Wednesday, July 17, 2019 12:25 AM

प्रपंच के आसमां में

भारत भूषण ‘शून्य’

स्वतंत्र लेखक

अपनी कमजोरियों को महान बताने का समय इस वक्त अपनी अठखेलियां कर रहा है। हमारे व्यक्तित्व में जो अनुपलब्ध है, उसे खुलकर अपना बताने को जतन कर रहा है। जो कुछ भी है हमारी झोली में मानो उसे गिराने का प्रयत्न कर रहा है। ईमानदार होने के प्रपंच आसमां तक उचालें भर रहे हैं। सत्ता के सत्कार में सब पंक्तियों में खड़े हैं। उत्तरदायित्व के निजी मायने ही नई परिभाषा गढ़ने के स्रोत हो गए। खुशी के विज्ञापनी पैमाने ही अब हमारे जोश हो गए। अपनों की विशेष जलालत के बाद हम उन्हें और अपना बनाने को कमर कसे हैं।

भीड़ के दलदल में मानो हमारे खोपड़ी तक धंसे हैं। सपनों को जगाकर नींद के लिए लोरियां सुना रहे। अपनों को उठाकर खुद कहीं और हैं जा रहे। तैरते से प्रश्नों में प्रशासन कुलझ गया। भक्तों के आह्लाद में मानो देवत्व उलझ गया। विद्यमान को दनादन गालियां दे रहे हैं, भविष्य को जैसे हथेली पर उकेर रहे हैं। विडंबनाओं के आगे सत्ता पानी भर रही। पानी-पानी जहां हमें होना था, वहां अहमन्यता अट्टहास कर रही। पैगंबर अब वो नहीं जो अंबर के सच को हम तक पहुंचा दे। आज वहीं दिगंबर है जो सत्ता के बिछौने बिछा सके। भूख की गलियों में वोटों के अंबार हैं। पेट भरे लोगों में भक्ति और शक्ति के अवतार हैं। सत्य की दिव्यता हरिश्चंद्र को थमाकर हम शकुनि मामा से हो गए। अस्तित्व के आगे सब अनकहे अफसाना से हो गए। हुंकार भी अब बेबस सी, सच भी अब लाचार सा। सत्ता ने सब छीन लिया, जो कभी सच में हमारा था।