Tuesday, June 02, 2020 10:45 AM

बहुत पुराना है महामारियों का इतिहास

डा. गंगाराम राजी

लेखक मंडी से हैं

चीन से चला हुआ जहाज जहां जिस भी बंदरगाह पर लगता था, वहीं पर चूहे उतर जाते और उस देश को संक्रमित करते रहे। भारत में भी यह 1889 में पहुंच गई थी और इस बीमारी ने चीन से भी अधिक तबाही भारत में फैलाई थी। चीन और भारत में सवा सौ करोड़ से ज्यादा लोग मारे गए थे। भारत में प्लेग की एंट्री पोर्ट सिटी हांगकांग के जरिए हुई थी। मुंबई, पुणे, कोलकाता और कराची में सबसे अधिक असर दिखा। 1347 से 1351 तक चार सालों में यूरोप की करीब दो से तीन करोड़ की आबादी को खत्म कर दिया था। आज विज्ञान के साथ मनुष्य की समझ में भी विकास हुआ है। मनुष्य कोरोना से लड़ने के तरीके पर विचार कर रहा है। सावधान है...

संसार आज कोरोना की महामारी से जूझ रहा है। पहले भी वह कई बार इस तरह की बीमारियों से दो-दो हाथ कर चुका है और ऐसी महामारियां लाखों, करोड़ों लोगों को अपनी भूख का ग्रास बना चुकी हैं। वह संक्रामक और भीषण रोग जिससे एक साथ बहुत से मनुष्यों की मृत्यु हो जाती है, जब किसी रोग का प्रकोप कुछ समय पहले की अपेक्षा बहुत अधिक होता है तो उसे महामारी कहते हैं। महामारी किसी एक स्थान पर सीमित रहती है, अगर वह दूसरे महाद्वीपों में भी पसर जाए तो उसे सार्वदेशिक रोग कहते हैं। आइए एक झलक दुनिया में फैली महामारियों के बारे में जान लेते हैं। दुनिया के इतिहास में तीन महामारियां ऐसी रही हैं जिसे हम प्लेग के नाम से जानते हैं। सबसे पहले 542 ईस्वी में बाइजांटिन की राजधानी में इसकी शुरुआत हुई। देखते ही देखते यह यूरोप, एशिया, उत्तर अफ्रीका और अरब में फैल गई। इस कारण उस जमाने में 3-5 करोड़ लोगों की मौत हुई। यह उस समय की दुनिया की आधी जनसंख्या थी।

यही आठ सौ साल बाद फिर लौटा। 1347 में इसने यूरोप में दस्तक दी, महज चार सालों के भीतर दो करोड़ लोगों की इसके कारण मौत हो गई। उस समय लोगों के पास इस महामारी को रोकने का कोई तरीका नहीं था। लेकिन उन्हें यह समझ आ गया कि यह एक दूसरे के साथ रहने से फैलती है। क्वारंटीन उस समय आरंभ हो गया था। उस समय जहाजों में आदमी को अलग-थलग रखा जाता था। यह शब्द ही वहीं से आरंभ हुआ था। इसे क्वारंटीन कहा जाने लगा था। 1347 से लेकर 1665 तक लगभग 3000 सालों में 40 बार प्लेग फैला था। इस कारण ब्रिटेन में 20 प्रतिशत मौतें होती थीं। 1965 में लंदन में एक बार फिर प्लेग ने दस्तक दी और लाखों लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी। लंदन की एक-चौथाई जनसंख्या इसकी भेंट चढ़ गई। इसे रोकने के लिए शहर बंद कर दिए गए और बीमार लोगों को जबरदस्ती घरों में कैद कर दिया गया। प्लेग के बाद चेचक के रूप में एक और महामारी का सामना करना पड़ा।  यूरोप और एशिया में फैले चेचक से संक्रमित 30 प्रतिशत लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी। मैक्सिको और अमरीका में भी लाखों लोगों की मौत हुई।

