Monday, April 06, 2020 06:41 PM

बाल साहित्य और बाल साहित्यकार की अनदेखी : जिम्मेवार कौन

रतन चंद ‘रत्नेश’

मो.-9417573357

हिंदी या अन्य प्रांतीय या विदेशी भाषाओं के साहित्य में बाल-लेखन को उतनी ही महत्ता दी जाती है जितनी अन्य विधा को। अतः यह कहना सरासर गलत होगा कि बाल-साहित्य और बाल-साहित्यकार की एक तरह से अनदेखी हो रही है। हां, कुछ हिंदी-भाषी क्षेत्र ऐसे हैं जहां बाल-साहित्य के प्रति उदासनीता अपेक्षाकृत अधिक देखी जाती है और बाल-साहित्यकारों को उतना आदर-सम्मान नहीं मिलता जितना उन्हें अन्य राज्यों या प्रदेशों से मिलता है। इनमें हिमाचल प्रदेश भी एक ऐसा हिंदी-भाषी क्षेत्र है जहां बाल-साहित्य और उनके साहित्यकारों की हमेशा से अनदेखी होती आ रही है। दरअसल, साहित्य से जुड़ी सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं का ध्यान कभी बाल-साहित्य के उत्थान की ओर गया ही नहीं, जबकि बाल-साहित्य से ही सही मायनों में साहित्य की शुरुआत होती है। हिमाचल प्रदेश में बाल-साहित्य पर कलम चलाने वालों की एक लंबी शृंखला है। यह बात दीगर है कि कालांतर में वे बाल-साहित्य से विमुख होकर अन्य विधा के प्रति समर्पित हो गए। इनमें से गिनती के लेखक ही ऐसे होंगे जो अन्य विधाओं में लेखन करने के साथ-साथ लगातार बाल-लेखन भी करते हों। इसका कारण शायद यह भी है कि बाल-साहित्य पर लिखना बेहद कठिन है। बालमन को समझने और उसके मनोविज्ञान में रुचि या फिर साधारण शब्दों में कहा जाए तो बचपन में लौटने पर ही होता है। हिमाचल प्रदेश की अदिति गुलेरी ही संभवतः एकमात्र शोधकर्ता रही हैं जिन्होंने इस प्रदेश के बाल-साहित्य पर शोध किया है और वह भी प्रदेश से बाहर जाकर पंजाब विश्वविद्यालय में, जबकि प्रदेश में ही अपना विश्वविद्यालय है, परंतु बाल-साहित्य के प्रति वहां से कभी कोई आवाज सुनने को नहीं मिलती है। विडंबना यह है कि बाल-साहित्य पर हिमाचल में कभी कोई लगातार सेमिनार या गंभीर चर्चा नहीं होती, तो भला इस विधा और इसके लेखकों का उत्थान कैसे हो सकता है। यहां के शिक्षा विभाग को भी इस विषय पर विचार करना चाहिए कि स्कूल के पाठ्यक्रमों में हिमाचल के बाल-साहित्य पर बात हो। पहली-दूसरी की कक्षाओं में तो बाकायदा बालगीत पर केंद्रित पुस्तकें उपलब्ध हों जिसे बच्चे गुनगुना सकें और उनमें कविता के प्रति लगाव उत्पन्न हो। कुछ लेखकों की यह गलत धारणा है कि बाल लेखन बचकाना साहित्य है और इसका लेखन अपने लेखन को निम्न-स्तर पर ले जाना है, जबकि यह उनकी सोच का दिवालियापन है। हमारे देश का पश्चिम बंगाल एक ऐसा राज्य है जहां उन्हीं लेखकों को साहित्यकार समझा जाता है जो अन्य विधाओं के साथ-साथ लगातार बाल-लेखन भी करते हैं। यही कारण है कि वहां के साहित्यकार अपने आपको साहित्य से खारिज होने से बचाने के लिए सदैव बाल-लेखन करते हैं, जबकि हिंदी साहित्य में बिना बाल-लेखन के ही कई लेखक स्थापित हो जाते हैं। बाल-साहित्य की अनदेखी का यह भी एक प्रमुख कारण है। बाल-साहित्य और बाल साहित्यकारों की अनदेखी का जिम्मेवार तो उन्हें ही ठहराया जाएगा जो अन्य विधा के प्रति सदैव प्रयासरत रहते हैं, परंतु बाल-साहित्य की अनदेखी करते हैं। हिमाचल प्रदेश के कई लेखकों को बाल-साहित्य के लिए अन्य राज्यों में संस्थाओं द्वारा सम्मान मिलता रहा है तो क्या कारण है कि वे अपने ही प्रदेश में उपेक्षित हैं, यह विचारणीय है। ऐसे भी कई उदाहरण सामने आए हैं जब देखा गया है कि प्रदेश में बाल-साहित्य पर कोई कार्य कर रहा हो तो उन्हें सहयोग देने की बात दूर रही, बल्कि हतोत्साहित करने के हथकंडे अपनाने में भी गुरेज नहीं किया जाता। यह अत्यंत निंदनीय है। सही मायने में साहित्य को समृद्ध करना हो और पाठकों में इसकी रुचि बढ़ानी हो तो बाल-साहित्य को सदैव सर्वोपरि रखना होगा और इस पर लगातार चर्चा-परिचर्चा करनी होगी।