Monday, September 24, 2018 09:28 PM

प्रभावशाली पड़ोसियों का रौब झेलता हिमाचल

प्रो. एनके सिंह

लेखक, एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया के पूर्व चेयरमैन हैं

हिमाचल में मसरूर टैंपल भी अंशत: नष्ट हो गया है और कोई यह नहीं जानता है कि यह क्या था। पूरा इतिहास भूतकाल के अवशेषों को सामने लाकर बनाया जा सकता है। ज्यादा शांतिपूर्ण समय में प्रभावशाली राज्य छोटे राज्यों की तुलना में आर्थिकी का ज्यादा हिस्सा वसूल करते हैं। सबसे बड़ा उदाहरण राज्य में पानी एकत्र करने वाले बांधों का निर्माण है। हिमाचल में दो बड़े बांध बनाए गए हैं तथा यह मुख्य रूप से पंजाब, हरियाणा व राजस्थान के लिए फायदेमंद साबित हो रहे हैं। यह बांध हिमाचल के भूभाग पर बने हैं तथा बदले में राज्य को पर्याप्त मुआवजा नहीं मिला है...

एक ऐसा पड़ोसी राज्य जो प्रभावशाली तथा संसाधनों की दृष्टि से ज्यादा बड़ा होता है, वह छोटे राज्य के सामाजिक व राजनीतिक जीवन को ‘स्वीप’ कर लेता है। हिमाचल भी ऐसे ही बड़े राज्यों पंजाब व हरियाणा से घिरा है तथा उसकी सीमाएं तिब्बत व चीन से भी लगती हैं। चूंकि ये राज्य अफगानिस्तान के लिए सीमांत राज्य हैं, ज्यादातर आक्रमणकारी इन्हीं कंदराओं से भारत में घुसे तथा इसे सामान्यत: खैबर व बन्नू इत्यादि पर्वतीय दर्रों के रूप में व्याख्यायित किया जाता है। भारत को छीनने तथा अस्त-व्यस्त करने के लिए बड़ी घुसपैठ उत्तर-पश्चिम के इन्हीं पर्वतों से हुई। चीन ने स्वतंत्रता के बाद नेहरू की दोस्ती से धोखा करते हुए हमला करने के अलावा इस देश में कोई बड़ी घुसपैठ नहीं की। इससे पहले चीन ने आध्यात्मिक आक्रमण किया, किंतु उसने शांतिपूर्ण ढंग से भारतीय साहित्य व दर्शन को एकत्र किया। जुआनजांग की वन मैन आर्मी ने नालंदा से विशालकाय बौद्धिक धर्मग्रंथों को एकत्र किया, इन्हें हाथियों पर लादा तथा वह इन्हें चीन ले गया। चीन की महान संपदा केवल इसके बुद्धिजीवी ही नहीं थे, बल्कि वे शासक भी थे जो विद्वता का सम्मान करते थे तथा ज्ञानवान लोगों को पुरस्कृत भी करते थे। चीन की संस्कृति भारत की तरह अमूल्य थी, लेकिन उत्तर-पश्चिम से हमलों के बाद मध्य एशिया व अरब सेना की नृशंसता व बर्बरता ने इसे नष्ट कर दिया। मुझे कई बार हैरानी होती है कि इस बर्बर शक्ति का आघात कितना तगड़ा था कि इसने संस्कृति, कला तथा वास्तुशिल्प में निहित भारतीय आत्मा को विरूपित कर दिया। इसे भारत के भूतकाल से भारतीयों के संपूर्ण विस्मरण से कल्पित किया जा सकता है।

देश यह तक भूल गया कि महात्मा बुद्ध का जन्म कहां हुआ था, नालंदा तड़प रहा था जो कि विज्ञान व तत्त्व मीमांसा का आधारभूत केंद्र था। यहां तक कि खजुराहो तथा स्तूप जैसे बड़े स्मारक धूल की गर्त में खो गए। हिमाचल में मसरूर टैंपल भी अंशत: नष्ट हो गया है और कोई यह नहीं जानता है कि यह क्या था। पूरा इतिहास भूतकाल के अवशेषों को सामने लाकर बनाया जा सकता है। ज्यादा शांतिपूर्ण समय में प्रभावशाली राज्य छोटे राज्यों की तुलना में आर्थिकी का ज्यादा हिस्सा वसूल करते हैं। सबसे बड़ा उदाहरण राज्य में पानी एकत्र करने वाले बांधों का निर्माण है। हिमाचल में दो बड़े बांध बनाए गए हैं तथा यह मुख्य रूप से पंजाब, हरियाणा व राजस्थान के लिए फायदेमंद साबित हो रहे हैं। यह बांध हिमाचल के भूभाग पर बने हैं तथा बदले में राज्य को पर्याप्त मुआवजा नहीं मिला है। अपने उचित हिस्से के लिए हिमाचल सरकार को सुप्रीम कोर्ट में केस तक लडऩा पड़ रहा है। अब लंबे समय के बाद कोर्ट ने एजी को कोई सौहार्दपूर्ण हल निकालने के निर्देश दिए हैं। पौंग डैम के निर्माण से ही करीब 300 गांव जलमग्न होकर नष्ट हो गए तथा यह सारी भूमि काफी उपजाऊ थी। इससे 20362 लोग विस्थापित हो गए। अगर हिमाचल का प्रभावशाली प्रतिनिधित्व रहा होता तो विस्थापितों के लिए पूरे मुआवजे तथा पुनर्वास के वैकल्पिक प्रबंधों के बिना किसी समझौते की गुंजाइश ही न रहती। लेकिन कुछ नहीं हुआ अथवा इस दबी सी हुई आवाज की किसी ने कोई परवाह नहीं की।

