Monday, April 06, 2020 06:33 PM

बाल साहित्य एवं बाल साहित्यकार की जिम्मेदारी

शेर सिंह मो.-8447037777

बाल साहित्य के लिए बाल मनोविज्ञान को समझना और उसके अनुरूप सृजन नितांत आवश्यक है। बाल बुद्धि किस रूप में आस-पास के परिवेश एवं ज्ञान को तीव्रता से ग्रहण करती है, किन्हें याद रखती है एवं किन्हें जानने-समझने व देखने-सुनने में आनंदित होती है, इस गूढ़ तथ्य को गहराई से समझ लेना और उस पर विचार करना किसी भी बाल साहित्यकार के लिए बहुत जरूरी है। बच्चों के लिए यदि कहानियां हों तो कहानी रोचक होनी चाहिए। लेख हो तो प्रेरक हो और यदि कविता अथवा गीत हो तो उसमें फूलों-सी खुशबू बसी होनी चाहिए। जीवन की मधुर महक होनी चाहिए। बाल साहित्यकार यदि बच्चों के मनोविज्ञान एवं उपर्युक्त बिंदुओं, विशेषताओं को ध्यान में रखकर रचनाओं का सृजन करें तो ऐसी रचनाएं न केवल बाल साहित्य के लिए मील के पत्थर होंगे, बल्कि स्वस्थ समाज और संस्कृति के रक्षण, संवर्धन का भी काम करेंगी। आम धारणा यही है कि बच्चों के लिए कहानियां, कविताएं लिखना बहुत सरल है। अधिक बौद्धिकता की आवश्यकता नहीं होती है। कुछ बाल लेखक तुकों को ही साहित्य साधना मान लेते हैं। यह एक गलत सोच और भ्रामक धारणा है। यह अवश्य है कि बाल साहित्य में अधिक बौद्धिकता नहीं होनी चाहिए जिससे रचना सरस होने की जगह नीरस लगे। दिमाग में बोझ का अहसास कराए। बाल साहित्य ऐसा हो जो बच्चों के मनोरंजन के साथ-साथ ज्ञान का वर्धन भी करे। सद्चरित्र निर्माण में सहायक बने। रचना चाहे कोई भी हो, कैसी भी हो, वह कोरी कल्पना पर आधारित नहीं होनी चाहिए। कल्पनाएं जीवन में उड़ान भरने की प्रेरणा तो देती हैं, परंतु वास्तविकताओं से परिचित नहीं कराती हैं। इसलिए बाल कहानियों में लोककथाओं, नीतिकथाओं एवं बोधकथाओं का अंश अवश्य होने चाहिए ताकि वह रोचक भी लगे, साथ ही जीवन की सच्चाइयों से रूबरू होने का भी काम करे। मेरा मानना है कि रचना वही श्रेष्ठ होती है जो पढ़ने वाले के मन में विचार पैदा करे। उसकी जिज्ञासा बढ़ाए। उसकी मनन प्रक्रिया को बढ़ाए। उसकी मनःस्थिति को प्रसन्नचित कर दे। उसकी उत्सुकता को शांत करे। कविताएं ऐसी हों, जो एक बार पढ़ लेने भर से समझ आ जाए। मन में बैठ जाए। जीवन भर के लिए मन-मस्तिष्क में बस जाए। द्वारिका प्रसाद महेश्वरी, सुभद्रा कुमारी चौहान जैसे कालजयी रचनाकार अपनी रचनाओं के कारण अमर हो गए हैं। जनमानस में उनकी रचनाओं को लेकर जो श्रद्धा और आदरभाव उत्पन्न होता है, प्रेरणा मिलती है, ऐसे रचनाकार एवं उनकी रचनाएं जीवन का मोड़ बदल देती हैं। पत्थर को पारस बना देती हैं।

