Thursday, July 09, 2020 03:32 AM

बावर्दी बनाम बेवर्दी देश सेवा

अजय पाराशर

लेखक, धर्मशाला से हैं

खाकी वर्दी पर दो स्टार टांगे पंडित जॉन अली अपने हाथ में अपने से भी लंबा डंडा घुमाते यूं चले आ रहे थे मानो मेरीकॉम ने विश्व कुश्ती प्रतियोगिता में नवां तम़गा हासिल कर लिया हो। पत्नी ने पूछा तो बोले कि कर्फ्यू में दो जवान सड़क पर बेज़ा घूमते दिखाई दिए तो वहीं सूत डाले। पत्नी ने कहा कि कौन से दो नौजवान? तो बोले कि अंधेरे में दिखे तो नहीं, लेकिन जब उन्हें डंड पेले तो उनकी आवाज़ कुछ सुनी हुई लगी। इतना सुनते ही उनकी धर्मपत्नी बरस पड़ीं, ‘‘लाहौल विला कूव्वत! कुछ तो लिहाज़ किया करो अपनी वर्दी का। दोनों नौजवान अपनी ही कॉलोनी के हैं। गुप्ता जी की पत्नी की तबियत अचानक खराब हो गई थी। बड़ी मुश्किल से बेचारे एसडीएम से पास जुटा कर, उन्हें  इमरजेंसी में अस्पताल छोड़ने गए थे। आते हुए गाड़ी होगी नहीं उनके पास। तुमने उन्हें बिना पूछे ही सूत डाला।’’  पंडित जी स़फाई देते हुए बोले, ‘‘भाग्यवान! वह तो मुंह से फूटे तक नहीं?’’पंडिताईन बोलीं, ‘‘तुम्हारे एक इशारे पर पूरे आठ-दस मुस्टंडे टूट पड़े होंगे, उन बेचारों पर। फिर हिंदुस्तानी पुलिस की तो पहचान ही है बिना इशारे के ऐसे काम करना और इशारा मिलने पर वैसे काम करना।’’ पंडित जी भड़कते हुए बोले, ‘‘अच्छा बताओ यह ऐसे काम करना और वैसे काम करना क्या है?’’ पंडिताईन बोलीं, ‘‘जो पुलिस भालू के मुंह से भी कहलवा लेती हो कि वह शेर है। उसे ऐसे काम और वैसे काम में क्या ़फ़र्क नहीं पता? इसी ने तो पूरे समाज को हाल-बेहाल कर रखा है। जहां प्रोएक्टिव होना होता है, वहां ढूंढ़े नहीं मिलते; और जहां धीरज दिखाना होता है, वहां जनता को रुई की तरह धुन आते हो। अगर कोई श़ख्स पुलिस की ़गाली-गलौज की शिकायत करता है, तो पकड़ कर उसका मेडिकल करवा देते हो और फिर कहते हो कि पुलिस ने उसके साथ कोई मार-पीट नहीं की थी। उन सभी मामलों में जहां गहन जांच होनी चाहिए, अनाप-शनाप धाराएं लगा देते हो। ऐसे मामले कोर्ट में वैसे ही दम तोड़ जाते हैं जैसे रेगिस्तान में स़फर पर निकला कोई प्यासा आदमी कुछ दूर जाकर तड़प-तड़प कर मर जाता है।’’ पंडित जी को लगा कि अगर पंडिताईन ऐसी ही भड़की रहीं तो खाना नहीं मिलेगा। बाहर कर्फ्यू लगा है और अगर यही हाल रहा तो भूखे सोने पड़ेगा। सुबह फिर काम अर्थात लोगों की धुनाई पर भी निकलना है। अपनी ज़ुबान में मिठास घोलते हुए बोले, ‘‘अरे! काहे नाराज़ होती हो। मैं तो दिन-रात तुम लोगों के लिए ही खटता हूं। मेरा क्या है अगर अकेली जान को तो पुलिस मैस में भी खाना मिल जाएगा। अब मुआ़फ करो। अब के ध्यान रखूंगा। अब खाना तो लगा दो।’’ पंडिताईन अब मुद्दे पर आईं, ‘‘देखो! जब से कोरोना कर्फ्यू लगा है गुप्ता जी और शर्मा जी ने अपनी बीवियों को किचन से छुट्टी दे रखी है और तुम हो कि मुझे हर व़क्त काम पर लगाए रखते हो। ऐसे नहीं चलेगा। मैं दिन में तो काम कर लूंगी लेकिन अब से घर आने पर रात के बरतन तुम्हीं करोगे।’’ पंडित जी का दिल तो किया वह चार लट्ठ पंडिताईन को भी टिका दें लेकिन डोमेस्टिक वॉयलेंस का ध्यान आते ही ठंडे हो गए।