Wednesday, August 21, 2019 03:36 AM

पोस्टिंग से भ्रष्टाचार तक

कानून के शिकंजे में एक डीएसपी की छवि का मलाल पूरे पुलिस महकमे को होगा, लेकिन उन भुजाओं का ़फख भी कबूल हो जो खुद वर्दी पहनकर अपने ही गिरेबान में झांकने निकलीं और दुनिया हैरत में आ गई कि मात्र पच्चास हजार में नीयत खराब हो सकती है। जवाली के डीएसपी का जिक्र पहले भी होता रहा और उसके कड़क व्यक्तित्व की पहचान के साक्ष्यों में खबरें उछलीं, लेकिन अब मनहूस इरादों की चोरी पकड़ी तो आम आदमी का गुस्सा बेजुबान नहीं रहेगा। हमें इसे इस दृष्टि से भी देखना होगा कि हमारे आसपास नियुक्तियों व अवसरों की सिफारिशी बंदरबांट ने हमें क्या दिया। सरकार के मोटे ओहदों से किसकी रिश्तेदारी अमल में आती है और क्यों काल अवधि से पहले ऐसे लोगों को क्यों चलता किया जाता है। क्या पुलिस महकमे के जो अधिकारी बैरक या मुख्यालयों में बैठाए जाते हैं, वे अपनी क्षमता हार चुके होते हैं या केवल राजनीतिक पसंद से प्रदेश चल रहा है। यकीनन सत्ता के आम कार्यकर्ता की पहुंच में इतना दम है कि किसी भी अधिकारी की एसीआर बिगाड़ दे या स्थानांतरण के माध्यम से पोस्टिंग को तिहाड़ जेल बना दे। हमारे आसपास ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं कि जनता की नजरों में श्रेष्ठ पाए अधिकारी, सत्ता की दुकानदारी में हार गए या जनप्रतिनिधियों को यह कबूल नहीं कि सरकारी कार्यसंस्कृति का कड़क ढांचा उनकी अवहेलना करे। इसलिए कानून के पहलुओं में जब कभी जनता की संवेदना का उबाल आया तो कानून-व्यवस्था के बंद दरवाजे खुले, वरना हमारी पुलिस तो बाइक चालकों के सिर पर हेल्मेट पहनाने लायक फैसला भी नहीं ले पा रही है। उदाहरण के लिए कांगड़ा में पुलिस का एक दौर आज भी याद किया जाता है जब तत्कालीन जिला मुखिया संजीव गांधी ने कानून-व्यवस्था को आंखें और हर पुलिस जवान के हाथों में इतनी ताकत दी कि आम आदमी हर तरह की कार्रवाइयों का भागीदार बनने लगा। गांव तक के युवा या चौक-चौराहों पर बिकते नशे का खुमार उतरने लगा, तो बाइक सवार अपने सिर पर हेल्मेट को सवार करने लगे, लेकिन यह अधिकारी अब बटालियन दर बटालियन ‘गेंद’ बना दिया गया। जनता तुलनात्मक दृष्टि से देखे तो एक सामान्य ट्रैफिक सिपाही के दायित्व में कानून बोलता है या पटवारी का कौशल गूंजता है। प्रदेश के कई जिलाधीशों और जिला पुलिस प्रमुखों की बदौलत परिदृश्य में सृजनता तथा चौकसी का संचार देखा जा सकता है। ऊना के एसपी के पास भी सामान्य शक्तियां रही होंगी, लेकिन जज्बा जब रातों में विश्राम नहीं करता तो अवैध खनन माफिया की रातों की नींद हराम होती है। ऐसे में किसी की पोस्टिंग से ईमानदारी, तो किसी के आने से भ्रष्टाचार होता है। कानूनों में जिरह और पेचीदगियां इतनी अधिक हैं कि साहसिक अधिकारी खुद को जोखिम में डालकर जनता के कार्य करता है, जबकि कुछ ऐसे भी हैं जो अस्पष्टता के चक्रव्यूह में शिकार करते हैं। जवाली में जिस कानून के पेंच पर भ्रष्टाचार हुआ, उसके संदर्भों का भयावह परिदृश्य ऐसे तरीकों को जन्म देता है। कानून जिस तरीके व हद तक परिभाषित हो सकता है, उसके पीछे कोई न कोई व्यक्ति खड़ा होता है। इसी के परिप्रेक्ष्य में पुलिस की कार्रवाई किसी भी मुकाम को तसदीक कर सकती है या जब मामला न्यायिक प्रक्रिया से गुजरता है, तो कई पक्षों को जोड़ते हुए पीडि़तों को अविश्वास के गटर में दफन कर देता है। इसी भूल भुलैया का शिकार मीडिया भी हो रहा है। खोजी पत्रकारिता के दांत टूटने की नौबत में बिगड़ता आचरण और नैतिकता पर सवार व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा ने सही को सही और गलत को गलत कहने की कूबत छोड़ दी है। इसमें भी कानून की परिधि, परिपाटी और परिकल्पना में समाज की प्रतिक्रिया जिस तरह से होती है, उसमें मीडिया या तो प्रशंसा का फलक है या कानून की जिल्लत में फंसा एक ऐसा पक्ष जो अदालत में गलत के खिलाफ महज आरोपी है।