प्रधान सिस्टम का भुक्तभोगी बागबान

वीरेंद्र सिंह वर्मा

 लेखक, शिमला  से हैं

फसल की बिक्री मानव तंत्र पर निर्भर रहती है। फसल तैयार होने पर लेबर की कमी, सही समय और कीमत पर ढुलाई के लिए गाडि़यों का प्रबंधन, बरसात के दौरान भू-स्खलन से बंद सड़कें, अप्रत्याशित गाडि़यों की वृद्धि से उत्पन्न यातायात अव्यवस्था, बाहरी राज्यों में कर्फ्यू, आपातकाल और बाढ़ जैसे हालात के कारण फसल समय पर मंडी नहीं पहुंच पाती है...

सेब की बागबानी जितनी साधारण और आसान प्रतीत होती है, उतनी है नहीं। सेब बागबानी से आमदनी प्रकृति, जलवायु और मानव निर्मित सिस्टम के तंत्र पर निर्भर करती है। फसल तैयार होने तक प्रकृति का योगदान महत्त्वपूर्ण रहता है तथा फसल की बिक्री मानव तंत्र पर निर्भर रहती है। फसल तैयार होने पर लेबर की कमी, सही समय और कीमत पर ढुलाई के लिए गाडि़यों का प्रबंधन, बरसात के दौरान भू-स्खलन से बंद सड़कें, अप्रत्याशित गाडि़यों की वृद्धि से उत्पन्न यातायात अव्यवस्था, बाहरी राज्यों में कर्फ्यू, आपातकाल और बाढ़ जैसे हालात के कारण फसल समय पर मंडी नहीं पहुंच पाती है और बागबान को उपज का उचित दाम नहीं मिल पाता है। फसल के मंडी पहुंचने मात्र से ही बागबान की चिंताएं खत्म हो जाएं ऐसा नहीं है। स्टेट ऑफ  दि आर्ट मंडी और एक कुशल ट्रांजेक्शन सिस्टम नहीं होने से उपज का दाम वसूलने में बागबान को कई अनिश्चितताएं पेश आती हैं।

बाजार के उतार-चढ़ाव की फर्स्टहैंड जानकारी से आढ़ती अपने कमीशन और लदानी के मुनाफे  को सुनिश्चित कर फसल की बोली लगाते हैं। यदि बागबान और आढ़ती को सेब की फसल की डील के तराजू पर तोला जाए तो आढ़ती का पलड़ा हमेशा से ही भारी रहा है। बिचौलिए का काम कर आढ़ती प्रति वर्ष करोड़ों रुपए कमा रहे हैं और साल भर मेहनत कर सेब उगाने वाले बागबान प्रति वर्ष अपनी औसत आमदनी के इर्द-गिर्द ही कमा पाते हैं। लोडर्स के पास विदेशी सेब आयात करने के लिए एडवांस में पैसा रहता है किंतु बागबान को उसकी फसल की कीमत देने में वे लोग 15 से 20 दिन का समय लेते हैं। सेब की अनलोडिंग करने की एवज में बागबान से पैसे काटने का क्या औचित्य है? जब आढ़ती माल खरीदता है तो अनलोडिंग का खर्च भी उसी को वहन करना चाहिए। कुछ आढ़ती तो प्रति पेटी अनलोड करने का भाड़ा 50 रुपए तक बागबान से वसूल रहे थे।

