Monday, November 18, 2019 05:28 AM

बजट के आर्थिक पक्ष

विश्व की कुल अर्थव्यवस्था करीब 87 ट्रिलियन डालर की है। उसमें भारत का हिस्सा फिलहाल 2.7 ट्रिलियन डालर का है। इस साल के अंत तक हम तीन ट्रिलियन डालर तक पहुंच सकते हैं अथवा नहीं, यह एक पेचीदा सवाल है। यदि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के आंकड़ों का विश्लेषण करें, तो प्रति व्यक्ति आय को लेकर 187 देशों में भारत का स्थान 142वां है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने जो बजट दस्तावेज संसद में पेश किए हैं, उनमें प्रति व्यक्ति आय बढ़ने का कोई खुलासा नहीं है। देश में औसतन 9.8 फीसदी खपत कम हुई है। यदि खपत कम है, तो साफ है कि मांग नहीं है, क्योंकि औसतन आय भी बढ़ नहीं रही है, क्योंकि नौकरियों में बढ़ोतरी नहीं हुई है। ऐसा नहीं है कि पूरा दृश्य ही नकारात्मक है, लेकिन बजट पर आम आदमी और उसके आर्थिक पक्ष को लेकर हमारे कुछ सवाल हैं। अंतरिम बजट की तरह पांच लाख रुपए सालाना आय तक आयकर मुक्त है। दो करोड़ रुपए की आमदनी तक टैक्स स्लैब में कोई बदलाव नहीं है। दो से पांच करोड़ रुपए कमाने वालों पर 25 फीसदी सरचार्ज लगेगा, जो पहले 15 फीसदी था। पांच करोड़ रुपए से ज्यादा कमाने पर सरचार्ज 15 फीसदी से बढ़ाकर 37 फीसदी किया गया है। इसमें सेस भी जोड़ें, तो यह 42.74 फीसदी हो जाएगा। अब यह अमरीका से भी अधिक होगा। वहां कुल 40 फीसदी कर है। बजट में प्रावधान किया गया है कि 45 लाख रुपए तक के घर पर जो होम लोन लिया जाएगा, उसके ब्याज पर 3.5 लाख और ई-वाहन पर 1.5 लाख रुपए की छूट दी जाएगी। बेशक सरकार ने छूट में बढ़ोतरी की है। प्रदूषण कम करने के मद्देनजर ई-वाहन एक लाभदायक प्रयोग साबित हो सकता है, लेकिन मकान खरीदने के संदर्भ में यथार्थ यह है कि एक तरफ होम लोन लें और उसे बिल्डर को सौंप दें, लेकिन दिल्ली-एनसीआर में हजारों अधबने फ्लैट खाली देखे जा सकते हैं। बिल्डर यथासमय फ्लैट नहीं देते। अदालतों में कई मामले लंबित हैं, बिल्डरों को गिरफ्तार भी किया गया है, लेकिन ‘घर’ का स्वप्न अधूरा है। बैंकों की ईएमआई तो भरनी पड़ेगी। घर के खर्च, ईएमआई और किराए का मकान भी... औसत नागरिक अपना गुजर-बसर कैसे करेगा? इस संदर्भ में तो ‘छत’ बेमानी लगती है। इस समस्या का कोई भी समाधान बजट में नहीं दिया गया है। इसके अलावा, सोना-चांदी पर कस्टम ड्यूटी 10 फीसदी से बढ़ाकर 12.5 फीसदी की गई है। इससे सोने पर तस्करी पहले की तरह बढ़ सकती है और व्यापारी वर्ग भी सरकार से नाराज हो सकता है। बेशक तीन करोड़ छोटे दुकानदारों को पेंशन देने का प्रावधान बजट में किया गया है, लेकिन पेंशन उनकी प्राथमिकता नहीं है। ज्यादातर छोटे दुकानदार, कारोबारी चाहते हैं कि जीएसटी की ग्रंथियां आसान की जाएं और स्थानीय अफसरों का ‘नकदी भ्रष्टाचार’ खत्म किया जाए। वह निरंतर भ्रष्टाचार प्रधानमंत्री मोदी के दावों को ठेंगा दिखा रहा है। कारपोरेट टैक्स लगभग पूर्ववत ही है। फर्क इतना है कि पहले 250 करोड़ के टर्नओवर वाली कंपनियों पर लगता था, अब 400 करोड़ टर्नओवर वाली कंपनियों पर लगेगा, लेकिन कारपोरेट टैक्स 25 फीसदी ही रहेगा। उसके दायरे में 99.3 फीसदी कंपनियां होंगी। शेष 0.7 फीसदी कंपनियां 40 फीसदी तक टैक्स देंगी। बुनियादी सवाल यह है कि हम पांच खरब डालर की अर्थव्यवस्था कैसे बनेंगे? क्या निवेश और सरकारी कंपनियों के विनिवेश पर ही उम्मीदें कायम हैं? कौशल विकास के जरिए एक करोड़ युवाओं को प्रशिक्षण देने का लक्ष्य है, लेकिन क्या इतने रोजगार सुनिश्चित किए जाएंगे? सरकार स्टार्टअप को लेकर बहुत गंभीर और उत्साहित है, लेकिन वे रातोंरात बंद भी हो रहे हैं और नौजवान हुनरमंद एकदम सड़क पर आ रहे हैं, उनकी मेहनत का पैसा भी नहीं मिल पाता। क्या सरकार के पास इसके समाधान की कोई योजना-नीति है? क्या इस बजट से मध्यवर्ग की उम्मीदें और आकांक्षाएं पूरी होंगी? उसका तो मोदी-भाजपा को आभारी होना चाहिए। बेशक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) 6 फीसदी बढ़ा है। हमारा विदेशी मुद्रा भंडार 427 अरब डालर से अधिक का है। शेयर बाजार, मीडिया, बीमा, उड्डयन क्षेत्रों में एफडीआई का अनुपात बढ़ाने की बात कही गई है। सवाल है कि विदेशी कंपनियों के आने से हमारा अपना कारोबार तो प्रभावित नहीं होगा? वित्त मंत्री को यह आश्वासन भी देश को देना चाहिए। कई घोषणाएं सकारात्मक भी हैं, लेकिन सवाल और उनके समाधान बेहद जरूरी हैं।