Monday, June 01, 2020 01:52 AM

फीस की पनाह में पगार

कोरोना ने केवल हालात नहीं बदले, बल्कि हल निकालने की क्षमता को भी चौराहों पर खड़ा कर दिया है। हर प्रश्न के कितने ही पहलू और इसलिए हर जवाब के अर्थ पर मतैक्य नहीं होगा। हर तरफ बड़े और बड़ों के लिए प्रश्न हैं, लेकिन भविष्य की रेंगती तस्वीर में शिक्षा का प्रांगण उदास खड़ा है। ऐसे में निजी स्कूलों के लिए अब अस्तित्व का प्रश्न सामाजिक व नैतिक बहस तक पहुंच गया है। सवाल शिक्षा के सामने निजी स्कूल की मिलकीयत तक पहुंच रहा है, तो खर्चा उठाने की जिरह में शिक्षक की पगार अब छात्र की फीस से पनाह मांग रही है। यह कोहराम सरकारी स्कूलों में शिक्षक के औचित्य को लेकर शायद इतना बेरहम न हो, लेकिन निजी स्कूलों की दीवारें चीख रही हैं। औचित्य की तलाशी में शिक्षा का ऋणी तो कोई नहीं, लेकिन शिक्षा की प्रासंगिकता में छात्रों की फीस अदायगी की महत्त्वपूर्ण भूमिका दिखाई दे रही है। करीब पंद्रह सौ निजी स्कूलों के लिए कोरोना का दुष्प्रभाव, उनके प्रबंधकीय संतुलन को बिगाड़ रहा है। हिमाचल के शिक्षा मंत्री के पास पैनडेमिक एक्ट तथा आपदा प्रबंधन के कानूनी अधिकार हैं, जो निजी स्कूलों की फीस को उड़ा सकते हैं। यही वजह है कि कर्फ्यू की स्थिति में निजी स्कूलों की सांस अटक गई है और अगर हिमाचल सरकार कोई बीच का रास्ता नहीं चुनती है, तो फीस बनाम शिक्षा का द्वंद्व भविष्य के लिए संकट पैदा करेगा। ऐसे में निजी स्कूलों के संचालकों या हिमाचल मान्यता प्राप्त पब्लिक स्कूल एसोसिएशन के साथ सरकार का सार्थक संवाद लाजिमी है। अंततः निजी स्कूल केवल फीस के निर्धारण व अभिभावकों की तरफदारी में यह कैसे भूल जाएं कि यह क्षेत्र करीब सत्तर हजार शिक्षकों की रोजी रोटी का मुख्य स्रोत भी है। इस दौरान सबसे पहले शिक्षा की गति व छात्र की प्रगति को बरकरार बनाए रखने की चुनौती है, जबकि दूसरी ओर यह भी सोचना होगा कि निजी स्कूलों की अमानत में रोजगार भी पलता है। सरकारी संस्थाओं के मुकाबले निजी क्षेत्र की परिपाटी में हर औचित्य की कीमत है तथा इसका चयन एक कड़ी की प्रतिस्पर्धा के बीच होता है। हिमाचल में एक सर्वेक्षण के तहत प्री प्राइमरी कक्षाओं में भी सत्तर फीसदी अभिभावक अपने बच्चों के लिए निजी स्कूलों को प्राथमिकता देते हैं, जबकि आंगनबाडि़यों में मात्र 9 प्रतिशत तथा सरकारी स्कूलों में लगभग 19 फीसदी बच्चे पहुंचते हैं। कमोबेश यही आंकड़ा पूरी स्कूली शिक्षा के कवच में निजी स्कूलों की अहमियत बढ़ा रहा है। बेशक सरकार व अभिभावक यह चाहते होंगे कि निजी स्कूल इस दौरान फीस ढांचा सुधार लें या वार्षिक तौर पर इस साल मनमानी न हो, लेकिन यह असंभव है कि कोरोना संकट में निजी क्षेत्र केवल नैतिकता का जाप करके जीवित रहे। निजी स्कूलों के लिए यह शैक्षणिक सत्र कई तरह के दबाव लेकर आया है और सबसे बड़ी चुनौती छात्रों के बीच अध्ययन की ऊर्जा बरकरार रखने की है। जाहिर है ऑनलाइन शिक्षा की वैकल्पिक व्यवस्था में राज्य के नए संकल्प तैयार हो रहे हैं, लेकिन इसे मुकम्मल करने की व्यवस्था अभी पूर्ण नहीं। बहरहाल शिक्षा के पैमानों का संघर्ष घर से स्कूल तक जारी है, तो इसके बीच भविष्य को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कौन जानता है कि कब स्कूल खुलेंगे और छात्र समुदाय के लिए भविष्य की तैयारियों को खुला आकाश मिलेगा। कौन जानता है कि मुसीबत की इस घड़ी में निजी क्षेत्र की आफत किस कद्र तबाही मचाएगी। यह शिक्षा की निरंतरता में शिक्षक की भूमिका का भी सवाल है और अगर आगामी चरणों में स्कूल, शिक्षक व छात्रों के रिश्तों में नजदीकी नहीं रहेगी, तो इसके दुष्प्रभाव देखे जाएंगे। हिमाचल में स्कूलों से दूर बैठी शिक्षा पर अभिभावकों की चिंता व अनुभव से एक बड़े अनिश्चय की दिशा में सारी व्यवस्था दिखाई देती है। ऐसे में अभिभावकों की सहमति के बिना निजी स्कूलों पर खतरा बढ़ता जाएगा।