पिछले वर्ष बागबानों के विभिन्न संघों के विरोध प्रदर्शन और दबाव के चलते सरकार कुछ हरकत में आई और आढ़तियों पर कुछ नकेल कसी गई। दिल्ली की आजादपुर मंडी में बागबानों से वसूले जाने वाले अनैतिक कमीशन का मुद्दा सरकारों की जानकारी में होने के बावजूद आढ़तियों के दबाव के चलते नहीं सुलझ पाया है। लदानी वजन के अनुसार सेब को आगे बेचते हैं, ऐसा होना भी चाहिए, परंतु बागबान से सेब पेटियों की संख्या के अनुसार खरीदा जाता है जो कि हैरानी की बात है। तय नियम के अनुसार एक स्टैंडर्ड पेटी में 20 किलोग्राम वजन से अधिक सेब नहीं होना चाहिए, लेकिन आढ़तियों के दबाव के चलते बागबान अभी भी परंपरागत 25 से 30 किलोग्राम की सेब की पेटियां बनाते हैं। बागबानों के हितों को ध्यान में रखते हुए अगले वर्ष तक उम्मीद की जा रही है कि शायद सरकार यूनिवर्सल कार्टन का प्रचलन करवा पाए। अब जब मंडी में फसल की बोली लगती है तो बागबान को बेचैनी रहती है उपज की कीमत मिलने की। नकदी का प्रचलन अब खत्म हो चुका है। आढ़ती चैक या आरटीजी एस के माध्यम से फसल का भुगतान करते हैं, जो सामान्यः कुछ दिनों बाद किया जाता हैं। इस ढुल-मुल ट्रांजक्ेशन सिस्टम में कुछ आढ़ती बागबान की पेमेंट करने में टालमटोल करते हैं और कुछ मामलों में आढ़तियों के चैक बाउंस होते हैं। ऐसे में बागबान अपनी साल भर की खून, पसीने की कमाई न मिलने से मानसिक रूप से प्रताडि़त होते हैं और कभी बैंक तो कभी अदालतों के चक्कर काटने को मजबूर होते हैं। इस उधेड़बुन में बागबान आढ़ती के रहमो-करम पर निर्भर रहते हैं कि शायद फलां समय बाद आढ़ती उसके पैसों की अदायगी कर दे।

समय पर पैसे न मिलने से बागबान का आर्थिक तंत्र बिगड़ जाता है। फसल से आमदनी वर्ष के इसी समय होती है, जिससे वह वर्ष भर का खर्च प्लान करता है। राशन रसद से लेकर, शादी, रस्में, दिहाड़ीदारों का बकाया, ग्रेडिंग पैकिंग मशीन का बकाया और बैंकों का बकाया सभी इसी आमदनी पर निर्भर करता है। अधिकांश बागबानों ने बैंकों से लोन ले रखे होते हैं। समय पर पैसा न मिलने से वे बैकों के डिफाल्टर बनने की कगार पर आ खड़े होते हैं। बागबान सोचता है कि कानूनी तरीके से या जोर जबरदस्ती करने से पैसे न मिलें या लंबे अरसे बाद मिलें, और इस तरह से वह आढ़ती के बहकावे में आ जाते हैं कि अगले वर्ष वह बकाया राशि का भुगतान कर देगा। इस समय स्थिति ऐसी है कि कई आढ़तियों के पास सैकड़ों बागबानों के कुछ हजार से लेकर 30 लाख रुपए तक बकाया हैं। इससे ज्यादा बागबानों के साथ और क्या अन्याय हो सकता है।

जिन मामलों में आढ़ती बागबानों का बकाया अदा कर देते हैं, उनमें भी केवल उतना ही बकाया चुकाया जाता है जितना पिछले वर्ष की फसल का मूल्य होता है। जितने समय बाद बकाया लौटाया जाता उस समय के दौरान की बागबान की परेशानी, ब्याज और पेनल्टी की बात नहीं की जाती है। बागबान की भी मजबूरी होती है कि उसका पैसा उसे मिल तो रहा है तो भागते चोर की लंगोटी ही सही। क्या यह न्यायसंगत नहीं होगा कि आढ़ती जितने समय बाद पैसों की अदायगी करेगा, उसे बागबान को उतने समय का फिक्स्ड डिपाजिट का ब्याज और मानसिक परेशानी झेलने के चलते पेनल्टी का भी भुगतान करें।

Related Stories: