बच्चों को रुचि के अनुसार करियर चुनने को प्रोत्साहित करें

मेरा भविष्य मेरे साथ 25

करियर काउंसिंलिंग/कर्नल (रि) मनीष धीमान

कहते हैं कि गोल्फ  कोर्स की दोस्ती का कोई सानी नहीं है। सेना में सीनियर और जूनियर के बीच में चाहे लाख अच्छे संबंध हों,पर उसे दोस्ती नहीं कह सकते। मुझे याद है कि गोल्फ  में मेरे एक पार्टनर थे, जो काफी सीनियर अधिकारी थे। परेड के दौरान उनसे बात करते वक्त हर तरह के प्रोटोकॉल का ध्यान रखना पड़ता था, पर हर शाम साथ खेलने से हमारी ऐसी दोस्ती हो गई, जैसे दो हम उम्र सहपाठियों में हो जाती है। पहचान बढ़ने से एक-दूसरे के बारे में जानने का मौका मिला। उनके बारे में जानने से पता चला कि वह राष्ट्रीय स्तर के बास्केटबॉल के खिलाड़ी हैं। हमारे देश में उनके समय में खेल को करियर के रूप में बहुत कम चुना जाता था तथा पढ़ाई के अलावा दूसरे किसी भी क्षेत्र में करियर बनाना बड़ा ही मुश्किल था। इसलिए अच्छी खेल प्रतिभा होने के बावजूद वह सेना में शामिल हो गए। उनका मानना था कि हमारे देश में अब हर विषय में ,चाहे वह खेल, संगीत, एक्टिंग, लिखना हो या कोई भी और किसी भी तरह के क्षेत्र में बच्चों के रुचि अनुसार करियर बनाने के बहुत ही अच्छे मौके मिलते हैं। उनका कहना था कि जिन लोगों की अवधारणा यह है कि सिर्फ  पढ़ाई से ही हम जिंदगी में अच्छा कर सकते हैं और एक सम्मानजनक जीवन व्यतीत कर सकते हैं, उन लोगों को इस विचारधारा को बदल कर, बच्चों को उनकी रुचि के मुताबिक करियर चुनने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। उनके दो बच्चे थे, एक लड़का जो 13 वर्ष की उम्र का क्रिकेट की कोचिंग ले रहा था तथा एक बच्ची, जो 10 वर्ष की थी, जो ‘आर्चरी’,(तीरंदाजी) की कोचिंग ले रही थी। मेरे पूछने पर कि खेल-कूद सब ठीक है, पर फिर भी अगर इस क्षेत्र में सफल नहीं हो पाए, तो दूसरे करियर के लिए बुनियादी शिक्षा या पढ़ाई का क्या होगा, तो उन्होंने बताया कि आजकल बहुत सारे ऐसे इंस्टीच्यूट हैं, जो बच्चों को उनकी रुचि के मुताबिक ट्रेनिंग देते हैं तथा उसके साथ- साथ पढ़ाई भी करवाते हैं। इससे 20 साल की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते बच्चा अगर अपने रुचि मुताबिक कोई मुकाम हासिल नहीं कर पाता, तो उसने साथ-साथ जो पढ़ाई की है, उसके आधार पर जीवन यापन करने के लिए कोई व्यवसाय या नौकरी पा सकता है। मैं उनकी बातों से काफी प्रभावित हुआ और समय के साथ हमारे संबंध और भी प्रगाढ़ होते गए और हम में पारिवारिक मित्र की तरह रिश्ता बन गया। कुछ वर्ष बाद हमारी पोस्टिंग अलग-अलग जगह हो गई और समय के साथ बातचीत  भी खास मौकों तक सीमित रह गई। एक दिन टीवी पर मैंने खबर सुनी कि विदेश में चल रही जूनियर अंतरराष्ट्रीय तीरंदाजी प्रतियोगिता में भारत की लड़की ने देश का नाम रोशन किया। वह एक फौजी परिवार से संबंध रखती है। उसके पिता सेना में अधिकारी हैं। उसके पिता और उस लड़की का नाम सुनकर और उसको टेलीविजन पर बात करते देख मुझे अत्यंत प्रसन्नता हुई और मैंने तभी उनको फोन किया। यह उन्हीं अधिकारी की बेटी थी, जो 10 साल की उम्र से तीरंदाजी की तैयारी कर रही थी। आज वह एक नेशनल आइकॉन बन चुकी थी। मात्र 17 साल की उम्र में उसने इतना सम्मान और इज्जत पा लिया था। जितना पाने के लिए लोगों की सारी उम्र लग जाती है। उसके पिता से बात करने पर उन्होंने बताया कि मनीष मैं कहता था न कि बच्चों को उनके रुचि के मुताबिक करियर चुनने देने की स्वतंत्रता से वह जिंदगी में अच्छा तो करते ही हैं पर उसके साथ-साथ पूरे घर, परिवार का नाम भी रोशन कर देते हैं। उनके बेटे के बारे में बात करने से पता चला कि क्रिकेट में कम्पीटीशन बहुत ज्यादा है। उनका बेटा अच्छा खेल रहा है पर भारतीय टीम में अभी तक सिलेक्ट नहीं हुआ है। उन्होंने बताया कि वह रणजी और आईपीएल खेलता है तथा जितना नाम और शोहरत मैंने सारी उम्र में कमाई है, उससे ज्यादा कमा चुका है। उनसे बात करने के बाद मैंने फिर बाकी लोगों के बारे में और उनके करियर के बारे में जब आकलन किया तो पाया कि बहुत सारे बच्चे आजकल अपनी रुचि के मुताबिक काम कर रहे हैं और नाम कमा रहे हैं। जिन बच्चों ने लीक से हटकर अपनी रुचि के मुताबिक काम किया और उनके मां-बाप ने उनको प्रोत्साहित किया। आज भारत ही नहीं, पूरे विश्व में अपने काबिलीयत का डंका बजवा चुके हैं। दुनिया में बहुत सारे लोग हैं, जिन्होंने छोटी उम्र में बड़ा काम एवं नाम किया है। मेरा मानना है कि हमें बच्चों को उनकी रुचि के मुताबिक आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए और उचित मौका देना चाहिए।