बाल साहित्य में कुछ वर्षों से अनेक विधाओं में से शिशु गीत विधा बहुत तेजी से प्रचलन में आ गई है। शिशु गीत एवं बाल गीत में सूत भर का अंतर है। हाल के वर्षों में जीवन की हर रीति-नीति जैसे बदल गई है। संचार क्रांति, सूचना तकनीक और वैश्वीकरण की अवधारणा ने लोगों की सोच को बदल कर रख दिया है। जीवन पद्धति को तर्कसंगत तरीके से सोचने पर बाध्य कर दिया है। नई से नई सहज और सुलभ जानकारियों, सूचनाओं व जिज्ञासाओं ने पुरानी सोच पर सेंध लगा ली है। बड़े तो बड़े, बच्चे तक इन परिवर्तनों से अछूते नहीं रह पाए हैं। टेलीविजन के सैकड़ों चैनल, मोबाइल फोन, इंटरनेट, व्हाट्सएप एवं फेसबुक ने जीवन में नवीन जानकारियों के संबंध में जैसे सभी को सूचनाओं, ज्ञान के भंडारों से भर दिया है। निजी अनुभव बेशक नगण्य हो, एक-दो वर्ष के छोटे-छोटे शिशु अथवा बच्चे जिस तीव्रता से मोबाइल फोन, इंटरनेट का इस्तेमाल, गेम्स इत्यादि को सीख रहे हैं, या जिस कुशलता, दक्षता से उनका संचालन, उपयोग कर रहे हैं, बड़ी उम्र के लोग भी उस तेजी से इनका प्रयोग करना नहीं जान पा रहे हैं। इतनी सी छोटी उम्र के बच्चे इन उपकरणों का प्रयोग करना न केवल सीख रहे हैं, बल्कि दक्षता के साथ इनका उपयोग भी कर रहे हैं। आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का उपयोग, संचालन करने में जितने कुशल एवं पारंगत आज बच्चे एवं किशोर हैं, बड़ी उम्र के लोग इस मामले में उनसे पीछे ही हैं। आज के बच्चों की बुद्धि चातुर्य और हाजिरजवाबी से कोई अनभिज्ञ नहीं है। हर नई पीढ़ी पुरानी पीढ़ी से बीस ही होती है, उन्नीस नहीं। यह सिद्ध हो जाता है। इसलिए बाल मनोविज्ञान को ध्यान में रखकर ही बाल साहित्य का सृजन किया जाना चाहिए। यह उक्ति यहां पूरी तरह चारितार्थ होती है कि बच्चे कच्ची मिट्टी के सामन होते हैं। कच्ची मिट्टी को कुम्हार जिस प्रकार से मनचाहा आकार-प्रकार देता है, उसी प्रकार एक बाल रचनाकार को अपनी रचनाओं में बाल बुद्धि को केंद्र में रखकर लिखना चाहिए। महापुरुषों की जीवनियों, उनकी आत्मकथाओं, प्रेरक प्रसंगों आदि के रोचक तथा सुपाठ्य लेखन के विषय होने चाहिए। हिंदी को सीखने एवं व्यवहार में लाने की लगन और ललक उत्पन्न करने हेतु पाठ्यक्रमों में प्रतिभाशाली एवं सशक्त बाल रचनाकारों की रचनाएं शामिल होनी चाहिए। हिंदी और हिंदी के प्रति उत्साह तथा दायित्व बनाए रखने की बहुत बड़ी जिम्मेदारी लेखकों, कवियों के ऊपर भी है। बाल साहित्य लेखन आत्मसंतुष्टि अथवा अपनी श्रेष्ठता को स्थापित करने के प्रयासों से प्रेरित नहीं होना चाहिए। ऐसी रचनाएं ही उपयोगी, दीर्घजीवी, ग्रहणीय, जीवन को दिशा देने वाली, प्रेरक एवं ज्ञानवर्धक बनती हैं जो केवल बालमन को केंद्र में रखकर पूरे मन से रची गई हों। यह जरूरी है कि बाल साहित्य से बच्चों के ज्ञान में वृद्धि एकमात्र लक्ष्य नहीं होना चाहिए, बल्कि उनका मनोरंजन भी आवश्यक है। बाल साहित्य लेखक एवं कवि से पूरी निष्ठा एवं पूर्ण प्रतिबद्धता की अपेक्षा करता है। यह तथ्य निर्विवादित है कि अच्छे बाल साहित्य की बच्चों के चरित्र निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है।