Monday, April 06, 2020 05:57 PM

बाल चरित्र निर्माण मेंलेखन की अवधारणा

डा. गंगाराम राजी

मो.-9418001224

बाल साहित्य लेखन की परंपरा अत्यंत प्राचीन है। तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में लिखे बाल साहित्य के विश्व प्रसिद्ध ग्रंथ पंचतंत्र से आज तक यह परंपरा चली आ रही है। कहानियां सुनना बच्चों की सबसे प्यारी आदत है और यह परंपरा दादी, नानी और मां से आज तक यात्रा करती आ रही है। यह केवल मात्र मनोरंजन का साधन ही नहीं है, ज्ञान देने का भी मनोवैज्ञानिक ढंग है। आज युग परिवर्तित होने के साथ बच्चों के मनोरंजन के साधनों में भी परिवर्तन आ गया है। साधन बदलने के साथ बच्चों की रुचि में भी बदलाव आ गया है। आज के बाजारवाद के समय में बच्चों का रुझान पुस्तकों की अपेक्षा आधुनिक कल-पुर्जों की ओर आकर्षित होने लगा है, जो दिशाहीनता की ओर अधिक अग्रसर रहा है। इसलिए आज का समय अभिभावकों, अध्यापकों और बड़े-बुजुर्गों के लिए चुनौतीपूर्ण बनता जा रहा है।

दूसरी ओर एक बहुत बड़ी चुनौती बड़ों के सामने है क्योंकि आज हर बच्चा मोबाइल, इंटरनेट और टीवी से ग्रस्त है। इसलिए उनकी रुचि पुस्तकों से घटती जा रही है। वर्तमान में बच्चों को किस प्रकार से बाल साहित्य के प्रति आकर्षित करें, यह आज लेखकों के लिए भी एक चुनौती की तरह हो गया है। बाल साहित्य जहां बच्चों को अच्छे संस्कार और विचार देने की भूमिका निभाता है, वहीं यही साहित्य बच्चों के मन, विचार और कल्पना को परिमार्जित करते हुए समाज और राष्ट्र के भावी स्वरूप की पृष्ठभूमि भी तैयार करता है। जहां इस वैश्विक बाजारवाद युग में हैरी पॉटर का सातवें आसमान तक का प्रचार हुआ, संसार के बच्चे इसके रंग में रंग गए, वहीं बाल साहित्य की ओर किसी का ध्यान तक नहीं गया। इस बाजारवाद में बच्चों की पुस्तकों के विज्ञापन के बदले बच्चों के खिलौने के विज्ञापन पर जोर दिया जाने लगा है जिससे बच्चों का पुस्तकों के प्रति लगाव बढ़ने के बदले घटता जा रहा है क्योंकि आज के इस बाजारवाद के पास अकूत पैसे की ताकत है जो आने वाली पीढ़ी पर अपनी विचारधारा थोपने की सक्रिय भूमिका अदा कर रही है। यह सब निराशाजनक तो है, परंतु हाथ पर हाथ धरे लेखक अगर बैठता है तो स्थितियां और गंभीर हो सकती हैं। लेखक की जिम्मेवारियां बढ़ती जा रही हैं। बच्चों की प्रवृत्ति रहती है कि उन्हें जो आसानी से मनोरंजन के लिए मिल जाए, उसी के रंग में वे रंगना चाहते हैं। यहां पर यह बात भी उल्लेखनीय है कि मां-बाप भी इसी काम के लिए उनकी मदद करते आए हैं क्योंकि वे स्वयं अपने काम में उलझते जा रहे हैं। इन्हीं हालात में बच्चों की किताबों के प्रति उदासीनता होने लगी है। चुनौतियां हम सबके सामने हैं। डा. हरिकृष्ण देवसरे जी के अनुसार, ‘भविष्य का समाज जैसा होगा, उसके अनुरूप बच्चों को तैयार करना ही हमारा दायित्व है और यह दायित्व बच्चों की दुनिया से जुड़े लोगों और बाल साहित्य लेखकों को पूरा करना है, क्योंकि उन्हें इस विचार को जगाना है जो नई पीढ़ी को, नई शताब्दी के लिए तैयार कर सकेंगे।’ बच्चों का मन कुम्हार के उस कच्चे घड़े की तरह होता है जिसका निर्माण करते हुए कुम्हार एक ओर हाथ रख कर उसे थामे हुए तो होता है परंतु दूसरी ओर हल्का-हल्का प्रहार भी कर रहा होता है ताकि उसकी आकृति में सुंदरता आए और एक भव्य रचना को साकार रूप दे सके। आज जहां बच्चे और मां-बाप के बीच संवाद समाप्त होता जा रहा है, वहीं इस स्थिति में साहित्यकार की भूमिका और महत्त्वपूर्ण बन जाती है।