प्रवासी सहयोग का चमकीला अध्याय

डा. जयंतीलाल भंडारी

विख्यात अर्थशास्त्री

पिछले वर्ष 2018 में भारतीय प्रवासी भारत के विदेशी मुद्रा कोष को मजबूती देते हुए दिखाई दिए वहीं वर्ष 2019 में भी भारतीय प्रवासियों ने भारत के विदेशी मुद्रा कोष को रिकार्ड स्तर पर पहुंचाने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। 13 दिसंबर को भारत का विदेशी मुद्रा कोष 453 अरब डालर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया,  उसमें भारतीय प्रवासियों का अहम योगदान है...

इस समय जब भारत आर्थिक सुस्ती के चिंताजनक दौर से गुजर रहा है तब भारतीय प्रवासी भारतीय अर्थव्यवस्था को मुश्किल से बचाने के लिए विदेश में की गई उनकी कमाई से अपने देश में धन ‘रेमिटेंस’ भेजकर महत्त्वपूर्ण योगदान देते हुए दिखाई दे रहे हैं। स्थिति यह है कि जहां पिछले वर्ष 2018 में भारतीय प्रवासी भारत के विदेशी मुद्रा कोष को मजबूती देते हुए दिखाई दिए वहीं वर्ष 2019 में भी भारतीय प्रवासियों ने भारत के विदेशी मुद्रा कोष को रिकार्ड स्तर पर पहुंचाने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। 13 दिसंबर को भारत का विदेशी मुद्रा कोष 453 अरब डालर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया,  उसमें भारतीय प्रवासियों का अहम योगदान है। हाल ही में प्रकाशित संयुक्त राष्ट्र संघ ‘यूएनओ’ की संस्था इंटरनेशनल आर्गेनाइजेशन फॉर माइग्रेशन ‘आईओएम’ की रिपोर्ट 2019 के मुताबिक विदेश से अपने देश में धन भेजने के मामले में भारतीय प्रवासी एक बार फिर सबसे आगे रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक पिछले वर्ष 2018 में प्रवासी भारतीयों ने 79 अरब डालर रुपए की राशि स्वदेश भेजी है।

भारत के बाद चीन का नंबर आता है। चीन में प्रवासी चीनियों द्वारा 67 अरब डालर भेजे गए हैं। रिपोर्ट बताती है कि वर्ष 2010 से अब तक भारतीय प्रवासी रेमिटेंस भेजने में दुनिया में पहले क्रम पर बने हुए हैं। खासतौर से तीन वर्ष में विदेश से भारत को भेजे गए धन में महत्त्वपूर्ण वृद्धि हुई है। यह 2016 में 62.7 अरब डालर से बढ़कर 2017 में 65.3 अरब डालर हो गया तथा 2018 में 79 अरब डालर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है । यह बात महत्त्वपूर्ण है कि पिछले वर्ष 2018 में भारत में जितना प्रत्यक्ष विदेशी निवेश ‘एफडीआई’ आया, उसकी तुलना में भारतीय प्रवासियों से करीब दोगुना रेमिटेंस भारत आया।  गौरतलब है कि दुनियाभर के देशों में उनके प्रवासियों के द्वारा भेजा जाने वाला धन 2018 में 689 अरब डालर के स्तर पर पहुंच गया है। यह बात महत्त्वपूर्ण  है कि प्रवासियों के द्वारा भारत भेजी गई 40 फीसदी धनराशि ग्रामीण क्षेत्रों में भेजी गई है जिसका एक बड़ा हिस्सा स्वास्थ्य सेवा, बेहतर शिक्षा और जीवन स्तर बढ़ाने में खर्च किया गया है।

यह भी महत्त्वपूर्ण है कि पिछले वर्ष 2018 में जब भारतीय अर्थव्यवस्था प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करती रही। अमरीका और चीन के बीच बढ़ते तनाव तथा यूरोप में मंदी के कारण दुनिया के विभिन्न देशों में विकास दर कम रही और कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने से भी विभिन्न देशों की मुश्किलें बढ़ीं। निसंदेह वर्ष 2018 में आर्थिक मुश्किलों का सामना कर रहे भारत को प्रवासियों के द्वारा वर्ष 2017 की तुलना में करीब 14 अरब डालर अधिक भेजे जाने से भारतीय अर्थव्यवस्था में प्रवासियों से सहयोग का नया शुभ परिदृश्य उभरकर दिखाई दिया है। वर्ष 2018 में देश का राजकोषीय घाटा और वित्तीय घाटा बढ़ गया था। अब 2019 में भी वैश्विक मंदी से भारत की बढ़ती हुई आर्थिक चुनौतियों के बीच भारतीय प्रवासियों का लगातार सहयोग बढ़ने का परिदृश्य उभरकर दिखाई दे रहा है। इसमें कोई दोमत नहीं कि प्रवासी भारतीय भारत की महान पूंजी हैं। दुनिया के कोई 200 देशों में रह रहे करीब तीन करोड़ से अधिक प्रवासी भारतीय विभिन्न देशों में अपनी अहम भूमिका निभा रहे हैं। वहीं खाड़ी देशों में अकुशल और मामूली शिक्षित प्रवासी भारतीय कामगार विपरीत परिस्थितियों में भी काम करते हुए अपने पसीने से कमाई गई विदेशी मुद्रा को भारत भेज कर भारतीय अर्थव्यवस्था को गतिशील करने में प्रभावी भूमिका निभा रहे हैं।

