Monday, July 22, 2019 01:49 PM

बजट से गायब मुद्दे

देश ने जैसा लबालब जनादेश मोदी-भाजपा को दिया था, सरकार का बही-खाता भी वैसा ही होना चाहिए था। बजट को मोदी सरकार ने नया नाम और प्रारूप दिया है ः बही-खाता। लिहाजा उसका ऊपरी आवरण भी बदल गया है। पश्चिमी सभ्यता ने बजट दस्तावेजों के लिए जो ब्रीफकेस दिया था, उसकी जगह भारतीय आवरण ने ली है- लाल रंग का कपड़ा और उस पर ‘अशोक चिन्ह’ का अंकन। अब बजट भारत और भारतीयों के लिए ‘बही-खाता’ ही होगा। यह दीगर है कि उस बही-खाते में आमदनी और खर्च के आंकड़े नहीं दिए गए हैं। बहरहाल यह बही-खाता 1991-92 की तरह क्रांतिकारी, नए प्रयोगों का बजट हो सकता था। कुछ घोषणाएं 1997 और 2000-01 के बही-खातों में भी महत्त्वपूर्ण थीं। उस दृष्टि से 2019-20 का बही-खाता ‘मोदीमय’ नहीं लगता। हमारे कुछ सवाल और भ्रम हैं। बही-खाता नकारात्मक नहीं है, लेकिन दावों के अनुरूप भी नहीं है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी दोहराया कि ‘गांव, गरीब और किसान’ हमारे केंद्र बिंदु रहे हैं। चुनाव के दौरान इसका खूब प्रचार किया गया। कृषि की औसतन विकास दर तीन फीसदी भी नहीं है। औसत किसान की आय तब दोगुनी होगी, जब कृषि विकास दर करीब 13 फीसदी होगी। ऐसा कृषि विशेषज्ञों का मानना है। वित्त मंत्री ने इस संदर्भ में कोई खुलासा नहीं किया। कमोबेश कृषि विकास दर तीन फीसदी से उछल कर 13 फीसदी होने वाली नहीं है, तो फिर 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुनी कैसे होगी, यह वाकई यक्ष प्रश्न सरीखा है? देश के कई हिस्से फिलहाल भयावह सूखे की चपेट में हैं, लेकिन बही-खाते में उसका कोई जिक्र नहीं किया गया है कि आखिर सूखे से बचाव, राहत के लिए सरकार क्या करने जा रही है? किस फसल का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) कितना निश्चित तौर पर मिलेगा, किसान सम्मान निधि की मदद जारी रहेगी अथवा नहीं, फसल बीमे के जो संकट या विवाद हैं, उन्हें सरकार कैसे संबोधित करेगी, किसी भी मुद्दे का स्पष्ट उल्लेख बही-खाते में नहीं किया गया है। बही-खाते में यह उल्लेख जरूर है कि किसानों को 87,000 करोड़ रुपए ट्रांसफर किए जाएंगे। यह तो खैरात का हिस्सा होगा। किसान की आमदनी दोगुनी कैसे होगी, देश यह जानना चाहता है। ये घोषणाएं भी जरूर की गई हैं कि 2024 तक घर-घर में जल और नल होंगे। प्रधानमंत्री मोदी ने ‘राष्ट्रीय जलग्रिड’ की भी बात कही है, लेकिन राष्ट्रीय यथार्थ यह है कि देश के 21 बड़े शहर, जिनमें दिल्ली और चेन्नई भी शामिल हैं, तब तक पानी को लाचार हो जाएंगे। स्वच्छ पेयजल तक का संकट सामने आ सकता है। प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना के तहत 97 फीसदी सड़कें बन चुकी हैं। यह दुर्लभ सफलता है। 2022 तक हरेक बेघर परिवार के सिर पर ‘छत’ होगी और उस घर में ईंधन गैस, बिजली, पानी की व्यवस्था भी होगी। उस साल देश आजादी के 75 साल पूरे कर रहा होगा। बजट में 1.95 करोड़ घर 2021 तक बनाने का लक्ष्य तय किया गया है। शहरों में तो फिलहाल करीब 24 लाख आवास बनकर लोगों में बांटे जा चुके हैं। क्या देश में इतने ही नागरिक ऐसे हैं, जिनके सिर पर कोई ‘छत’ नहीं है? प्रधानमंत्री को इस सवाल का जवाब देना चाहिए। वैसे अभी तक 9.6 करोड़ से ज्यादा शौचालय बनाए जा चुके हैं, करीब 5.6 लाख गांव और 95 फीसदी शहर खुले में शौच से मुक्त हो चुके हैं। बही-खाते में दावा किया गया है कि दो अक्तूबर, 2019 महात्मा गांधी की 150वीं जयंती तक यह देश पूरी तरह खुले में शौच से मुक्ति पा लेगा। यह सामाजिक उपलब्धि का ऐतिहासिक दिन होगा। यह भी गांव के लिए लक्ष्य तय किया गया है कि सभी पंचायतों को इंटरनेट से जोड़ना है। करीब दो करोड़ ग्रामीणों को ‘डिजिटल साक्षर’ बनाया गया है। बहरहाल ऐसी व्यवस्थाओं से गांव, गरीब, किसान भी प्रभावित होंगे, लेकिन बही-खाते में सामाजिक से ज्यादा आर्थिक प्रबंधों का उल्लेख किया जाना चाहिए। बुनियादी सवाल किसान की आमदनी दोगुनी करके उसे समृद्ध बनाने का है। उसी से गरीबी का संदर्भ भी जुड़ा है। खाद्य सुरक्षा पर 1,85,000 करोड़ रुपए खर्च किए जाते हैं। पहले यह खर्च करीब एक करोड़ रुपए था। ज्यादा खर्च के मायने हैं कि ज्यादा गरीबों को भोजन मुहैया कराया जा रहा है। जाहिर है कि गरीबी अब भी बढ़ रही है। भारत की 5000 अरब डालर की अर्थव्यवस्था के अर्थ हैं कि हर साल 1.5 करोड़ लोग गरीबी से बाहर निकाले जा रहे हैं। किसानों की आमदनी दोगुनी हो गई है। हर साल औसतन एक करोड़ नौकरियां दी जा रही हैं। सबसे गौरतलब यह है कि हमारी आर्थिक विकास दर आठ फीसदी होनी चाहिए, जो फिलहाल 5.8 फीसदी के करीब है। तो पांच ट्रिलियन डालर की संभावित अर्थव्यवस्था पर भी सवाल हैं। यह बही-खाते के एक महत्त्वपूर्ण हिस्से का विश्लेषण है। शेष हिस्सों का अध्ययन भी जारी है।