Sunday, June 16, 2019 06:02 PM

बड़ी बेचैन रहती हैं किताबें

नेशनल बुक ट्रस्ट ने धौलाधार के आंगन में पुस्तक मेले की धुन बजाकर हिमाचल के लेखक वर्ग को अवसर दिया है। धर्मशाला के पुलिस मैदान पर विचारों के युद्ध में किताबें किस तरह अस्त्र होती हैं, इसका अंदाजा तो बर्नाड शॉ भी नहीं कर सकते। ‘बारूद के बदले हाथों में आ जाए किताब तो अच्छा हो, ऐ काश हमारी आंखों का इक्कीसवां ख्वाब तो अच्छा हो।’ नेशनल बुक ट्रस्ट ने अपने खाके का शृंगार करते हुए कुछ साहित्यकारों, पत्रकारों, शिक्षाविदों, विज्ञानियों से व्यंग्यकारों तक को न्योता भेजने का मसौदा तैयार कर लिया, तो हिमाचली अभिव्यक्ति की निगाहें कविता से ़गज़ल तक पहुंच गईं। ‘मिट्टी से माटी मिले, खो के सभी निशां — किसमें कितना कौन है, कैसे हो पहचान।’ उम्मीद है ‘किताब’ की किस्मत रद्दी होने से बच जाएगी या लेखक के आत्मसम्मान को धर्मशाला पुस्तक मेले की छत मिल जाएगी। ‘जिसे ले गई हवा वो वरक था दिल की किताब का, कहीं आंसुओं से मिटा हुआ, कहीं आंसुओं से लिखा हुआ।’ जिंदा होती किताब के लिए 27 अप्रैल से पांच मई तक के मेले में कितनी सांसें उपलब्ध होती हैं, लेकिन जिस पीड़ा का जिक्र गुलजार साहब ने किया उससे रू-ब-रू तो होंगे ही, ‘किताबें झांकती हैं बंद अलमारी के शीशों से, बड़ी हसरत से तकती हैं। महीनों अब मुलाकातें नहीं होतीं, जो शामें उनकी सोहबत में कटती थीं। अब अक्सर गुजर जाती हैं कम्प्यूटर के पर्दों पर, बड़ी बेचैन रहती हैं किताबें।’

अभिव्यक्ति की पड़ताल

डिजीटल पत्रिका ‘संवाद सेतु’ का अप्रैल अंक यूं तो मीडिया सरोकारों की ताजपोशी में विषय और विमर्श की अपनी परिपाटी सजा रहा है, लेकिन इसकी मांद में एक खास मीडिया तपके से गुत्थम-गुत्था होने की सामग्री की आक्रामकता भी महसूस होगी। विषय कमोबेश ऐसे हैं, जहां राष्ट्र अपने ही राष्ट्रवाद का गूढ़ अर्थ गढ़ रहा है, तो मीडिया (ज्यादातर इलेक्ट्रॉनिक व डिजीटल) की भूमिका पर प्रश्न चस्पां हैं। यहां सवाल पर सवाल तो संपादकीय से ही परिभाषित होता है, तो बालाकोट की लपटों को सूंघते शब्द पत्रकारिता की नई वर्णमाला सरीखे हो जाते हैं। अपनी मेहनत व ऊर्जा से संवाद सेतु का यह अंक प्रश्न के दायरे तो बढ़ाता है, लेकिन ‘आवरण हटाने की जद्दोजहद’ में एकतरफा मंचन ही करता है। डा. जयप्रकाश ने विषय के कठोर पन्नों पर पुलवामा से बालाकोट की मीडिया सैर कराई, तो लगा कि देश अब ‘राष्ट्रवाद’ से ही परिभाषित होता है, क्योंकि प्रश्न पूछने का गुनाह तो अब असाधारण परिस्थितियों की समीक्षा है। ये गुनहगार कौन हैं या पुलवामा में आतंकी प्रहार से चोट खाए देश के लिए ‘सुरक्षा की चूक’ की तफतीश करना कितना गैरजरूरी है, लेखक नहीं बता पाए। इसी तरह सर्जिकल स्ट्राइक सरीखे ‘कवरेज में भाषाई कुटिलता’ लेख में चंदन आनंद को पुलवामा घटना के मीडिया विश्लेषण में खोट नजर आया, लेकिन वह यह नहीं बता पाए कि इस दौरान मीडिया की सुविधा व अनुकूलता क्या रही। इसी कालम में मीडिया पर यह आरोप भी लगा है कि उसके विमर्श ने पाकिस्तान का बचाव किया, हालांकि लेख में यह तथ्य साबित नहीं होता। पत्रिका में ‘भाव की पुनरावृत्ति’ में कलात्मकता का एहसास ढेर सारे बिंदुओं को स्पर्श करता है, तो सामाजिक कंदराओं को छूती अभिव्यक्ति की सहज सृजनशीलता का असर भी यह लेख ढूंढ पाता है। पत्रिका में विषयों का चयन आपको अपने भीतर ‘विचारधारा’ खोजने का मसौदा देता है और अगर वाकई आप किसी खास मंतव्य से पढ़ने का शौक रखते हैं या आपके मन में भारत-भारतीयता के उद्गार गवाही चाहते हैं, तो संवाद सेतु का अप्रैल अंक पूरी तरह समर्पित है।

मीडिया का पर्यटक

भारतीय पत्रकारिता की बदलती मान्यताओं के बीच एक चेहरा अपनी यादों के गुलशन में हमेशा आबाद रहता है। फैजाबाद और बनारस में घर होते हुए भी प्रदीप श्रीवास्तव ने लखनऊ में डेरा जमाया, तो ‘प्रणाम पर्यटन’ पत्रिका का प्रकाशन पिछले तीन साल से जारी है। जाहिर है पर्यटन, परंपरा और धरोहर के झरोखों से झांकते प्रदीप श्रीवास्तव अपने कारवां का सारथी बने हुए, भारतीय पर्यटन की राहों पर अपने पत्रकारिता जीवन को नया आयाम दे रहे हैं। बीएचयू से शिक्षा प्राप्त श्रीवास्तव ने उत्तर प्रदेश, हरियाणा, महाराष्ट्र, तेलंगाना-आंध्र प्रदेश के अलावा पूर्वोत्तर राज्यों की अखबारों में काफी अर्से तक कार्य किया है। ‘प्रणाम पर्यटन’ पत्रिका अपनी विषय विविधता के साथ-साथ साहित्यिक पत्रकारिता को भी नई बुलंदी दे रही है। प्रणाम पर्यटन के ताजा अंक से -

‘आज चुप मैं हो गया हूं वक्त की आवाज सुन

जहर मैंने मुद्दतों हर दिन पिया तेरे लिए।’               

                                        -निर्मल असो