Tuesday, November 19, 2019 02:57 AM

प्रदेश में फैलते सिंथेटिक ड्रग्स

सुनील वासुदेवा

लेखक, शिमला से हैं

प्रदेश के युवा वर्ग में ‘चिट्टे’ का प्रचलन बढ़ा है। पुलिस अब लगभग प्रतिदिन चिट्टे के सेवन करने वाले युवाओं को मादक पदार्थों के साथ हिरासत में ले रही है। प्रदेश में इस अवैध धंधे में रातों-रात अमीर बनने के चक्कर में भी कई युवा संलिप्त हो रहे हैं। कई लोगों ने इस अवैध कार्य की वजह से अकूत संपत्ति इकट्ठी की है, लेकिन प्रदेश पुलिस के हाथ उन तक नहीं पहुंच पाए हैं। कुछ लोगों को राजनीतिक संरक्षण भी है, जिस वजह से पुलिस उन पर हाथ नहीं डाल पाती है...

हिमाचल प्रदेश में युवा वर्ग में सिंथेटिक ड्रग्स का प्रचलन लगातार बढ़ रहा है। पहले यह माना जा रहा था कि प्रदेश के सीमावर्ती इलाकों में ही युवा मादक पदार्थ चरस व ‘चिट्टे’ के शिकार हो रहे हैं, परंतु अब चिट्टे व सिंथेटिक ड्रग्स का प्रचलन प्रदेश के छोटे-छोटे गांव तक तेजी से फैलता जा रहा है। वास्तव में ड्रग्स का जहर गंभीर रूप ले चुका है। प्रदेश के सीमावर्ती राज्यों की तरह हिमाचल प्रदेश को भी ‘उड़ता हिमाचल’ कहा जाने लगा है। प्रदेश में नशे के बढ़ते प्रभाव को लेकर सभी वर्ग चिंता में हैं। नशे की दलदल में फंस रहे बच्चों को लेकर अभिभावक चिंता में हैं। बच्चे सब के हैं। एक-दूसरे की देखा-देखी बच्चे नशे के जाल में फंस रहे हैं। पहले बच्चे शौक से मादक पदार्थों का सेवन करते हैं और धीरे-धीरे इसके आदी हो जाते हैं। इस समस्या से निपटने के लिए धरातल पर पुलिस प्रशासन व समाज को प्रभावी ढंग से कार्य करने की जरूरत है। पुलिस व जनता में आपसी तालमेल हो तभी ‘चिट्टे, चरस’ की सप्लाई पर रोक लग सकती है। प्रदेश के युवा वर्ग में ‘चिट्टे’ का प्रचलन बढ़ा है। पुलिस अब लगभग प्रतिदिन चिट्टे के सेवन करने वाले युवाओं को मादक पदार्थों के साथ हिरासत में ले रही है। प्रदेश में इस अवैध धंधे में रातों-रात अमीर बनने के चक्कर में भी कई युवा संलिप्त हो रहे हैं। कई लोगों ने इस अवैध कार्य की वजह से अकूत संपत्ति इकट्ठी की है, लेकिन प्रदेश पुलिस के हाथ उन तक नहीं पहुंच पाए हैं। कुछ लोगों को राजनीतिक संरक्षण भी है, जिस वजह से पुलिस उन पर हाथ नहीं डाल पाती।

प्रदेश में पुलिस युवाओं पर इस कारण कार्रवाई नहीं करती थी, क्योंकि युवाओं के भविष्य का प्रश्न सामने आ जाता था, इस कारण अकसर उन्हें चेतावनी देकर पुलिस छोड़ देती थी, लेकिन अब पुलिस ऐसे मामलों को गंभीरता के साथ ले रही है। प्रदेश में ‘चिट्टे’ की वजह से कई युवाओं की मौत भी हुई है, लेकिन इसका प्रचलन लगातार बढ़ता जा रहा है। प्रदेश के सभी जिलों में अब ‘सिंथेटिक ड्रग्स’ का प्रभाव देखने में आया है। ‘चिट्टे’ के अलावा चरस, अफीम, नशे की गोलियां व सिरप का प्रयोग भी काफी बढ़ गया है, लेकिन ड्रग्स की सप्लाई लाइन को तोड़ने में प्रदेश पुलिस अभी सफल नहीं हो पाई है। प्रदेश में युवा वर्ग में बढ़ रहे खासकर ‘चिट्टे’ के प्रयोग को लेकर सरकार व अन्य वर्ग चिंतन कर रहे हैं। शिक्षा संस्थानों में एनजीओ, पुलिस व न्यायपालिका द्वारा समय-समय पर प्रदेश के स्कूलों में जाकर इस सामाजिक बुराई के खिलाफ सचेत करने के लिए कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। कुछ स्कूल के छात्रों से बातचीत पर उन्होंने बताया कि स्कूलों में आयोजित इस प्रकार के जागरूकता कार्यक्रम को बच्चे गंभीरता से नहीं लेते व भाषणों से ‘बोर’ महसूस करते हैं। इस तरह के जागरूकता  कार्यक्रम प्रतिदिन उन पर थोपे जाते थे, जिस का कोई सार्थक परिणाम नहीं निकलता। हमारे देश में कानूनन यह माना जाता है कि प्रत्येक नागरिक को देश के कानून का ज्ञान है, जबकि वास्तव में ऐसा नहीं है। कानून की पर्याप्त जानकारी के अभाव में जाने-अनजाने व्यक्ति कानून की सीमाओं को लांघ जाता है, जिस वजह से उसे उसके परिणाम भुगतने पड़ जाते हैं। देश में मादक पदार्थों के प्रयोग को रोकने के लिए सख्त कानून बनाए गए हैं। मादक पदार्थों को अपने पास रखना व प्रयोग करना दोनों जुर्म है तथा ऐसे व्यक्ति को सख्त सजा हो सकती है, लेकिन कानून के इस प्रावधान की जानकारी के अभाव में युवा वर्ग नशे के चंगुल में आ रहा है। हिमाचल प्रदेश में फल रही बेरोजगारी की समस्या तथा जीवन मूल्यों की लगातार गिरावट पर सामाजिक संस्थाओं व प्रदेश सरकार को धरातल पर प्रभावी कदम उठाने होंगे।

नई पीढ़ी का मार्गदर्शन तभी हो सकता है, अगर समय रहते नशे के खिलाफ एक जन आंदोलन तैयार किया जाए। प्रदेश में पंचायत स्तर पर निगरानी समितियां पुलिस के साथ मिलकर बिना किसी दबाव के ड्रग्स माफिया पर नजर रख सके। प्रदेश के इस समय शिक्षामंत्री सुरेश भारद्वाज हैं, जिनके पास कानून विभाग का जिम्मा भी है तथा स्वयं अधिवक्ता रह चुके हैं। भारद्वाज कानून के जानकार भी हैं व स्कूलों के पाठ्यक्रम में मादक पदार्थों व अन्य महत्त्वपूर्ण कानून के प्रावधानों को शिक्षा से जोड़ कर इस दिशा में अहम भूमिका निभा सकते हैं। पाठ्यक्रम में कानून का मात्र एक चैप्टर शामिल करने से स्कूल स्तर पर ही बच्चों को इस सामाजिक बुराई के बारे में जानकारी हासिल हो सकती है। देश में महत्त्वपूर्ण कानून के प्रावधानों की जानकारी से बच्चों के सर्वांगीण विकास में सहयोग हो सकता है।