह पूजन पंचोपचार विधि से संपन्न करना चाहिए अर्थात ‘श्रीगणेशाय नमः’ कहकर उसके प्रतीक पर जल छिड़ककर ‘आवाहनं समर्पयामि, आवाहनांते पादयो पाद्यं हस्तयो अर्घ्यं सर्वांगे, स्नानं समर्पयामि, स्नानांते गंधं अक्षतं पुष्पं समर्पयामि, पुष्पांते धूपं आघ्रापयामि, धूपांते दीपं दर्शयामि, दीपांते नैवेद्यं ताम्बूलं पूंगीफलं सुदक्षिणाम्’ कहें...

 -गतांक से आगे...

नौ खानों का एक यंत्र अक्षतों से बनाकर उसके दो खानों में मलका मसूर, एक में साबुत मूंग, तीन में काले साबुत उड़द, एक में चने की दाल तथा शेष दो खानों में चावल भरकर नवग्रह यंत्र पूरा करें। अब मिट्टी के एक साफ घड़े में जल भर दें। फिर आम, पीपल तथा अशोक आदि के पत्ते और एक पानी वाला नारियल लाल वस्त्र में लपेटकर घड़े के ऊपर रख दें। यह घड़ा या कलश भूमि पर थोड़ी साफ-पवित्र मिट्टी बिछाकर रखना चाहिए। यदि संभव हो तो उस मिट्टी में जौ के कुछ दाने भी मिला दें। इसे वरुण देवता का कलश मानना चाहिए। यदि साधक के कुल में किसी देवी-देवता की पूजा प्राचीन काल से होती चली आ रही है तो उसे अपना कुल देवता मानकर पूजा करनी चाहिए। इस पूजा का आरंभ करने से पहले संकल्प लिया जाता है। संकल्प का अभिप्राय यह है कि मैं अमुक नाम का व्यक्ति अमुक गोत्र एवं जाति में उत्पन्न हुआ। आज इस दिन, तिथि और समय पर, अमुक स्थान पर, अमुक कार्य या सिद्धि हेतु अमुक अनुष्ठान करने का संकल्प लेता हूं। संकल्प लेने के बाद सर्वप्रथम श्री गणेश जी का पूजन करें। यह पूजन पंचोपचार विधि से संपन्न करना चाहिए अर्थात ‘श्रीगणेशाय नमः’ कहकर उसके प्रतीक पर जल छिड़ककर ‘आवाहनं समर्पयामि, आवाहनांते पादयो पाद्यं हस्तयो अर्घ्यं सर्वांगे, स्नानं समर्पयामि, स्नानांते गंधं अक्षतं पुष्पं समर्पयामि, पुष्पांते धूपं आघ्रापयामि, धूपांते दीपं दर्शयामि, दीपांते नैवेद्यं ताम्बूलं पूंगीफलं सुदक्षिणाम्’ कहें। फिर विधिवत आरती आदि की प्रक्रिया करें। इसके बाद कलश और यंत्रादि की भी पूजा करें। उपरोक्त सब विधान केवल पहले दिन आरंभ में करना होता है। इसके बाद हवन क्रिया की जाती है। जिस तंत्र से संबंधित मंत्र को सिद्ध करने के लिए जितनी जप-संख्या का निर्देश हो, उसका दसवां भाग हवन करना चाहिए। हवन करते समय मंत्र के अंत में ‘स्वाहा’ लगाया जाता है, जैसे- ‘ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै विच्चे स्वाहा’। यदि किसी मंत्र जप की संख्या एक लाख है तो उसके हवन की संख्या दस हजार होगी। हवन का दसवां भाग तर्पण होता है। इसमें मंत्र के अंत में ‘तर्पयामि’ लगाया जाता है, जैसे- ‘ॐ एें ह्रीं क्लीं चामुंडायै विच्चे तर्पयामि’। इसी प्रकार तर्पण का दसवां भाग मार्जन होता है। इसमें मंत्र के अंत में ‘मार्जयामि’ या ‘अभिसिंचयामि नमः’ लगाया जाता है, जैसे - ‘ॐ एें ह्रीं क्लीं चामुंडायै विच्चे अभिसिंचयामि नमः’। मार्जन का दसवां भाग ब्राह्मण-भोजन कराया जाता है। -क्रमशः