बाबा बैजनाथ धाम ज्योतिर्लिंग

मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि किसी भी द्वादश ज्योतिर्लिंग से अलग यहां के मंदिर के शीर्ष पर त्रिशूल नहीं, बल्कि पंचशूल है। यहां मनोरथ पूर्ण करने वाला कामना द्वादश ज्योतिर्लिंग स्थापित है...

झारखंड के देवघर जिला स्थित बाबा बैद्यनाथ धाम सभी द्वादश ज्योतिर्लिंगों से अलग है। यही कारण है कि सावन महीने में प्रत्येक शिवभक्त की यही कामना होती है कि एक बार बाबा बैद्यनाथ का दर्शन जरूर कर ले। मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि किसी भी द्वादश ज्योतिर्लिंग से अलग यहां के मंदिर के शीर्ष पर त्रिशूल नहीं, बल्कि पंचशूल है। यहां मनोरथ पूर्ण करने वाला कामना द्वादश ज्योतिर्लिंग स्थापित है। कहते हैं सागर से मिलने का जो संकल्प गंगा का है वही दृढ़ निश्चय भगवान शिव से मिलने का कांवडि़यों में भी देखा जाता है। तभी तो श्रावणी मेले के दौरान धूप, बारिश और भूख-प्यास भूलकर दुर्गम रास्तों पर दुख उठाकर अपने दुखों के नाश के लिए वे बाबा बैद्यनाथ की शरण में पहुंचते हैं।

बोल बम का नारा है, बाबा एक सहारा है जैसे नारों और शिव गीतों से बिहार में भागलपुर, मुंगेर, बांका और झारखंड में देवघर और दुमका जिले की नदियों, पहाड़ों और जंगलों का पूरा इलाका गेरूआ वस्त्रधारी कांवड़ यात्रियों के रंग में रंग गया है। विश्व प्रसिद्ध श्रावणी मेले के समापन की तिथि जैसे-जैसे नजदीक आती जा रही है वैसे-वैसे इस कांवड़ यात्रा में देश-विदेश से आने वाले शिव भक्तों की संख्या बढ़ती जा रही है। मान्यता है कि सावन महीने में सुल्तानगंज के अजगैबीनाथ धाम में प्रवाहित उत्तरवाहिनी गंगा से कांवड़ में जल भर कर पैदल 105 किलोमीटर की दूरी तय कर देवघर में द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक प्रसिद्ध बाबा बैद्यनाथ धाम और यहां से करीब 42 किलोमीटर दूर दुमका जिले में अवस्थित बाबा बासुकीनाथ धाम में जलार्पण और पूजा-अर्चना करने से श्रद्धालु शिवभक्तों की सभी कामनाएं पूर्ण होती हैं। इस कारण बैद्यनाथ धाम को दीवानी और बासुकीनाथ धाम को फौजदारी बाबा के नाम से जाना जाता है। बैद्यनाथ धाम की प्रसिद्धि रावणेश्वर धाम और हृदयपीठ रूप में भी है। मान्यताओं के अनुसार एक समय राक्षसों के अभिमानी राजा एवं परम शिव भक्त रावण ने कैलाश पर्वत पर कठिन तपस्या कर तीनों लोक में विजय प्राप्त करने के लिए अपनी लंकानगरी में विराजमान होने के लिए औघड़दानी बाबा भोले शंकर को मना लिया। लंका जाने के लिए भगवान शंकर ने रावण को वरदान देते समय यह शर्त रखी कि लिंग स्वरूप को तुम भक्तिपूर्वक अपने साथ ले जाओ, लेकिन इसे धरती पर कहीं मत रखना। अन्यथा यह लिंग वहीं स्थापित हो जाएगा। रावण की इस सफलता से इंद्र सहित देवतागण चिंतित हो गए और इसका उपाय निकालने में जुट गए।

कहते हैं कि रावण लिंग स्वरूप बाबा भोलेनाथ को लंकानगरी में स्थापित करने के लिए जा रहा था कि रास्ते में झारखंड के वन प्रांत में अवस्थित देवघर में शिव माया से उसे भारी लघुशंका की इच्छा हुई। रावण बैजू नाम के एक गोप को लिंग स्वरूप सौंप कर लघुशंका करने चला गया। बैजू लिंग स्वरूप के भार को सहन नहीं कर सका और उसे जमीन पर रख दिया। जिससे देवघर में भगवान भोलेनाथ स्थापित हो गए। लघुशंका कर लौटे रावण ने देखा बाबा भोलेनाथ जमीन पर विराजमान हो गए हैं, तो वह परेशान हो गया और उन्हें जमीन से उठाने का बहुत प्रयास किया, लेकिन सफल नहीं हो सका। इससे गुस्से में आकर उसने लिंग स्वरूप भोलेनाथ को अंगूठे से जमीन में दबा दिया, जिसके निशान आज भी बैद्यनाथ धाम स्थित द्वादश ज्योतिर्लिंग पर विराजमान हैं। उस लिंग में भगवान शिव को प्रत्यक्ष रूप में पाकर सभी देवताओं ने उसकी प्राण प्रतिष्ठा कर उसका नाम बैद्यनाथ धाम रखा।