Tuesday, February 18, 2020 06:58 PM

पूर्वजों की तृप्ति के लिए होता है पितृयज्ञ

पितृयज्ञ : यह यज्ञ पूर्वजों की तृप्ति के निमित्त किया जाता है। इसमें पितरों का तर्पण, श्राद्ध एवं उनके निमित्त अन्न आदि का दान किया जाता है। संतति और ऐश्वर्य प्राप्ति पितरों की कृपा से ही प्राप्त हो पाती है।

भूतयज्ञ : इसमें त्याग एवं स्वार्थ रहित भावना से पशु, पक्षी तथा चींटी आदि को उनके उपयुक्त भोजन देने का विधान है।

मनुष्ययज्ञ : किसी भूखे मनुष्य को भोजन कराकर उसकी क्षुधा शांत करना इस यज्ञ का प्रमुख उद्देश्य है। इससे प्रेम की भावना का उदय, सामाजिक जीवन की सत्यता एवं कर्त्तव्य-पालन के प्रति निष्ठा जाग्रत होती है...

-गतांक से आगे...

ये पंच महायज्ञ इस प्रकार हैं :

देवयज्ञ : इस यज्ञ में देवताओं के निमित्त हवन किया जाता है। इसके नित्य अनुष्ठान से देवभक्ति और दैवभाग्य की अनुकूलता प्राप्त होती है।

पितृयज्ञ : यह यज्ञ पूर्वजों की तृप्ति के निमित्त किया जाता है। इसमें पितरों का तर्पण, श्राद्ध एवं उनके निमित्त अन्न आदि का दान किया जाता है। संतति और

ऐश्वर्य प्राप्ति पितरों की कृपा से ही प्राप्त हो पाती है।

भूतयज्ञ : इसमें त्याग एवं स्वार्थ रहित भावना से पशु, पक्षी तथा चींटी आदि को उनके उपयुक्त भोजन देने का विधान है।

मनुष्ययज्ञ : किसी भूखे मनुष्य को भोजन कराकर उसकी क्षुधा शांत करना इस यज्ञ का प्रमुख उद्देश्य है। इससे प्रेम की भावना का उदय, सामाजिक जीवन की सत्यता एवं कर्त्तव्य-पालन के प्रति निष्ठा जाग्रत होती है।

ब्रह्मयज्ञ : यह यज्ञ वेद आदि गं्रथों के स्वाध्याय, तप, अध्यापन तथा प्रवचनादि से संपन्न होता है। प्रतिदिन अपने पावन धर्म-ग्रंथों का स्वाध्याय करने से मन की पवित्रता, हृदय की उदारता, देवी-देवताओं का अनुग्रह, शारीरिक लावण्य एवं बल, चेहरे पर तेज तथा द्रव्य और यश की प्राप्ति होती है। प्रायः देखा जाता है कि व्यक्ति सिद्धि प्राप्ति के निमित्त तंत्र-मंत्र की साधना करते हैं, किंतु नित्यकर्मों के प्रति आसक्ति नहीं रखते। महर्षियों का कथन है कि जो नित्यकर्म करता है, वही नैमित्तिक कर्म करने का अधिकारी होता है और जो नैमित्तिक कर्म करता है, वह काम्य कर्मों का अधिकारी है। यह बात प्रत्येक तंत्र साधक को स्मरण रखनी चाहिए। रुद्रयामल तंत्र भी इसी बात के आदेश करता है। सूर्योदय से पूर्व उठना, शौच-स्नानादि से पवित्र होना, संध्या करना, गायत्री मंत्र को जपना तथा तर्पण, देव-पूजन और स्तोत्र-पाठादि तंत्र के आवश्यक अंगों का अनुष्ठान करना नित्यकर्म से ही संबंधित हैं। संध्या का महत्त्व तो बहुत अधिक है क्योंकि संध्याहीन कर्मों को देवता ग्रहण नहीं करते। हमारे पूर्व ऋषि-महर्षियों ने जो तंत्र-सिद्धियां प्राप्त की थीं, उनके मूल में उनका दीर्घकाल तक संध्योपासना करना ही शास्त्रों में वर्णित है। इसलिए साधकों को अपनी परंपरा के अनुसार प्रतिदिन संध्या अवश्य करनी चाहिए। पंचमहाभौतिक शरीर का शुद्धिकरण मात्र ही संध्या का उद्देश्य नहीं है। वस्तुतः यह मानव-शरीर के अन्नमय, प्राणमय एवं वासनामय आदि सभी कोशों को शुद्ध करके मोक्ष प्राप्ति का प्रमुख साधना बनता है।