प्रवासी मजदूरों का दर्द, प्रो. एनके सिंह, अंतरराष्ट्रीय प्रबंधन सलाहकार

प्रो. एनके सिंह

अंतरराष्ट्रीय प्रबंधन सलाहकार

इन मजदूरों को कई तरह के अभावों और परेशानियों का सामना करना पड़ा, मानो विभाजन के दिन दोबारा आ गए हों। अब मजदूर अपने घरों में हैं, फिर भी वे घर-विहीन हैं। मैं यह नहीं जानता और हम में से कितने यह जानते हैं कि देश के लोगों की इतनी बड़ी संख्या अपने-अपने घरों में नहीं है, बल्कि दूसरें राज्यों में वे काम कर रहे थे। यह बात कितने लोग जानते हैं कि 20.58 करोड़ महिलाएं अंतरराज्यीय विवाह में ब्याही गई हैं अथवा उनके पति देश के भीतर अन्य राज्यों को चले जाते हैं। इस संख्या में वह संख्या शामिल नहीं है जो लोग देश से बाहर चले जाते हैं। मुझे यह नहीं पता कि क्या प्रधानमंत्री इस मानव दुश्वारी की भयवहता जानते हैं, लेकिन उन्होंने भी एक ओर कुआं तथा दूसरी ओर खाई के असमंजस का सामना किया। अपने संबोधन में उन्होंने इसकी ‘जान है तो जहान है’ के रूप में व्याख्या की…

देश के लोग जिन्हें प्रवासी कहते हैं, उन लाखों मजदूरों का दर्द लॉकडाउन के चलते उभर कर सामने आया है और यह उनके साथ त्रासदी की तरह ही है। प्रधानमंत्री ने जब लॉकडाउन की घोषणा की, उसके चार घंटे बाद ही 10 करोड़ मजदूर घर-विहीन और काम-विहीन हो गए। इसको लेकर वैसे कई तरह के अनुमान हैं। ये मजदूर अपने-अपने घरों को लौटना चाहते थे, किंतु आवागमन का कोई साधन नहीं था क्योंकि लॉकडाउन के कारण न तो बसें चल रही थीं और न ही रेल की आवाजाही हो रही थी। इसके चलते मजदूरों की आवाजाही पर पाबंदी सी लग गई। हालांकि सरकार और राज्य प्रशासनों ने इनकी मदद के लिए हरसंभव कोशिश की, लेकिन घर जाने जैसी कोई बात नहीं थी। इन मजदूरों को कई तरह के अभावों और परेशानियों का सामना करना पड़ा, मानो विभाजन के दिन दोबारा आ गए हों। अब मजदूर अपने घरों में हैं, फिर भी वे घर-विहीन हैं। मैं यह नहीं जानता और हम में से कितने यह जानते हैं कि देश के लोगों की इतनी बड़ी संख्या अपने-अपने घरों में नहीं है, बल्कि दूसरें राज्यों में वे काम कर रहे थे। यह बात कितने लोग जानते हैं कि 20.58 करोड़ महिलाएं अंतरराज्यीय विवाह में ब्याही गई हैं अथवा उनके पति देश के भीतर अन्य राज्यों को चले जाते हैं। इस संख्या में वह संख्या शामिल नहीं है जो लोग देश से बाहर चले जाते हैं। मुझे यह नहीं पता कि क्या प्रधानमंत्री इस मानव दुश्वारी की भयवहता जानते हैं, लेकिन उन्होंने भी एक ओर कुआं तथा दूसरी ओर खाई के असमंजस का सामना किया। अपने संबोधन में उन्होंने इसकी ‘जान है तो जहान है’ के रूप में व्याख्या की। हमें कोरोना के फैलाव से जनता को बचाना था। हड़बड़ी के कारण योजना का सही निर्माण नहीं हो पाया तथा हमने कोरोना से कई लोगों को बचा तो लिया, लेकिन मजदूरों की घर वापसी, वह भी बिना किसी परिवहन के साधन के, को रोका नहीं जा सका। पहले हमने सोचा कि सबसे बेहतर यह होगा कि मजदूर जहां हैं, वे वहीं रहें। लेकिन उन्हें अपने कार्यस्थलों पर कैसे रोका जा सकता था जबकि उनके पास कमाई का जरिया और आवश्यक सुविधाएं ही नहीं थीं।

