Tuesday, March 31, 2020 12:34 PM

बंदरों के सामने संयम

निर्मल असो

स्वतंत्र लेखक

संयम की भारतीय परंपरा का बीड़ा उठाए बंदर का कर्ज हमारी पीढि़यों पर सदैव रहा है, बल्कि यह आधुनिक समाज की अनिवार्यता है कि हमारे आसपास आवारा प्रजातियां रहें। खुद पर भरोसा रखकर सोचें कि आखिर आपके भीतर बचे खुचे संयम का स्रोत व इसका वारिस बंदर के अलावा कौन-कौन हो सकता है। संयम की पहली पंसद बंदर इसलिए क्योंकि वर्षों से इसकी खुराफात का सामना कर रहे बागबान-किसान आज तक खामोश हैं, बल्कि उनकी खामोशी की वजह से देश को संयम का एहसास होने लगा है। संयम अंततः वक्त की चादर पर इनसान के ऐसे निशान छोड़ जाता है, जिन्हें हम सभ्यता, शिष्टाचार या मानव जीवन की सबसे बड़ी कोशिश मान लेते हैं। संयम के कलाकार ही वास्तव में परंपराओं को हम तक लाए हैं और यही एक सेतु है, जो कल को शायद जोड़े रखेगा। अब देखिए अपने भारत में अच्छे दिनों को लेकर हर नागरिक का संयम कोरोना तक को मात देने के लिए तत्पर है। तमाम ज्योतिषियों को भरोसा है कि हम उन पर भरोसा रखें, तो यह खौफ खुद-ब-खुद निर्जीव को जाएगा। दरअसल किसी भी संजीव को निर्जीव अवस्था तक पहुंचाने का भारतीय विश्वास ही संयम की विधा पर टिका है। संयम से रहेंगे तो न आपको अपने होने का अफसोस होगा और न ही दूसरे के होने का आभास। अपने पड़ोसी हमेशा हमारे जीवन को नर्क बनाने पर भले ही आमादा रहें, लेकिन संयम है कि टूटता नहीं। अब भारत की आजादी के बाद के सफर को ही ले लो, हर सांस का संयम परवान चढ़ता है। हम एक ही सांस में अपने नेताओं के वही पुराने रटे रटाए वाक्य सुनकर भी परेशान नहीं हंै, क्योंकि इसी तरह न जाने कितने सालोें को अपने संयम से पार करना है। हम राहुल गांधी को देखकर भले ही असामान्य नहीं हो सकते और न ही अमित शाह को सुनकर सामान्य रह सकते, लेकिन दोनों ही परिस्थितियों में हमारा संयम उसी तरह बरकरार है जिस तरह बंदरों के उत्पात के बावजूद यह नहीं टूटता।  आजाद भारत के कई परवाने भले ही किसी दंगे में जल जाएं, हम संयम में रहेंगे। भले ही ज्योतिरादित्य कांग्रेस को छोड़ भाजपा में विलीन हो जाएं, हम संयम नहीं छोड़ सकते। अगर संयम छोड़ दें तो ज्योतिरादित्य सिंधिया ने मोदी जी को क्या कहा था या अब भाजपा के पक्ष में उनकी जुबान का शहद क्यों बह रहा है, हमारी बकअत को हमेशा तराजू में रखता। संयम में रहेंगे, तो हमें अपने नेताओें की धूल धूसरित काबिलीयत पर भी सदियों भरोसा रहेगा। संयम के कारण हम सरकारों को हमेशा स्वीकार करेंगे, भले ही उनके हर कार्य से हमारी अपनी क्षमता का क्षरण होता रहे। हमें आजादी ने संयम सिखाया है और कमोबेश हर सरकार ने इसी सिद्धांत पर चलना सिखाया है। अब देश में रहने के लिए संयम की जरूरत पैदा हो गई है। अपने होनहार बच्चे की काबिलीयत को किसी आरक्षण या सियासी सिफारिश के सामने हारते देखकर संयमित रहें, क्योंकि सामने देश तरक्की कर रहा है। भले ही बार-बार जहरीले अनुभवों के बावजूद आपका संयम नहीं टूटा, लेकिन यही संयम किसी दिन अचानक उस वक्त जरूर पारिश्रमिक मांगेगा, जब सामने अपनी ही आत्मा की हत्या पर मातम मनाने की पाबंदी होगी। तब तक शायद यह देश पूरी तरह बंदरों के हवाले हो चुका होगा।