Saturday, January 25, 2020 11:28 PM

बहस के कटोरे में स्नान

एक छत के नीचे तमाम मुद्दे, सत्र की हाजिरी में विराम मुद्दे। छूने की हसरतें तपाक से बोलीं-कल बात हुई थी, अब भी हो जाएगी। तपोवन विधानसभा सत्र की ओर मुखातिब हिमाचली चिंताएं, उन बहस के कटोरों में कितना नहाएंगी या खुद को निचोड़ेंगी, यह पुनः उसी रस्सी का खिंचाव है जिस पर तनकर वक्त निकल जाता है। कुछ तो माहौल तमतमाएगा और सड़क की बात से सदन नहाएगा, इसलिए एक बड़े अवसर के साथ हिमाचल का विपक्ष अपनी मशक्कत को अंजाम तक पहुंचाने की फितरत इकट्ठी कर चुका होगा। विधानसभा के शीतकालीन सत्र की पैरवी में, उम्मीदों का रिश्ता कितना जुड़ पाता है, यह विपक्ष की पहल और ईमानदारी से साबित होगा। सियासी संकेतों से आगे अगर वास्तविकताओं को पेश करना विपक्ष की साफगोई है, तो उम्मीद करनी चाहिए कि वाकआउट के फार्मूले पर बहस नहीं होगी। यह दीगर है कि तीसरे साल में प्रवेश कर रही जयराम सरकार से बहुत कुछ पूछने के लिए सदन का वक्त अति कीमती है। मुद्दे साधारण भी हो सकते हैं और विधायकों के प्रश्न सरलता के साथ सुशासन की नब्ज पर हाथ रख सकते हैं। शिकायतें उस आक्रोश से भरी हैं, जो अस्पतालों की मैली चादर में खोट देखती हैं, क्योंकि हर दिन सूचना किसी न किसी डाक्टर की ट्रांसफर से जुड़ती है। अपनी दो छवियों से लड़ रहे चिकित्सा विभाग को जमीन से उठते मेडिकल कालेजों के गगनचुंबी लक्ष्यों का हवाला देना है, तो दूसरी ओर रिजनल से जोनल अस्पताल की फटी तस्वीर से निकलकर बाहर जाते डाक्टरों की सूची बतानी है। मेडिकल कालेजों का अस्तित्व ही अगर स्वास्थ्य सेवाओं पर भारी पड़ रहा है, तो डाक्टरों की उपस्थिति के बिना कैसे चलेगा ढांचा। सूचनाएं हर छोटे-बड़े अस्पताल से रुखस्त होते चिकित्सकों की इसलिए भी गंभीर हो जाती हैं, क्योंकि यह मर्ज अब बढ़ता जा रहा है। कुछ इसी तरह का मर्ज सरकारी बसों की हालत से बयान हो रहा है और सड़क की लुकाछिपी में, ब्रेक डाउन होने की शिकायत भी एक तरह की सियासत समझी जाती है। शायद विधानसभा सत्र में ऐसे प्रश्न भी पूछ लिए जाएं और हां! यह भी तो पूछना है कि बार-बार की घोषणाओं के बावजूद लो फ्लोर बसों का न चलना क्यों राजकोषीय घाटे की बला की तरह प्रदेश के गले पड़ा है। फिर कहीं पौंग बांध के सियापे सुने जा रहे हैं और विस्थापितों के जमावड़े में डा. राजन सुशांत का आंदोलनरत होना भी, क्या गूंगे मुद्दे को विधानसभा सत्र में आवाज देगा। बेशक जिलाधीश से जूस पीकर फोरलेन के आंदोलनकारी नूरपुर में शांत हो गए, लेकिन उस बहस का क्या होगा, जो वर्षों से केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री नितिन गडकरी की घोषणाओं का लबादा ओढ़े बैठी है। यानी हिमाचल में दर्जनों नेशनल हाई-वे तथा फोरलेन चुटकी बजा देने से घोषित हो तो गए, लेकिन हिमाचल हर मोड़ पर ठगा महसूस करता है। विपक्ष के पास बंदर भी हैं और स्कूल की वर्दी भी, देखें कितना दम दिखाता है। यह दीगर है कि विकास के मुद्दों पर राज्य सरकार पूरी तरह से विपक्ष को खारिज कर सकती है या यह भी प्रमाणित तथ्य है कि दोनों तरफ से तू तू-मैं मैं के बीच केंद्र से हिमाचल के अधिकारों की बात खुलकर सामने नहीं आएगी। सरकार के पास आंकड़ें होंगे और पेश करने का सलीका भी। इसलिए सबसे बड़ी बहस इस्वेटर मीट के दायरे में होगी। यह इसलिए भी कि हिमाचल की जयराम सरकार ने बानवे हजार करोड़ के एमओयू पर हस्ताक्षर करके, सारी कायनात को बदलने का संकल्प लिया है। यह कार्य प्रशंसनीय है, लेकिन हकीकत के मानचित्र पर उकेरना इतना भी आसान नहीं कि पलभर की मेहनत से परिणाम मिल जाएं। लिहाजा विपक्ष अपने सत्ता दौर के निवेश को बहस में परोसेगा और फिर पूछ लेगा कि इस्वेटर मीट में असल में हुआ क्या। यही प्रश्न  जयराम सरकार को संबोधित करते हुए अपना रियल टेस्ट देना है। हकीकत में निवेश की पलकें इस सत्र में कितनी खुलती हैं, इस पर सरकार के दृढ़ संकल्प का मुआयना होगा। निवेश अपने साथ अगर आंकड़ों में रोजगार ला रहा है, तो हर एमओयू की खनक पर धारा 118 की अनुमतियों पर विपक्ष की निगाह रहेगी। जाहिर है राजनीति में फिलहाल प्रदेश भाजपा का पलड़ा इसलिए भी भारी है, क्योंकि दो उपचुनाव हार कर भी कांग्रेस अपने भीतर के मलाल को खारिज नहीं कर सकी और न ही भीतरघात के जख्मों को अलहदा कर पा रही है।