Sunday, January 26, 2020 12:36 AM

बलात्कारी की सजा ‘मुठभेड़’

एक हैदराबाद वाला दृश्य है, तो दूसरा दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में एक और निर्भया के जिंदगी से हार जाने का दृश्य है। ऐसे दुष्कर्मों की सजा अदालत नहीं है अथवा केंद्र सरकार संसद के जरिए यह कानून पारित करे कि सामूहिक बलात्कार, हत्या और बेटियों को जला देने के केस सीधे ही सर्वोच्च न्यायालय सुने और सजा तय करे। सर्वोच्च अदालत एक विधानसभा या संसद में बहुमत परीक्षण का केस तुरंत सुन सकती है और एक दिन में फैसला भी दे सकती है कि क्या करना है। सुप्रीम अदालत एक अपराधी, आतंकी याकूब मेमन का केस सुनने के लिए आधी रात में भी खोली जा सकती है, तो बेटियों की जिंदगी के साथ खिलवाड़ के केस कम महत्त्वपूर्ण हैं क्या? हमें लगता है कि यदि एक बच्ची के साथ दुष्कर्म किया जाता है और उसकी हत्या कर जिंदा जला दिया जाता है, तो क्या यह सीधे ही मानवाधिकारों की होली जलाना नहीं है? हम मानते हैं कि हमारा देश महान लोकतंत्र है और न्यायप्रियता की भी मिसाल है, लेकिन एक लुंजपुंज और कायर व्यवस्था भी हमें स्वीकार नहीं है। हैदराबाद पुलिस द्वारा की गई बलात्कारियों की मुठभेड़ ‘फर्जी’ हो सकती है! उस पर ढेरों सवाल उठाए जा सकते हैं! इसे खतरनाक प्रवृत्ति भी कह लीजिए, लेकिन आज पुलिसवाले साइबराबाद की महिलाओं के ‘नायक’ हैं, राखी की लाज रखने वाले ‘भाई’ हैं, मिठाइयां खिलाई गईं और ढोल-नगाड़ों पर पांव थिरकने भी लगे। हम मानते हैं कि उस भीड़ को अदालती न्याय की परिभाषा और गरिमा की सम्यक जानकारी न हो, लेकिन भीड़ अनपढ़-अज्ञानी भी नहीं लग रही थी, लिहाजा उन महिलाओं ने मुठभेड़ को ही ‘स्वाभाविक इंसाफ’ मान लिया। हैदराबाद के बाद उत्तर प्रदेश के उन्नाव की बेटी के पिता, भाई और परिजन भी ऐसी ही मुठभेड़ के लिए सरकार और प्रशासन से आग्रह कर रहे हैं। उनकी बेटी के साथ भी दुष्कर्म किया गया और बाद में उसे जिंदा ही जला दिया गया। वह ‘निर्भया’ भी जीना चाहती थी, भाई और डाक्टरों से बचा लेने की लगातार गुहार कर रही थी, लेकिन सांसें थम गईं और इसी के साथ कहानी खत्म....! बेशक उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार पीडि़ता के परिवार को 25 लाख रुपए का चेक दे और प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत मकान देने की घोषणा करे, लेकिन यह उस दरिंदगी के एवज में न्याय नहीं है, जो हमारी निर्भयाएं बार-बार झेलती आ रही हैं। अब इस आयाम पर मोदी सरकार को यथाशीघ्र सोचना चाहिए। अब आक्रोशित बेटियां निचली अदालत से राष्ट्रपति तक न्याय को तारीख-दर-तारीख भटकते नहीं देखना चाहतीं। बेटियों का गुस्सा दिल्ली में मोमबत्ती मार्च के दौरान दिखाई-सुनाई दिया कि प्रधानमंत्री मोदी ने जीना हराम कर रखा है। वह इतने संवेदनशील और गंभीर घटनाक्रम पर अभी तक खामोश क्यों हैं? बहरहाल हमारे एक मित्र ने सवाल किया कि फिर पुलिस ही अदालत और जल्लाद दोनों भूमिकाओं में आ जाएगी? सवाल यह भी किया गया कि इस तरह मुठभेड़ें की जाएंगी, तो क्या समाज में अन्याय और अराजकता का माहौल नहीं होगा? हमारी दलील है कि प्रचलित न्याय-व्यवस्था को बदल दिया जाए, ऐसे केस सीधे ही सुप्रीम कोर्ट सुने और बलात्कारियों को यथाशीघ्र फांसी की सजा सुनाए, राष्ट्रपति तक जाने वाली दया-याचिका का प्रावधान भी समाप्त कर दिया जाए, तो फिर मुठभेड़ की नौबत ही क्यों आएगी? खुद राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद भी सरकार से कह चुके हैं कि दया याचिका के प्रावधान खत्म किए जाएं। बदलाव तो सरकार को करना ही पड़ेगा। लोकतंत्र में सबसे बड़ी ताकत देश के नागरिक ही होते हैं। गौरतलब तो यह है कि दिसंबर, 2012 की निर्भया को आज तक इंसाफ  नहीं मिल सका। उसकी मां दर-ब-दर और राष्ट्रपति तक गुहार कर चुकी हैं। न्याय पाने वाली को तो मरे भी करीब सात साल बीत चुके हैं। किसी और के लिए न्याय के मायने क्या हो सकते हैं? उस मां ने भी अंततः मुठभेड़ को सही और न्यायसंगत माना है। बहरहाल ऐसा कोई दिन नहीं गुजरता, जब किसी नई निर्भया का केस सामने न आता हो। जिम्मेदारी और जवाबदेही उन्हीं की है, जो सरकार में बैठे हैं। यदि यह एहसास नहीं है, तो सरकार छोड़ कर बाहर आ जाइए।