Monday, July 22, 2019 12:36 AM

प्रशासनिक ट्रिब्यूनल को अलविदा

एक बार फिर प्रशासनिक ट्रिब्यूनल का अस्तित्व मिटा कर सरकार ने कर्मचारी मामलों का दबाव अदालत को सौंप दिया। हालांकि प्रशासनिक ट्रिब्यूनल के पक्ष और विरोध में एक जैसे सुर रहे हैं, फिर भी यह दूसरा अवसर है जब भाजपा सरकार ने इस संस्थान के औचित्य को शून्य करते हुए कर्मचारी मसलों को अदालती प्रक्रिया से सीधे बांध दिया। हिमाचल मंत्रिमंडल के इस फैसले के कई आयाम व निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं, लेकिन एक सत्य यह भी है कि प्रशासनिक ट्रिब्यूनल अपनी अहमियत, स्वायत्तता तथा स्वतंत्रता को पूरी तरह साबित नहीं कर पाया और इसका इस्तेमाल केवल राजनीतिक नियुक्तियों की तरह होता रहा। दूसरी ओर सैकड़ों कर्मचारी मामले अब सीधे अदालती बोझ बढ़ाएंगे और एक तरह से राहत के त्वरित उत्तर पाने के मोहताज हो सकते हैं। प्रशासनिक न्याय की कसौटी पर ट्रिब्यूनल की असफलताओं को भी समझना होगा ताकि आगामी पद्धति में कर्मचारी मामले केवल पेंच की तरह अदालतों में न फंसे  रहें। हिमाचल में  कर्मचारी मसलों का अपना खासा रिकार्ड है और इसलिए ट्रिब्यूनल की प्रणाली में जहां ये लंबित रहे, वहीं अब इनका अदालती निर्धारण खासी मशक्कत कराएगा। ऐसे में कर्मचारी अदालतें या अलग से निपटारे के लिए न्यायिक व्यवस्था का गठन करना होगा। यह भी देखा गया है कि कर्मचारियों से संबंधित तरह-तरह के कानून और तौर तरीके अपना कर प्रदेश सरकारों ने जो विसंगतियां पैदा कर दीं, उनकी संतुति की व्याख्या केवल कानूनी लड़ाई बनकर ही दर्ज होती है। कई तरह की वित्तीय  अनियमितताओं और कॉडर विसंगतियों के अलावा स्थानांतरण के खिलाफ अगर युद्धक माहौल है, तो हिमाचल के कर्मचारी  या तो राजनीतिक शागिर्द बन जाते हैं या कानूनी लड़ाई के मोहरे। बहरहाल मंत्रिमंडल ने कर्मचारी एहसास के नए दीप जलाते हुए जलरक्षकों को अनुबंध आधार पर चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी बना दिया  है। सरकारी नौकरी के तोहफे फिर मंत्रिमंडलीय फैसलों  की श्रृंखला बनाते हुए दिखाई देते हैं, लेकिन स्थानांतरण नीति का फार्मूला फिलहाल अपने ड्राफ्ट की विवशताओं में जाहिर है। कर्मचारी हितों की देखभाल अगर सरकार अपनी प्राथमिकता बनाए, तो हर तरह के सुधार की गुंजाइश बढ़ जाती है। सरकार से कर्मचारियों की वाजिब शिकायतों का जखीरा अगर दुरुस्त नहीं किया गया, तो  इनकी काफी तादाद हमेशा अदालत में रहेगी। कानूनी मामलों की लंबी फेहरिस्त का एक असर तो सरकार के सार्वजनिक प्रदर्शन पर पड़ता है और  प्रायः देखा गया है कि शिक्षा व चिकित्सा  क्षेत्र में  ऐसी खींचतान से कार्य संस्कृति पर सीधा असर जनता की  ही  परेशानियां बढ़ाता है। हिमाचल सरकार ने पांच विभागों के तालमेल से रोड सेफ्टी सैल का गठन करके सार्वजनिक आलोचना से बचाव करते हुए  भविष्य का मार्ग प्रशस्त किया है। सड़क सुरक्षा  के नए मायने किस तरह ईजाद होते हैं, यह काफी हद तक संबंधित विभागों के तालमेल पर निर्भर करेगा। इसी के साथ हालिया फैसलों से रुकी ओवरलोडिंग ने सार्वजनिक परिवहन से जो छीना है, उसकी भरपाई भी आवश्यक है। जनता की मांग के अनुरूप परिवहन सेवाओं को सुनिश्चित करने के प्रश्न पर अहम फैसले आने अभी बाकी हैं। पुनः परिवहन नगर की दिशा में बढ़ते हुए सरकार ने सकारात्मक उद्देश्य निर्धारित किया है, लेकिन इसकी व्यापकता में कम से कम आधा दर्जन ऐसे ट्रांसपोर्ट नगर बसा कर सड़कों पर फैल रही वाहन कार्यशालाएं तथा पार्किंग हटाई जा सकती है। परिवहन की दृष्टि से शहरी ट्रांसपोर्ट नेटवर्क को सशक्त करना होगा तो ग्रामीण स्तर तक सार्वजनिक परिवहन को नए अर्थों में काबिल बनाने की जरूरत है। हिमाचल में बस ठहराव की उचित व्यवस्था, चौराहों का विस्तार तथा ट्रैफिक लाइट्स के इस्तेमाल के लिए दिशा-निर्देश तथा पुलिस पैट्रोलिंग को बढ़ावा देकर ही सड़क सुरक्षा को तसदीक किया जाएगा।