Tuesday, February 18, 2020 06:49 PM

पौंग में पक्षी समारोह

पौंग झील अपनी प्रवृति बदल रही है और प्रवासी महमानों की शिनाख्त में नेशनल वेटलैंड दिवस आने की खबर गूंज रही है। परिंदों की कहानी जैसा हो गया पौंग जलाशय और इसलिए इस सागर में भी एक किनारा तो मिलेगा। पहली बार नेशनल वेटलैंड डे के बहाने तमाम किनारों पर पौंग झील को मुस्कराने का सबब मिल रहा है। इस रौनक के बीच कुछ पाने का ऐसा अवसर जहां पर्यटन की नाव विस्थापन के घाव भर सकती है। इस समारोह की परिभाषा में प्रवासी पक्षी ही किरदार नहीं, बल्कि एक विभाग की कसरतों को बदलने की यात्रा भी है। वन विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव राम सुभग सिंह वास्तव में इस समारोह के निर्माता-निदेशक हैं, वरना प्रवासी पक्षियों का यहां आना तो अब एक रिवायत, एक दस्तूर है। यह समारोह सचिवालय की फाइलों से बाहर निकला है, तो इसके पीछे राम सुभग सिंह जैसे अधिकारी की कार्यशैली का अभिनंदन भी करना होगा। यह वही शख्स है जो इससे पहले पर्यटन की जिम्मेदारी में हिमाचल की आत्मनिर्भरता के सपने संजो रहा था और इन्वेस्टर मीट के मजमून में प्रदेश की छवि निखार रहा था। हिमाचल की विडंबना यह भी है कि प्रदेश की प्राथमिकताओं में सरकारी मशीनरी की स्वतंत्रता, निर्भीकता तथा निष्पक्षता घट रही है और तख्त ओ ताज के पहरे में सियासत किसी निरंतरता को स्वीकार नहीं करती। इसलिए सरकारी पद और पदक भी राजनीतिक शृंखलाओं में विभक्त हैं, वरना जो व्यक्ति प्रदेश पर्यटन की उड़ान में रज्जु मार्गों से हेलिकाप्टर सेवाओं के विस्तार का खाका बना रहा था, उसे यूं महरूम न होना पड़ता। बहरहाल पौंग बांध को पर्यटन से बांधने की पहली गंभीर कोशिश में नेशनल वेटलैंड दिवस समारोह एक साथ कई आशाएं उत्पन्न करता है। यह उस दौर में हो रहा है जब विस्थापितों को बांध के किनारों पर फसल उगाने से खदेड़ा जा रहा है या एक विधायक की केवल अपनी व्यापारिक गतिविधियों की रुचि ने झील के महत्त्व को कम कर दिया। जाहिर है पक्षी दिवस समारोह की ऊर्जा में क्षेत्रीय संभावनाओं को बल मिलेगा और इस तरह पर्यटन के एक बड़े डेस्टिनेशन के द्वार भी खुलेंगे। प्रवासी पक्षियों के कलरव के बीच उगते व ढलते सूरज के आगोश में रंग बदलते पौंग जलाशय का पानी, पर्यटन आकर्षण का नायाब चेहरा बनता है। प्रवासी पक्षियों की शुमारी में विज्ञान, रोमांच, साहित्य, संस्कृति और वक्त की झंकार को पेश किया जाए, तो विस्थापन में उदास घाटियों के बीच पानी की तरह ठहरा स्थानीय जीवन भी ठांठे मार सकता है। वेटलैंड डे का मकसद भले ही पर्यावरणीय व पक्षियों से जुड़े ज्ञान-विज्ञान का प्रसार व संरक्षण हैं, लेकिन इन आहटों में हिमाचल के पर्यटन का शृंगार भी छिपा है। मीलों सफर के बाद मंजिल जिस आशियाने में प्रवासी पक्षियों को शरण देती है, उस चमत्कार में पर्यटन का इजहार है तो इस शृंखला में कई टापू आबाद हो सकते। रैंसर टापू से साक्षात्कार करते या जलाशय की लहरों के बीचोंबीच उगती बाथू की लड़ी को निहारना केवल मनोरंजन भर नहीं, बल्कि उस सभ्यता को छूना भी है जो मानवीय इतिहास को विकास के नाम पर न्योछावर करती है। बेशक इस बार वन विभाग के नेतृत्व में पक्षियों के साथ हिमाचल के विविध अंदाज को अभिव्यक्त करने का अवसर मिल रहा है, लेकिन नगरोटा सूरियां व हरिपुर-गुलेर के केंद्र बिंदु में पौंग बांध को कुछ कहने का अवसर स्थायी रूप से देना होगा। यहां एक ऐसे संग्रहालय की जरूरत है, जहां पूरे क्षेत्र की सभ्यता के उच्चारण तसदीक हों तथा मानवीय इतिहास के पन्नों का संरक्षण करते हुए यह बताया जाए कि विकास के सच्चे मायनों में विस्थापन का अतीत कितना गहरा व संपन्न होता है। इसी तरह हरिपुर-गुलेर के धरोहर पर्यटन की विरासत को नए सिरे से लिखते हुए यहां एक कला केंद्र व पुस्तकालय भी बनाया जाए ताकि साल भर कला प्रेमी तथा शोधार्थी यहां आकर संस्कृति के विविध रंगों से रू-ब-रू हों और इस तरह लोक कलाओं को प्रोत्साहन मिले। बेशक वन विभाग ने किश्तियां उपलब्ध करा कर नौका विहार को नया आयाम दिया है, फिर भी शिकारों जैसी सुविधा उपलब्ध कराई जाए तो ईको टूरिज्म  की अनूठी पहल से हाई एंड पर्यटन का आगाज भी हो पाएगा। बहरहाल इस शुरुआत के लिए वन विभाग को साधुवाद। उम्मीद की जा सकती है कि इस तरह के आयोजन केवल आरंभिक प्रदर्शन तक ही सिमट कर नहीं रहेंगे, जैसे मसरूर मंदिर में एक समारोह की शुरुआत करके सारी रौनक न जाने कहां चली गई।