अब करीब 40 वर्षों के बाद फिर से देहरा के आजाद विधायक होशियार सिंह ने इन विस्थापितों के लिए आवाज उठाई है। अनुराग ठाकुर व शांता कुमार जैसे सांसदों ने भी इस आवाज के साथ अपनी आवाज मिलाई है। परंतु इसके बावजूद यह सवाल करने वाला कोई नहीं है कि अब तक इतनी कुर्बानियों के बावजूद यह मामला क्यों लटका हुआ है तथा 700 केस अभी भी न्यायालय में चल रहे हैं। वास्तव में हमारे दब्बू नेतृत्व के कारण अब तक यह मसला लटका रहा है तथा आज भी इतनी बड़ी संख्या में लोगों का अंसतोष बरकरार है। ये तीनों राज्य इतने बरसों से इस परियोजना से बड़े मजे से लाभ उठा रहे हैं तथा हिमाचल के हित उपेक्षित हैं, इसकी इन्हें बिल्कुल भी चिंता नहीं है। इस तरह के दयाहीन पड़ोसियों के कारण हिमाचल को काफी कुछ सहना पड़ा है तथा वह आज भी छोटे भाई के नाते आंहें भर रहा है। इससे भी ज्यादा दुखदायी बात यह है कि कला व संस्कृति के मामले में हिमाचल, पंजाब के आगे घुटने टेक रहा है। हिमाचल के पास कांगड़ा, चंबा तथा गुलेर कलम की अतुलनीय कला है, इसके बावजूद यह सोभा सिंह की सोहनी-महिवाल, जो पंजाब से संबद्ध कृति है, के आगे नतमस्तक होता है। हिमाचल ने अपने कलाकारों को कभी प्रोत्साहन नहीं दिया तथा विदेशों में इस कला को प्रोमोट नहीं किया गया। संगीत का मामला देखें, तो हिमाचल, विशेषकर सीमावर्ती ऊना, जिसे मिनी पंजाब के नाम से जाना जाता है, में पंजाबी गाने लोकप्रिय हो रहे हैं तथा वह भांगड़े पर नाचने लग जाता है। हिमाचल के अपने लोक गीत व लोक नृत्य हैं, फिर भी यहां पंजाब के गानों व नृत्य का प्रभुत्व देखा जा सकता है। हिमाचल की सरकार भी संस्कृति व सामाजिक जीवन के मामले में हमारे पंजाब के आगे समर्पण में योगदान कर रही है। इसने राज्य में शिक्षा के व्यापक अवसर उपलब्ध नहीं कराए तथा न ही मरीजों को चिकित्सा उपचार उपलब्ध करवाया तथा वह इन मामलों में पंजाब पर ही निर्भर रही। हकीकत में नौकरियां प्राप्त करने तथा शिक्षा ग्रहण करने के लिए हिमाचल से पड़ोसी राज्यों के लिए युवाओं का पलायन हुआ है। जब मैं हिमाचल आया था तो कई लोगों ने मुझसे सवाल किया था कि आप यहां क्यों आ रहे हैं जबकि आप की अपनी एक विश्वसनीयता है तथा बाहर कहीं कोई बड़ी नौैकरी पा सकते हैं।

मैंने उन्हें बताया था कि मैं यहां पैतृक घर के प्रति प्यार के कारण आ रहा हूं। वे मुझ पर हंसे थे तथा उन्होंने इस पर विश्वास नहीं किया था। उनका तर्क यह था कि जबकि मेरे पास विदेश में बसने की पेशकश है तथा दिल्ली में मेरी काफी संपत्ति है तो मुझे हिमाचल से क्यों प्यार करना चाहिए? मैं समझता हूं कि विदेशों में बसे सभी हिमाचलियों को राज्य के प्रति अपने कर्ज के रूप में इस छोटे राज्य से वफादारी रखनी चाहिए। मैं उनसे यह आग्रह भी करता हूं कि वे इस राज्य को एक बौद्धिक राजधानी के रूप में विकसित करें तथा यहां निवेश कर इसके आर्थिक विकास में भी अग्रणी भूमिका निभाएं।

ई-मेल : singhnk7@gmail.com