Monday, November 18, 2019 04:48 AM

बजटीय शायरी, राहत की तुकबंदी

दो अक्सों के बीच नया समझौता और मोदी सरकार के आंगन में फूल उगाने का बजट हाजिरी लगा रहा है। फरवरी, 2019 की बजटीय महक ने सरकार की वापसी सुनिश्चित की तो जुलाई आते-आते सरकार से जनता की महत्त्वाकांक्षा का उत्तर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के प्रस्तावों में ढूंढा जाएगा। यह तो मानना पड़ेगा कि बजट प्रस्तुतिकरण की गुत्थियों में कई प्रश्न पूरी तरह अनुत्तरित दिखाई देते हैं। खुशियों की बहार देने के लिए अभिभाषण का मजमून भले ही शायरी पर उतर आया, लेकिन वित्तीय लेखा-जोखा खुद का समर्थन नहीं कर रहा, इसलिए कुछ ऐसे क्षेत्र हैं, जहां भविष्य की हरियाली के बीच मृगतृष्ण होते मंजर को महसूस किया जाएगा। कृषि और ग्रामीण क्षेत्रों के सपने बजट जरूर अंगीकार कर रहा है, लेकिन किसान असंतोष के बीच प्रयास कहीं कम जाहिर हुए। ग्रामीण कनेक्टिविटी व सिंचाई के क्षेत्र में शुभसंकेत देने के बावजूद कृषि आर्थिकी के समर्थन में ढांचागत सुधार की कमी महसूस की जाती है। बजट अपनी आशाओं की धूप के नीचे वित्तीय घाटे को कम करने का प्रण लेता है, तो विनिवेश से धन जुटाता है। ब्याज दरों में कटौती के साथ-साथ श्रमिक कानूनों में सुधार के प्रति वचनबद्धता के इजहार से नए भारत का सपना बुना जा रहा है, तो सार्वजनिक बैंकिंग प्रणाली में सत्तर हजार करोड़ डालकर उद्यमशीलता को पुनः न्योता दिया जा रहा है, ताकि रुकी हुई उत्पादकता को सहज धन मिले। जल शक्ति अभियान पर सरकार की प्राथमिकताएं बजट को सबसे बड़ी शाबाशी दे सकती हैं। इसी तरह सार्वजनिक उपक्रमों की जमीन पर उगती बस्तियों में घर बसाने का वादा पूरा किया जा रहा है। वैसे होमलोन की अधिकतम सीमा के भीतर आयकर में साढ़े तीन लाख की छूट एक वर्ग को आगे बढ़ाती है, लेकिन मध्यम वर्ग की अभिलाषा में आयकर फिर अवरोधक की तरह तना रहा यानी बिना उदारता दिखाए मोहतरमा वित्त मंत्री गुजर गईं। बेशक तीन करोड़ छोटे व्यापारियों को पेंशन योजना से जोड़ना एक नई पेशकश है, लेकिन नोटबंदी और जीएसटी से छायी मंदी को जो इंतजार था- नहीं मिला। जीएसटी के बहाने इस बजट से बाजार की उम्मीदें और उपभोक्ताओं की राहें अगर आसान होतीं, तो एक इंतजार समाप्त होता। यह इसलिए भी क्योंकि बजट की मुखरता में पेट्रोल व डीजल की कीमतों में जो उछाल आने वाला है, उसका सीधा असर हर घर तक दिखाई देगा। बेशक वित्त मंत्री की शायरी में राहत की तुकबंदी भी हुई है और इस तरह ग्रामीण पेयजल, श्रमिकों के लिए कुछ और न्यायालय, रेल बजट को उद्घाटित करते संकल्प और राष्ट्रीय खेल शिक्षा बोर्ड जैसे प्रकल्प सामने आते हैं। बजट में हिमाचल की खुशियों का जिक्र करते हुए मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने प्रदेश के आबंटन में 6.3 प्रतिशत वृद्धि का हवाला दिया है। केंद्रीय योजनाओं पर पर्वतीय राज्यों के लिए हालांकि अलग से कोई उल्लेख नहीं है, फिर भी निर्मला सीतारमण के बजट में जब जीरो बजट खेती की संभावना तराशी जा रही थी, तो यह सूचना एक तरह से हिमाचल को बधाई दे रही थी। हिमाचल पहले ही जीरो बजट खेती अपनाकर कुछ प्रगति कर चुका है और अगर केंद्रीय मदद बढ़ती है तो इस अभियान को चार चांद लगेंगे। प्राकृतिक खेती के पुरोधा सुभाष पालेकर और राज्यपाल आचार्य देवव्रत के सान्निध्य में हिमाचल का किसान अब अपनी परंपराओं की हरियाली से खेत को सराबोर कर रहा है। पूरे प्रदेश को आगामी तीन सालों में इस तरह की खेती में उतारने की तैयारियों में अग्रसर सरकार के लिए यह एक अच्छा प्रोग्राम है। इसी तरह क्षेत्रीय हवाई अड्डों की घोषणा में हिमाचल अपना नसीब देख सकता है। बजट के मार्फत आदर्श पर्यटन स्थलों की फेहरिस्त में अगर हिमाचल का भी कोई नाम आता है, तो यह बड़ी उपलब्धि होगी। नए भारत के बजट में पर्वतीय आशाओं का नेतृत्व कर रहे वित्त राज्य मंत्री अनुराग ठाकुर के प्रदर्शन की उम्मीद लगाए हिमाचल के हित में कितनी रेल और कितनी सड़कें आती हैं, यह देखना होगा। केंद्रीय बजट में अपना भविष्य देखने वाले हिमाचल की नई मंजिल क्या होगी, इसका विश्लेषण गहराई तक होगा, लेकिन पानी और गैस के राष्ट्रीय ग्रिड में भागीदारी बहुत कुछ कहती है। निवेश की राह पर महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य लेकर खडे़ हिमाचल के लिए यह बजट कितना परिणाममूलक होता है, इसकी एक व्याख्या देश में विदेशी निवेश को मिल रही राहत में कहीं न कहीं दर्ज है।