दशकों बाद चेचक वायरस से फैलने वाली पहली ऐसी बीमारी बनी जिसका वैक्सीन उपलब्ध हुआ। 1980 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने ऐलान किया कि चेचक को पूरी तरह खत्म किया जा चुका है। 19वीं सदी के आरंभ से लेकर मध्य आते-आते इंगलैंड में हजारों लोग हैजा की चपेट में आकर जान गंवा चुके थे। जॉन स्नो नाम के ब्रिटेन के एक डाक्टर ने पाया कि लंदन के खराब पानी की वजह से लोग इस बीमारी का शिकार हो रहे हैं। उन्होंने वह पानी बंद करवाया और उसके कुछ दिनों बाद ही इस बीमारी पर लगाम लग गई। लगभग सभी महामारियां विदेशों से ही आई हैं। 1918 में स्पैनिश फ्लू की बीमारी जब भारत पहुंची तो उसने लाखों लोगों को अपना ग्रास बनाया था। यहां तक कि महात्मा गांधी भी इसकी चपेट में आ गए। गांधी की पुत्रवधू गुलाब और पोते शांत की मौत इस बीमारी से हुई थी। यहां तक कि उपन्यासकार मुंशी प्रेम चंद भी इस बीमारी से संक्रमित हुए थे। यह बीमारी 1918 के आरंभ होते ही अर्थात जनवरी में ही आ पहुंची थी और दो वर्ष तक वह संसार में पचास करोड़ लोगों को संक्रमित कर गई जो संसार की आबादी का एक-चौथाई हिस्सा था और इस बीमारी से मरने वालों की संख्या अनुमानतः 170 लाख से लेकर पांच करोड़ तक थी। यह भी अनुमान है कि भारतीय उपमहाद्वीप में करीब दो करोड़ लोग मारे गए थे।

तेरहवीं सदी में फैली प्लेग की बीमारी से लगभग 25 प्रतिशत यूरोप की आबादी खत्म हुई थी। मुद्रास्फीति इतनी नीचे गिर गई थी जो आज तक कभी नहीं हुई थी। भारत इस समय दो आपदाओं से जूझ रहा था। एक, यह बीमारी और दूसरा अकाल। यह बीमारी समुद्र्र के रास्ते भारत पहुंची थी। प्रथम युद्ध से लौट रहे भारतीय सैनिकों का जहाज मुंबई की बंदरगाह पर लगा था। इन सैनिकों के साथ ही यह बीमारी भारत में प्रवेश कर गई थी। इस बीमारी ने एक चोर की भांति भारत में प्रवेश किया और रातों-रात ही रेलवे के माध्यम से पूरे देश में फैल गई थी। उधर, चीन ने केवल कोरोना ही संसार को नहीं दिया, प्लेग का तोहफा भी चीन ने ही सारे संसार को दिया था। उस समय आने-जाने के साधन कम हुआ करते थे। इसलिए यह बीमारी बहुत धीरे से संसार के दूसरे हिस्सों में गई। चूहों के द्वारा यह बीमारी चीन में फैली थी। विदेशों में भी समुद्री जहाज के रास्ते चूहों ने इसे जगह-जगह पहुंचाया।

चीन से चला हुआ जहाज जहां जिस भी बंदरगाह पर लगता था, वहीं पर चूहे उतर जाते और उस देश को संक्रमित करते रहे। भारत में भी यह 1889 में पहुंच गई थी और इस बीमारी ने चीन से भी अधिक तबाही भारत में फैलाई थी। चीन और भारत में सवा सौ करोड़ से ज्यादा लोग मारे गए थे। भारत में प्लेग की एंट्री पोर्ट सिटी हांगकांग के जरिए हुई थी। मुंबई, पुणे, कोलकाता और कराची में सबसे अधिक असर दिखा। 1347 से 1351 तक चार सालों में यूरोप की करीब दो से तीन करोड़ की आबादी को खत्म कर दिया था। आज विज्ञान के साथ मनुष्य की समझ में भी विकास हुआ है। मनुष्य कोरोना से लड़ने के तरीके पर विचार कर रहा है। सावधान है।

सारे संसार के वैज्ञानिक इसकी वैक्सीन के लिए रात-दिन लगे हुए हैं। हमें घबराना नहीं चाहिए। जीवन शैली में परिवर्तन कर लेना चाहिए जो समय की जरूरत है। सरकार, वैज्ञानिक, स्वयंसेवी संस्थाएं, सब एकजुट होकर कोरोना को हराने में लगे हुए हैं। आधुनिक युग में जबकि माकूल सुविधाएं हैं,  इसका हल अवश्य निकल आएगा।