Monday, April 06, 2020 05:51 PM

बाल साहित्य मेंबच्चों का रुझान

हीरा सिंह कौशल

मो.-9418144751

बच्चों का रुझान दिनोंदिन इस बदलते तकनीकी युग में परियों की कथाओं के साथ-साथ विज्ञान, प्रकृति व पर्यावरण संरक्षण की तरफ बढ़ रहा है। बाल साहित्य की बात करें तो बच्चों का प्राचीन समय से ही इस तरफ  रुझान रहा है। बच्चों के मनोरंजन के लिए या प्रेरणा के लिए लिखा गया साहित्य ही बाल साहित्य कहा जा सकता है। इससे बच्चों का नैतिक विकास व संस्कार पल्लवित होते हैं। साथ ही, काल्पनिक दुनिया के साथ यथार्थ का वजूद भी मौजूद रहता है क्योंकि इन तत्त्वों का मौजूद रहना बाल साहित्य में आवश्यक है। प्राचीन काल में पंचतंत्र के रचनाकार विष्णु शर्मा ने पशु-पक्षियों, जानवरों को पात्र बना कर अनेक तरह से शिक्षा देकर राजा के मूर्ख पुत्रों को विद्वान बना दिया। बाल साहित्य का प्रचलन पुरातन काल से ही है। बड़ों के लिए लिखा गया साहित्य बच्चों ने अपने लिए जरूरत के अनुसार सुविधाजनक बनाया है। बच्चों के रुझान के अनुसार, पहले भी साहित्य की रचना हुई है। इसमें मुंशी प्रेमचंद की कहानी ईदगाह बच्चों के सारे मनोभावों को प्रकट करती है तथा आखिर तक बच्चों को जोड़े रखती है। चाचा चौधरी, विक्रम बेताल, तेनाली राम की कहानियां, सिंहासन बत्तीसी, गौतम बुद्ध की कथाएं आदि भी बाल साहित्य है जिसको पढ़कर बच्चों का मानसिक विकास भी हुआ है। टेलीविजन और स्मार्ट फोन आने से वे मनमाफिक कहानियां, कविता व कार्टून आदि पढ़-देख सकते हैं। आज का बच्चा जो दो साल का है, वह स्मार्ट फोन से कविता सुनकर खाना खा रहा है। इससे होने वाली हानियों से अनभिज्ञ बच्चे इसका पूरा आनंद ले रहे हैं और मनोरंजन में डूबे हैं। दादा-दादी, नाना-नानी से कहानियां मौखिक रूप से बच्चों को सुनने को मिलती थीं और पहेलियां जिससे दिमागी कसरत होती थी, वह मौखिक साहित्य भी बच्चों को पूर्व में दिया जाता था। यह उस समय मनोरंजन, ज्ञान और संस्कार का भी खजाना था। आजकल के बच्चे बदलते परिवेश के मुताबिक ही साहित्य पढ़ना और समझना चाहते हैं। साहित्यकार भी बच्चों की रुचि के अनुसार साहित्य की रचना करके उनके सामने परोस रहा है ताकि उनका सर्वांगीण विकास हो। बच्चों की रुचि की बात करें तो चंदा मामा में बुढि़या नानी चरखा कात रही है, बच्चे इस बात पर विश्वास नहीं कर पाते क्योंकि वे सूर्य की रोशनी में जुगनू की रोशनी बताने की कुव्वत रखते हैं। आज के बच्चे तकनीकी युग में जी रहे हैं। परंतु बाल साहित्य में ये भोलापन और मासूमियत हो तो इनका आनंद दुगना हो जाता है। आज लिखित बाल साहित्य की कमी नहीं है। लेकिन बच्चों के पास लिखित साहित्य कम मात्रा में ही उपलब्ध हो रहा है।

ज्यादातर अपने पाठ्यक्रम में ही पढ़ते हैं। बदलते परिवेश में बच्चे बस्ते के बोझ से दबे हुए हैं क्योंकि वे अपने पाठ्यक्रम से बाहर नहीं निकल पाते। थोड़ा-बहुत समय बचता है तो वे मोबाइल व टेलीविजन का सहारा लेकर अपने मनपसंद कार्टून व मोबाइल गेम्स देख लेते हैं। इस कारण बच्चों का रुझान लिखित साहित्य की तरफ  कम हो रहा है। यदि हम हिमाचल की ही बात करें तो अनेकों बाल पत्रिकाएं बच्चों को पढ़ने व देखने के लिए नाममात्र ही मिल पाती हैं। विद्यालय पुस्तकालय में रखी साहित्य पुस्तकों के दर्शन भी कभी-कभार ही बच्चों को हो पाते हैं। वे ज्यादातर अलमारियों में ही कैद रहती हैं। इस कारण बच्चों का बाल साहित्य के प्रति रुझान कम है। पवन चौहान, अनंत आलोक, सुनीता कटोच, गणेश गनी आदि शिक्षकों ने बच्चों में साहित्य के प्रति रुझान पैदा करने के लिए दीवार पत्रिका की शुरुआत करके नए युग का सूत्रपात किया है। बाल साहित्य के संरक्षण के लिए यह प्रयोग मील का पत्थर साबित होगा तथा साहित्यकारों की नई पौध भी तैयार होगी। अतः अध्यापकों व अभिभावकों की सामूहिक जिम्मेदारी बनती है कि बच्चों को अधिक से अधिक मात्रा में लिखित बाल साहित्य उपलब्ध करवाएं ताकि पढ़ने की आदत विकसित हो। यह बाल साहित्य के प्रति बच्चों में रुचि पैदा करेगा।