Monday, August 26, 2019 09:05 AM

बड़ा बनने के लिए…

पूरन सरमा

स्वतंत्र लेखक

मेरी समझ में नहीं आ रहा कि इस विषम काल में सरकार पर कोई आरोप लगाकर क्या लौटाऊं? क्योंकि सरकार की ओर से मुझे कुछ भी नहीं मिला है। न साहित्य अकादमी अवार्ड और न ही प्रदेश साहित्य अकादमी अवार्ड। लाइम लाइट में बने रहने के लिए इससे बढि़या अवसर पता नहीं आगे मिले भी या नहीं? ले-देकर मेरे एक कृपालु मित्र ने आज से चालीस साल पूर्व अपने पिता की स्मृति में मुझे पुरस्कृत कर पांच सौ रुपए एवं प्रशस्ति पत्र दिया था, यदि इसे लौटाता हूं, तो यह न तो चर्चा का विषय बनेगा और कृपालु मित्र नाराज हो जाएंगे, वह अलग है। दरअसल त्याग करने की भावना तो जोर मार रही है, मगर मेरे पास लौटाने को न अवार्ड, न पद्मश्री और न राज्यसभा की सदस्यता। मेरे एक मित्र तो इस समय अपनी सफलता इन तीनों को पाने में मान रहे हैं। मैंने कहा भी कि इस समय किसी के लिए भी ट्राई मत मारो, क्योंकि यह समय लौटाने के फैशन का है। यदि कुछ ले भी लिया, तो साहित्यिक हलकों में आलोचना के शिकार हो जाओगे, लेकिन उनका मानना है कि लौटाने के लिए पहले कुछ पास होना जरूरी है। बात तो उनकी सही है, मेरे पास भी कुछ होता, तो मैं इस समय लौटाकर देश-दुनिया में चर्चा का विषय बन सकता था। इसलिए पहले लेने का जुगाड़ करो, ताकि इस विषम काल में लौटाने के फैशन में होड़ ली जा सकती हो। मेरे एक अकादमी अवार्ड प्रदाता (लौटाने वाले) मित्र हैं, मैं उनके पास गया और बोला- सर मैं कुछ लौटाना चाहता हूं, आप ही रास्ता बताइए? वह बोले- जब तुम किसी मामले में कुछ समझते ही नहीं हो, तो फटे में पैर क्यों उलझाना चाहते हो। यह पुरस्कारों की राजनीति है, इसे समझने के लिए पहले गहरे पानी में बैठना पड़ता है। मैंने कहा- यही तो मैं पूछ रहा हूं कि यह मामला क्या है? लोग धड़ाधड़ अवार्ड लौटा क्यों रहे हैं? जैसे आपने अवार्ड वापस क्यों दिया? वह बोले- शर्मा चुप रहो और किसी को कुछ नहीं कहने की शर्त पर तुम्हें राज की बात बताऊं? मैं बोला- सर, मैं किससे कहूंगा। आप तो बताइए। वह बोले- जिस समय अवार्ड मिला था, वह समय लेने तथा अपने कृतित्व के लिए आवश्यक था, लेकिन अब अवार्ड बेमानी हो गया था। अब तो इससे बड़ा कुछ मिले, तो मैं संतुष्ट होऊं। बड़ा प्राप्त करने की नाराजगी भर है, यह लौटाने वाली बात। अब मेरा नाम इतना बड़ा है कि साहित्य अकादमी अवार्ड बहुत छोटा हो गया था। अभी मुझे पद्मश्री दे दिया जाए, तो पागल नहीं हूं कि मैं उसे लौटा दूं। इसलिए तो कह रहा था कि अपने आप को दूर रखो इन विवादों से और वैसे भी तुम्हारे पास लौटाने को है भी क्या? इसलिए जाओ अखबारों की खबरों और कॉलमों के लिए छोटी-छोटी रचनाएं लिखो और अपना कद रोज बढ़ाते रहो। तुम्हें पता तब चलेगा, जब तुम हमारी तरह स्तरीय और उल्लेखनीय पुस्तक लिखकर अवार्ड प्राप्त करो तथा बाद में उसे लौटाने का दुस्साहस कर सको। मैं बोला- सर, बात तो सारी समझ में आ गई, लेकिन यह भी तो बताइए कि सरकार को इससे फर्क क्या पडे़गा? वह लाल-पीले होकर बोले- इसका जवाब मेरे पास नहीं है, सरकार से जाकर पूछो। चलो अब दफा हो जाओ। मेरी सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई, चप्पलें हाथ में लेकर भागा। इतना जरूर समझ में आ गया कि अवार्डेड लोग इस समय गुस्से में हैं, उनसे बात करना ठीक नहीं है। इसलिए बड़ा बनने के लिए मैं इस समय अवार्ड लेने के जुगाड़ में हूं। पहले बड़ा बनो, फिर लौटाओ, यह और बड़ा बनाता है।