इस समय एक ओर जब दुनिया के कोने-कोने में भारतवंशियों में देश के प्रति स्नेह भाव और आकर्षण बढ़ा है और वे अपनी कमाई का एक बड़ा भाग विदेशी मुद्रा में भारत भेज रहे हैं तब दूसरी ओर भारत के द्वारा भी प्रवासी भारतीयों की समस्याओं पर अधिक ध्यान देना होगा। वस्तुतः दुनिया के सारे प्रवासी भारतीय बहुत धनी नहीं हैं। अधिकांश देशों में इनकी आर्थिक हालत बहुत अच्छी नहीं है। खासतौर से विभिन्न खाड़ी देशों में लाखों कुशल-अकुशल भारतीय श्रमिक इस बात से त्रस्त हैं कि वहां पर इन्हें न्यूनतम वेतन और जीवन के लिए जरूरी उपयुक्त सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं। विश्व विख्यात एनजीओ कॉमन वेल्थ ह्यूमन राइट्स इनिशिएटिव ने खाड़ी देशों में कार्यरत भारतीय कामगारों की मुश्किलों और विपरीत परिस्थितियों में काम करने संबंधी जो रिपोर्ट प्रस्तुत की है, वह बेहद चिंताजनक है। कई विकसित देशों में प्रवासी भारतीयों के लिए वीजा कानूनों में कठोरता के कारण मुश्किलें बढ़ गई हैं।

यदि हम चाहते हैं कि प्रवासी भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने में अपनी सहभागिता बढ़ाएं, तो हमें भी प्रवासियों के प्रति सांस्कृतिक सहयोग और स्नेह बढ़ाना होगा। हमें प्रवासियों से  अधिक विदेशी मुद्रा अपेक्षाओं  के साथ-साथ उनकी विभिन्न समस्याओं के निराकरण में भी अहम भूमिका निभाना होगी। जिस तरह चीन प्रवासी चीनियों के हितों की रक्षा करता है, हमें उसी तरह भारत को भारतीय प्रवासियों के हितों की रक्षा के लिए आगे आना चाहिए। हमें प्रवासियों की मुश्किलों से संबंधित आर्थिक-सामाजिक मुद्दे मजबूती से उठाना चाहिए। विकसित देशों में  प्रवासियों की वीजा संबंधी मुश्किलों को कम करने में भी मदद करनी होगी। खासतौर से भारत को खाड़ी देशों से बातचीत कर कामगारों की बेहतरी के लिए तुरंत पहल करनी चाहिए। चूंकि विदेशों से आ रही कमाई का करीब आधा भाग केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु और आंध्रप्रदेश प्रवासियों से संबंधित है और इन प्रदेशों में कामगारों की कुशलता और  कौशल प्रशिक्षण पर ध्यान दिया जाता है, वैसे ही देश के अन्य प्रदेश भी यदि कौशल प्रशिक्षण पर ध्यान देंगे तो कुशल कामगार तैयार होंगे, जो विदेशों में अधिक कमाई कर सकेंगे।

भारत के द्वारा विदेशों में रोजगार की प्रक्रियाओं के सरल व पारदर्शी बनाने पर जोर दिया जाना होगा ताकि भारतीय कामगारों को बेईमान बिचौलियों और शोषक रोजगारदाताओं से बचाया जा सके। प्रवासियों की बेहतरी की हरसंभव कोशिश की जानी होगी। हम आशा करें कि आने वाले समय में भारत को विकसित देश बनाने में प्रवासियों की भूमिका महत्त्वपूर्ण होगी। जिस तरह प्रवासी चीनियों ने दुनिया के कोने-कोने से कमाई हुई अपनी विदेशी मुद्रा चीन में लगाकर चीन की तकदीर हमेशा के लिए बदल डाली उसी प्रकार से भारत की तकदीर बदलने में प्रवासी भारतीयों के द्वारा और अधिक कारगर सहयोग अपेक्षित किया जा रहा है।

हम आशा करें कि प्रवासी भारतीय दुनिया के कोने-कोने में अपना परचम फहराते हुए विदेशों से डालर, यूरो और अन्य बहुमूल्य विदेशी मुद्राओं का ढेर स्वदेश भेजकर जहां एक ओर भारत को बढ़ती हुई विदेशी पूंजी की जरूरत के लिए मदद करेंगे, वहीं दूसरी ओर प्रवासी भारतीय अपने ज्ञान व कौशल के सहयोग से भारतीय अर्थव्यवस्था और भारतीय समाज को चमकाते हुए भी दिखाई देंगे।   

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