इससे भी अधिक मानव का स्वभाव है कि वह विपदा के समय में परिवार की ओर दौड़ता है। यह एक भावनात्मक मसला था तथा कई मजदूरों ने अपने घरों तक पहुंचने के लिए पैदल ही मीलों सफर किया। सबसे दर्दनाक मामला यह है कि एक अल्पायु की बच्ची तेलंगाना से छत्तीसगढ़ को निकली, किंतु घर पहुंचने से कुछ किलोमीटर पहले ही उसकी मौत हो गई। रेल सेवाएं देरी से शुरू हुईं, किंतु इस महीने के तीसरे सप्ताह तक 32 लाख प्रवासी मजदूरों को रेल के जरिए उनके घरों तक पहुंचा दिया गया था। इस अभियान में विमानन भी जल्द जुड़ जाएगा तथा बसें भी चलने लगेंगी। आप करोड़ों लोगों को उनके घरों में कैसे कैद कर सकते हैं? अपना घर और आजादी की चाहत सभी को होती है। अब सवाल यह है कि जबकि मजदूर अपने घरों में पहुंचने लगे हैं, वहां उनके साथ कैसी बीतेगी? उनके लिए काम-धंधे कहां हैं? मैं महसूस करता हूं कि यह पूरी समस्या स्वयं को सांगठनिक विकास को समर्पित करती है। प्रवासी असंगठित मजदूर हैं तथा सरकारों के लिए यह करना बेहतर होगा कि वे सहकारी सभाएं अथवा एनजीओ बनाएं। सरकारी सहायता से यह होना चाहिए। इनका मिशन मजदूरों की आपूर्ति होना चाहिए तथा यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि मजदूरों को सभी वैधानिक देय उपलब्ध करवाए जाएं। अगर संगठन ठीक ढंग से काम करता है तो वे चिकित्सा व कल्याण के अन्य क्षेत्रों में भी उनकी मदद को विस्तृत कर सकते हैं। जब प्रणब मुखर्जी योजना आयोग के चेयरमैन थे तो मुझे एक कार्यबल का चेयरमैन नियुक्त किया गया था।

इसे स्व-प्रबंधन संस्थानों का अध्ययन कर रिपोर्ट देने के लिए कहा गया था। इस कार्यबल के तीन अन्य सदस्य भी थे। इनमें एक अमूल इंस्टीच्यूट के डा. अनेजा थे। एक अन्य आईएएस, सरकार के सचिव थे तथा तीसरे सदस्य योजना आयोग से थे। हमने अध्ययन किया तथा योजना आयोग को रिपोर्ट दी। रिपोर्ट का निष्कर्ष था कि जन संस्थानों को पर्याप्त सहयोग नहीं है तथा आजादी के बाद ‘गरीबी क्षेत्र’ को सरकार नियंत्रित कर रही थी। हमने लोगों द्वारा प्रबंधित संस्थानों की सिफारिश की। अपने निष्कर्ष के परिणामों की वैधता दर्शाने के लिए हमने टिगरी विकास संघ, एक एनजीओ की स्थापना दिल्ली के बड़े स्लम एरिया में की। सैकड़ों बच्चों को, जो आवश्यक दस्तावेजों के अभाव में सरकारी स्कूलों के लिए पंजीकृत नहीं थे, उन्हें शिक्षा दी गई। स्लम की सभी महिलाओं ने हस्तशिल्प के काम शुरू किए और वे कमाने लगीं। स्वच्छता का अभियान भी चलाया गया और बरसात में जहां पानी एकत्र हो जाता था, ऐसे स्थलों को सुधारा गया। सरकार का इंतजार किए बिना हमने काम शुरू किया तथा स्लम एरिया को सुधार दिया। दिल्ली सरकार ने मुझे लिखा कि मैं अन्य स्लम एरिया में सुधार के लिए भी काम करूं, किंतु मैंने यह कहकर इनकार कर दिया कि मेरा मॉडल प्रदर्शित करने के लिए था, मैं वहां बैठना और काम करना नहीं चाहता था। राष्ट्रीय सहकारी सभाएं बनाकर प्रवासी मजदूरों को संगठित करना तथा जरूरत के स्थानों पर उन्हें मजदूरी के लिए भेजना और साथ ही निकाय समन्वय करते रहें, यह संभव है। समाधान सांगठनिक विकास में है, सरकार द्वारा इसे लेने में नहीं है। वास्तव में मैं ‘लैस गवर्नमेंट तथा मोर गवर्नेंस’ का सशक्त प्रवक्ता हूं। मजदूरों को काम दिलाने के मामले में स्व-प्रबंधित दृष्टिकोण काम कर सकता है। विभागों को जिम्मेदारी सौंपने के बजाय केंद्र व राज्य सरकारों की सहायता से सहकारी सभाएं बनाकर मजदूरों को काम दिलाया जा सकता है। लोगों को अपनी मदद स्वयं करने में मदद हम क्यों नहीं कर सकते, बजाय इसके कि यह भूमिका सरकार के लिए छोड़ दी जाए।

ई-मेलः singhnk7@gmail.com

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