Sunday, November 17, 2019 03:26 PM

फारूक-महबूबा ही कश्मीर नहीं

फारूक अब्दुल्ला अपने ही घर में नजरबंद हैं। उनकी पार्टी नेशनल कांफ्रेस (एनसी) के कुछ नेताओं ने उनसे मुलाकात की। अनुच्छेद 370 हटाने और नजरबंदी के बाद यह पहली मुलाकात थी। एनसी नेताओं ने अपने दूसरे नेता उमर अब्दुल्ला से मुलाकात कर उनका हालचाल भी जानना चाहा। सियासी गुफ्तगू से हम वाकिफ  नहीं हैं, क्योंकि इसे सार्वजनिक करने से इंकार किया गया है। एक और प्रमुख पार्टी पीडीपी का प्रतिनिधिमंडल अपनी नेता महबूबा मुफ्ती से नहीं मिल पाया। महबूबा की यह रणनीति थी, लिहाजा उन्होंने मुलाकात से इंकार कर दिया अथवा स्थानीय प्रशासन ने किसी अंदेशे के तहत इस मुलाकात की मंज़ूरी वापस ले ली! बहरहाल जम्मू-कश्मीर के ये तीनों पूर्व मुख्यमंत्री नजरबंद हैं, लेकिन किसी यातना-गृह में नहीं हैं। तीनों ही ऐयाशी सुविधाओं के संग हिरासत में हैं। फर्क  यह है कि वे सरेआम सड़क पर उतर कर भारत-विरोधी प्रचार नहीं कर पा रहे हैं, अनुच्छेद 370 को लेकर कश्मीर में अराजकता का माहौल पैदा नहीं कर पा रहे हैं, वे सियासत करने से भी मोहताज हो गए हैं और इसी महीने 24 तारीख को खंड विकास परिषद  (बीडीसी) के चुनाव घोषित हो चुके हैं। हालांकि दोनों पार्टियों ने चुनाव का बहिष्कार करने का फैसला लिया है। ऐसे में बीडीसी चुनाव प्रतीकात्मक ही होंगे। कश्मीर के सामान्य हालात से उनका कोई सरोकार नहीं होगा। वैसे भी हमारा मानना है कि भारत जैसे गणतांत्रिक देश में व्यक्तिगत और संवैधानिक आजादी को इस कदर कैद नहीं किया जाना चाहिए, लेकिन संविधान नजरबंदी और हिरासत की इजाजत भी देता है। यदि ऐसे प्रावधान न होते, तो अभी तक सर्वोच्च न्यायालय का आदेश आ गया होता कि कश्मीरी नेताओं को रिहा किया जाए! फारूक-महबूबा सरीखे 200 से कुछ ज्यादा नेताओं को नजरबंद या हिरासती तौर पर बंद रखा गया है, तो उसके मायने ये नहीं हैं कि पूरा कश्मीर ही कैदखाना बना दिया गया है। कोई भी नेता अपने आप में कश्मीर नहीं हो सकता, यह स्थापित मान्यता होनी चाहिए। अनुच्छेद 370 समाप्त करने के बाद कश्मीर में जिन हालात की आशंकाएं थीं, उनके मद्देनजर एहतियातन नजरबंदियां की गईं। दरअसल इन नेताओं की नजरबंदी इसलिए भी की गई, क्योंकि ये पाकिस्तान की आवाज बोलते रहे हैं। तिरंगा उठाने वाले हाथ नहीं मिलेंगे, ऐसी धमकियां देते रहे हैं। 370 और 35-ए को हाथ लगाया, तो यह बारूद जलाकर भस्म कर देगा। वे पत्थरबाजों को अपने ‘लड़के’ मानते रहे हैं और स्कूल, पुलिस थाने फुंकते देखते रहे हैं। ये लड़के सुरक्षा बलों पर पत्थर फेंकते रहे हैं और वाहनों को भी फूंकते रहे हैं। उन लड़कों की फौज को मोबाइल के जरिए ही लामबंद किया जाता था, लिहाजा ये पार्टियां आज मोबाइल और इंटरनेट का रोना रो रही हैं। बेशक ये कश्मीरी अवाम के भी नेता रहे हैं, लिहाजा मुख्यमंत्री का पद भी हासिल किया, लेकिन वे ही कश्मीर नहीं हैं। जरूरी नहीं है कि 370 पर अवाम की सोच और प्रतिक्रिया वही हो, जो इन तीनों नेताओं की है। बेशक कश्मीर के हालात सामान्य नहीं कहे जा सकते। जिन पंचों-सरपंचों ने बीडीसी चुनाव में हिस्सा लेना है, वे भयभीत हैं और मौत के साये उन पर मंडरा रहे हैं। उनमें से अधिकतर कश्मीर के होटलों में टिके हैं। अपने गांवों में जाने की हिम्मत उनमें नहीं है। प्रत्येक पंच का 2-2 लाख रुपए का बीमा कराया गया है। यदि हालात सामान्य होते, तो हमारे पंचायत प्रतिनिधि इस कदर डरे हुए न होते! फिर भी बहुत कुछ बेहतर हो रहा है। अस्पतालों की ओपीडी में जो मरीज जाते हैं या जिनके आपरेशन किए गए हैं, उनकी सूची तैयार कर सर्वोच्च न्यायालय को भेजी जाती रही है और अदालत ने संतोष व्यक्त किया है। सरकार का दावा है कि 22 जिलों के पुलिस स्टेशनों से पाबंदियां हटा ली गई हैं। सरकार की 85 योजनाओं को लागू कर दिया गया है। जो सिर पर मैला ढोने को अभिशप्त थे, उन्हें मुक्ति मिली है। सफाई कर्मियों की एसोसिएशन बनने लगी हैं। आरक्षण की व्यवस्था भी लागू की गई है। और सबसे ताजातरीन सरकारी फैसला यह है कि इसी 10 अक्तूबर से सैलानी एक बार फिर ‘जन्नत’ के नजारे देखने जा सकेंगे। कुछ जगह मोबाइल बंद हैं और अभी इंटरनेट सेवा बहाल नहीं की गई है। देश जानता है कि उनके जरिए साजिशों का संचार कैसे और किस स्तर पर होता है! प्रशासन ने यह भी घोषणा की है कि धीरे-धीरे नजरबंदी खत्म कर नेताओं को रिहा करने की शुरुआत भी होगी। समीक्षा के बाद यह सिलसिला कुछ आगे भी बढ़ा है, लेकिन फारूक-महबूबा मौलिक अधिकारों की बात करने से पहले सोचा करें कि वे कितने ‘भारतीय’ हैं?