प्रत्याशी को जरूर परखें मतदाता

बचन सिंह घटवाल

लेखक, कांगड़ा से हैं

 

बुराइयों और अच्छाइयों की फेहरिस्त थामे हमारे बुजुर्ग ऐसे समय में संयम और दूरदृष्टि से अपने पारिवारिक सदस्यों  को सही निर्णय लेने की ताकीद देते हुए नजर आते हैं। फिर भी अपने वोट पर सिर्फ स्वयं का ही हक है, इस बात को भूलना नहीं चाहिए। टीवी, रेडियो और समाचार पत्रों के पन्ने रंग बदलने लगे हैं। विचारों, इश्तहारों का अजब-गजब खेल प्रारंभ होना किसी परिचय का मोहताज नहीं है। जन-जन तक लुभाती उम्मीदवारों की तस्वीर व वादे मोटे-मोटे अक्षरों से सुसज्जित लुभाने लगे हैं। आज हिमाचली राजनीति की रंगत बदलने लगी है, व्यक्ति उस निर्धारित दिवस पर टकटकी लगाए बैठा मताधिकार का प्रयोग करने के लिए उत्सुक है। मैं तो कहूंगा कि जरूर मतदाता को अपने मताधिकार का प्रयोग करना चाहिए...

लो भई चुनाव आ गए। वैसे तो चुनावी प्रक्रिया का लेखा-जोखा अर्थव्यवस्था पर करोड़ों का बोझ डाल जाता है, परंतु प्रजातांत्रिक प्रणाली में तरक्की का पहिया तो चयनित प्रतिनिधियों द्वारा बनी सरकार पर ही निर्भर करता है। अगर यूं कहें तो राष्ट्र निर्माण में जनप्रतिनिधियों का अमूल्य योगदान होता है जो देश में नवनिर्माण की परिभाषा को मूर्तरूप देते हैं, तो क्यों नहीं मतदाता प्रक्रिया का प्रयोग योग्य और सशक्त उम्मीदवार चुनने में हम सभी अहम भूमिका निभाएं।

वर्तमान में हिमाचली बयार कुछ ऐसी ही चल रही है, अन्य प्रदेशों में चरणबद्ध तरीके से हुए चुनाव के अंतिम चरण की भूमिका अदा करने में हमारा प्रदेश अग्रसर हो रहा है। चुनाव का जोर-शोर हर गली-मोहल्ले को उम्मीदवारों के बड़े-बड़े पोस्टरों व वादों का जामा पहनाए हुए अपने को उपयुक्त उम्मीदवार सिद्ध करते हुए चुनावी अखाड़े में उतरते दिख पड़ते हैं। उम्मीदवारों का सही मूल्यांकन जनता जनार्दन के अंतिम फैसलों पर निर्भर होता है, जो वोटर डे के दिन सिर्फ एक बटन दबाने भर से उनके भविष्य को तय कर जाता है। मतदाता वोट पूर्व कभी उम्मीदवारों के वादों को परखते तो कभी उनकी कर्मठता व जनसेवा की यशोगाथा को तर्क सहित हृदय में टटोलते। यूं कहें तो वोटर अपने ढंग से उम्मीदवार का मूल्यांकन करने में लगा रहता है। कोई देश की प्रगति को सही दिशा में बढ़ते कदमों को अपनी सोच का हिस्सा बनाता है, तो कोई व्यक्तिगत फायदों में हुए नफा-नुकसान के बल पर अपनी सोच का दायरा घुमाता है। इसमें शंका नहीं जो व्यक्ति के हित अनुरूप कार्यों संग सर्व विकास को अपना केंद्र बिंदु मानता है वही उम्मीदवार धीरे-धीरे वोटर के हृदय में सही जगह बना जाता है। दिल में उतरी हुई रूपरेखा मतदान दिवस पर मूर्तरूप में अमूक उम्मीदवार की जीत की गाथा लिख जाती है।

