Monday, July 22, 2019 12:59 PM

फिर खुखरी से घायल शिक्षा

खुखरी ने फिर एक कालेज की दीवारों को घायल किया और इस तरह प्रदेश के प्रतिष्ठित हमीरपुर कालेज ने अपने माहौल को विद्रूप कर लिया। शिक्षा के नए सत्र का स्वागत छात्रों को गुटीय संघर्ष के बारूद पर करना पड़े, तो यह समूची शिक्षा का चीरहरण है। लगातार हमीरपुर कालेज लाल दिखाई दे रहा है, तो छात्र सियासत की आहट को समझना होगा और यह इसलिए भी कि इस बार प्रत्यक्ष छात्र संघ चुनाव की संभावना देखी जा रही है। हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के कुलपति ऐसा संकेत दे चुके हैं, लेकिन इसके लिए परिसर की शांति प्रमुख अनिवार्यता रहेगी। प्रदेश के करीब एक सौ पैंतीस कालेजों व विश्वविद्यालय के छात्र चुनाव अगर हमीरपुर कालेज के अंजाम सरीखे ही होने हैं, तो यह सारी कसरत कहीं छात्र समुदाय को लहूलुहान न कर दे। छात्र राजनीति की पृष्ठभूमि में राज्य की सियासत अपना वर्चस्व ढूंढती है और इसीलिए अतीत के मनहूस लम्हे डराते हैं। हमीरपुर गवाह है कि वहां हाथों में खुखरी आ गई, तो किताब कौन पढ़ेगा। अगर छात्रों के संबोधन धुर विरोधी सियासत में तबदील होंगे, तो शिक्षा की गुणवत्ता का ढोल कौन पीटेगा। शिक्षा परिसर की बेचैनी सियासत हो जाए, तो करियर की प्रतिस्पर्धा में उतरने के लिए माहौल, अध्ययन और अध्यापन का क्या होगा। इसलिए यह कहने से कोई फर्क नहीं पड़ता कि इस बार छात्रों के गुट हमीरपुर कालेज परिसर के बाहर भिड़े, बल्कि लगातार भिड़ंत के मायने सदाबहार हैं। छात्रों को गुट बनाती सियासत ने पहले भी शिक्षण संस्थानों की गलियां बदनाम की हैं और अब अगर यही दस्तूर रहा तो हमीरपुर की चिंगारियां पूरे मंजर को स्वाह करेंगी। आश्चर्य यह कि शिक्षा का स्तर इतना गौण व लापरवाह हो चला है कि युवा ऊर्जा पाठ्यक्रम के बाहर अपना जलवा दिखाना चाह रही है। इसका एक कारण तो राजनीति में छात्र सियासत के रिश्तों की घनिष्टता तथा दूसरे राजनीतिक आदर्शों की पृष्ठभूमि का कालेज परिसरों से नजदीकी माना जा सकता है। शिक्षा में मात्रात्मक उपलब्धियों का राजनीतिक उपयोग भी वर्तमान निराशा का जनक माना जाना चाहिए। नैक की रैंकिंग में असफल होते शिक्षा के सफर को हमीरपुर कालेज के बाहर देखें या छात्रों के घायल हुए वजूद को ही स्वीकार कर लें। जो भी हो जिस कालेज की उपलब्धियों पर कभी नाज होता था, उसका सूचनापट्ट गलत बयानी कर रहा है। राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में हिमाचल की उच्च शिक्षा का स्तर न तो किसी महाविद्यालय या न विश्वविद्यालय में मुकर्रर हो रहा है, तो इस तरह की विस्फोटक सोच को शिक्षा की गुणवत्ता से कैसे बांधेंगे। यहां केवल छात्र नहीं भिड़ रहे, बल्कि शिक्षा के प्रति अलगाव का यह खूंखार नमूना है जो गुणवत्ता लाने से मुकर रहा है। कहीं तो हमीरपुर जैसे कालेज के प्रांगण में खेल प्रतिभाओं के परिश्रम का पसीना बहता हुआ नजर आता था और कहीं आज छात्रों के माथे पर भविष्य पढ़ने से पहले खून बहता हुआ नजर आ रहा है। यह मात्र एक खूनी झगड़ा नहीं और न ही छात्र राजनीति का तांडव, बल्कि शिक्षा के चौराहे पर भटक रही युवा पीढ़ी की निराशा है। क्या हमीरपुर की घटना छात्र संघ चुनावों को आमंत्रित कर रही है या ऐसी अनुशासनहीनता की वजह को समझते हुए परिसर को मौन बनाए रखने की चुनौती बढ़ जाती है। शिक्षा के नए सत्र के स्वागत में लाल गुलाल के बजाय खून की लाली अगर प्रमाणित हो रही है, तो इस अभिप्राय को खामोश करना होगा। हमीरपुर के न तो सभी छात्रों की रुचि ऐसे मोड़ पर खड़ी है और न ही भविष्य मांज रहे बच्चों की राहें इतनी विकृत हैं। केवल एक तबका या युवा आचरण का एक लघु आकार, खूनी सियासत में खुद को देख रहा है। यह दुर्भाग्यपूर्ण तथा अभिभावकों के विश्वास पर चोट पहुंचाती घटना है, जिस पर तुरंत अंकुश लगना चाहिए। समय रहते प्रदेश की उच्च शिक्षा के आदर्श व प्रतिस्पर्धा के रंग तय करने चाहिए और यह आसान कार्य नहीं। हमीरपुर जैसे बड़े कालेज परिसर की शांति के लिए शिक्षा में गुणवत्ता के उद्देश्य ऊंचे करने पड़ेंगे। प्रदेश के कालेजों की समीक्षा, युवा सफलता का सेहरा पहने तो यह प्रदेश आगे बढ़ेगा। वरना यह संघर्ष कुछ नेता पैदा कर सकता है, नायक नहीं। विश्वविद्यालय के कुलपति यह विचार करें कि हिमाचल में युवा कैसे अपने नायकत्व की छाप छोड़ सकते हैं और इसके लिए परिसर की मर्यादा कैसे तय होगी।