जनप्रतिनिधि लोकतंत्र में जनता का सच्चा सेवक होता है, जो जन समस्याओं का निराकरण बिना किसी द्वेष, लिंग भेद एवं जाति के करे। यूं तो हवा का रुख भांप कर काफी जन एक ही नैया पर सवार होकर तैरने का प्रयास करते हैं। मैं तो कहूंगा मताधिकार का प्रयोग हमें अपनी परख व समझ के अनुसार करना चाहिए। नैतिकता यही है कि हम लुभावने वादों की परख रखें और अपनी सोच-समझ का भरपूर प्रयोग करते हुए अपने मन वांछित प्रतिनिधि को जननायक के रूप में विजयी रथ पर लेकर आएं। यह प्रजातंत्र है, अधिकारों को कभी-कभी हम अपना निजी हथियार बना लेते हैं और कर्त्तव्यों की बात आने पर उससे कन्नी काटना भी हम खूब जानते हैं।  लोकतंत्र के पर्व में उमड़ा जनसैलाब एक-एक करके अपने मताधिकार से सही का चुनाव जरूर करता है। व्यक्तिगत विचारधारा पर कभी-कभी आम जनमानस की संयुक्त प्रतिक्रिया का भी असर, असरदायक सिद्ध हो सकता है। हिमाचली लोग अपने व्यवहार और सत्कार के लिए जाने जाते हैं। असरदार ढंग से फैसलों की कमान संभाले हमारे घर के मुखियों का फैसला जननायक से कम नहीं होता। फर्क इतना ही है वे परिवार को लेकर आगे बढ़ते हैं और जननायक जन-जन की समस्याओं को एकीकृत कर उसका निराकरण करते हैं। एक का पारिवारिक बंधन का रिश्ता है तो दूसरे का संपूर्ण समाज और जनता के बीच का बंधुत्व भरा रिश्ता।

परिपाटी स्वरूप हम परिवारों में किसी निर्णय के लिए घर के अनुभवी और उम्रदराज व्यक्तियों के तजुर्बों को लेकर आगे बढ़ते हैं और यह सही भी है। असमंजस की घड़ी में सही राह घर का बड़ा ही दिखाता है और उस पर हमारी आत्मनिर्भरता तर्कसंगत भी है। अगर यूं कहें जहां जनप्रतिनिधि के क्रियाकलापों और जनहित कार्यों की अनदेखी सरकार नहीं करती, वैसे ही परिवार में मुखिया सरकार जैसी भूमिका में जरूर नजर आता है। बुराइयों और अच्छाइयों की फेहरिस्त थामे हमारे बुजुर्ग ऐसे समय में संयम और दूरदृष्टि से अपने पारिवारिक सदस्यों  को सही निर्णय लेने की ताकीद देते हुए नजर आते हैं। फिर भी अपने वोट पर सिर्फ स्वयं का ही हक है, इस बात को भूलना नहीं चाहिए।

टीवी, रेडियो और समाचार पत्रों के पन्ने रंग बदलने लगे हैं। विचारों, इश्तहारों का अजब-गजब खेल प्रारंभ होना किसी परिचय का मोहताज नहीं है। जन-जन तक लुभाती उम्मीदवारों की तस्वीर व वादे मोटे-मोटे अक्षरों से सुसज्जित लुभाने लगे हैं। आज हिमाचली राजनीति की रंगत बदलने लगी है, व्यक्ति उस निर्धारित दिवस पर टकटकी लगाए बैठा मताधिकार का प्रयोग करने के लिए उत्सुक है। मैं तो कहूंगा कि जरूर मतदाता को अपने मताधिकार का प्रयोग करना चाहिए और इस पर्व में अपने योगदान के फलस्वरूप अच्छा उम्मीदवार चुनने के लिए अवश्य आगे आना चाहिए। बदले-बदले रंग ढंग और उत्सुकता की कशमकश का परिणाम सकारात्मक परिणामों तक पहुंच जाएगा। यही उत्सुकता हमें उस पड़ाव पर लाकर खड़ा कर देती है और यह कहना ही पड़ता है कि लो भई चुनाव आ गए।